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नवजात की छोटी-सी जांच, जीवनभर की बड़ी सुरक्षा का कदम

जन्म के समय होने वाली एक साधारण जांच नवजात को जीवनभर की बौद्धिक और शारीरिक चुनौतियों से बचा सकती है।कंजेनाइटल हाइपोथायरॉइडिज्म की समय पर पहचान और उपचार सिर्फ चिकित्सा नहीं, हर बच्चे के बेहतर भविष्य की जिम्मेदारी है।
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Aug 26, 2026
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भारत में हर साल हजारों नवजात एक छिपी कमी के साथ जीवन शुरू करते हैं, जिसका पता शरीर को देखकर नहीं चलता। बच्चा स्वस्थ दिखता है, माता-पिता प्रसन्न होकर घर लौटते हैं, पर कुछ बच्चों में जन्मजात या कंजेनाइटल हाइपोथायरॉइडिज्म होता है। इसमें थायरॉइड हार्मोन पर्याप्त नहीं बनता और मस्तिष्क का विकास प्रभावित होता है।यदि जन्म के तुरंत बाद पहचान और उपचार हो जाए, तो बौद्धिक अक्षमता रोकी जा सकती है, पर इसके छूटने पर मस्तिष्क को स्थायी नुकसान हो सकता है। इस बीमारी की पहचान एक सामान्य रक्त जांच से और उपचार थायरॉक्सिन की आम गोली से संभव है। दोनों ही लगभग नगण्य कीमत में मिलते हैं। लेकिन मानसिक और शारीरिक विकास के लिए यह उपचार बहुत जल्दी शुरू होना चाहिए, विशेष रूप से मां और शिशु की अस्पताल से छुट्टी से पहले। इसलिए कंजेनाइटल हाइपोथायरॉइडिज्म सार्वभौमिक नवजात जांच के लिए उपयुक्त स्थिति है- अपेक्षाकृत सामान्य, आसानी से पहचानी जाने वाली और समय पर उपचार से नियंत्रित।

कंजेनाइटल हाइपोथायरॉइडिज्म से होने वाली स्थायी मस्तिष्क क्षति रोकना न तो जटिल विज्ञान का प्रश्न है, न महंगी तकनीक का। यह नीति की उपेक्षा का एक बड़ा प्रश्न है। जन्म के समय उठाया गया छोटा कदम जीवनभर की सीखने की कठिनाइयों, कम वृद्धि, निर्भरता व आर्थिक और भावनात्मक बोझ को रोक सकता है। माता-पिता के लिए यह बच्चे को सामान्य रूप से बढ़ते और आत्मनिर्भर बनते देखने तथा पूरी जिंदगी विकलांगता से जूझने के बीच का अंतर है। उच्च आय वाले देशों ने दशकों पहले नवजात जांच को नियमित प्रसव देखभाल का हिस्सा बना दिया। सिद्धांत सीधा है- जब अपरिवर्तनीय मस्तिष्क क्षति सरलता से रोकी जा सकती है, तब लक्षण आने की प्रतीक्षा स्वीकार्य नहीं है। विश्व स्तर पर यह स्थिति हर दो से चार हजार जन्म में एक बच्चे को प्रभावित करती है। भारतीय अध्ययनों में प्रसार संभवत: हर 700 से 1200 जन्म में एक में पाया गया है। लगभग ढाई करोड़ वार्षिक जन्मों वाले भारत में हर साल हजारों प्रभावित बच्चे जुड़ते हैं। हर छूटा निदान परिवार की निजी त्रासदी और मानव पूंजी की रक्षा में राष्ट्रीय विफलता है। देर से पहचान की सामाजिक कीमत बड़ी है, बार-बार परामर्श, पुनर्वास, विशेष शिक्षा, माता-पिता की आय का नुकसान, वयस्क उत्पादकता में कमी और आजीवन निर्भरता। डेमोग्राफिक डिविडेंड्स की आकांक्षा रखने वाला देश यह नुकसान नहीं सह सकता। इसलिए नवजात थायरॉइड जांच प्रारंभिक बाल विकास कार्यक्रम है।
भारत में क्रियान्वयन अब भी बिखरा है।

दो प्रमुख तरीके है- ड्राइड ब्लड स्पॉट जांच और नाल के रक्त की जांच। पहली पद्धति में जन्म के एक या दो दिन बाद एड़ी से रक्त की बूंदें लेकर फिल्टर पेपर पर लगाई जाती हैं और केंद्रीय प्रयोगशाला भेजी जाती हैं। उसी नमूने से कुछ दुर्लभ आनुवंशिक रोगों की जांच भी हो सकती है। इस पद्धति की सबसे बड़ी बाधा देरी है। रिपोर्ट अक्सर मां और शिशु की अस्पताल से छुट्टी के बाद आती है। भारत में अक्सर यही तरीका उपयोग होता है लेकिन कई प्रसवों के बाद छुट्टी 24 से 48 घंटे में हो जाती है। नाल के रक्त की जांच इस समस्या का सरल समाधान देती है। प्रसव के समय गर्भनाल से रक्त लिया जाता है और बच्चे को सुई नहीं चुभानी पड़ती। स्थानीय प्रयोगशाला में जांच होने पर रिपोर्ट एक दिन के भीतर, छुट्टी से पहले मिल सकती है। रिपोर्ट असामान्य हो तो पुष्टि जांच और उपचार तुरंत शुरू किए जा सकते हैंं। हर प्रसव में नाल रक्त से थायरॉइड जांच को मानक सेवा बनाया जाए और प्रणालियां मजबूत होने पर ड्राइड ब्लड स्पॉट जांच भी जोड़ी जाए। सकारात्मक परिणाम के बाद पुष्टि व जांच हो।

भारत ने बाल मृत्यु घटाने में प्रगति की है। अगली सीमा बाल विकास है। जब सस्ती जांच व साधारण गोली विकासशील मस्तिष्क की रक्षा कर सकती है, तब देरी बचत नहीं, लापरवाही है। भारत को बिखरे पायलट अध्ययनों से राष्ट्रीय नीति, प्रभावशाली जांच सूचियों से विश्वसनीय कवरेज व जीवन बचाने से भविष्य सुरक्षित करने की दिशा में तुरंत बढऩा चाहिए।

Updated on:
26 Aug 2026 05:29 pm
Published on:
26 Aug 2026 05:29 pm