
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार तेजी से हो रहा है। सरकार की नीतियों, पर्यावरणीय जागरूकता, तकनीकी विकास व पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने की जरूरत ने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को देश के भविष्य की नीतियों का महत्वपूर्ण भाग बना दिया है। इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों के बाद अब इलेक्ट्रिक कारों, बसों और भारी वाणिज्यिक वाहनों की ओर भी इस दिशा में ध्यान दिया जा रहा है। किंतु इस विकास के मध्य एक महत्वपूर्ण चुनौती जो दिखाई दे रही है, वह यह कि क्या देश में इलेक्ट्रिक वाहनों को बड़े पैमाने पर अपनाने से पूर्व पर्याप्त और भरोसेमंद चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2015-16 में भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की भागीदारी मात्र 0.08 प्रतिशत थी, जो तेजी से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2025-26 में 8.26 प्रतिशत हो गई है। वर्ष 2025 में देश में लगभग 23 लाख इलेक्ट्रिक वाहन बिके, जो 2016 की अपेक्षा लगभग 46 गुना अधिक हैं। ये आंकड़े भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाते हैं। परन्तु ईवी की संख्या बढऩे के साथ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार भी उसी अनुपात और गति से होना आवश्यक है। इलेक्ट्रिक दोपहिया-तिपहिया वाहनों के लिए घर पर चार्जिंग संभव है, किंतु इलेक्ट्रिक चार पहिया और भारी इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए सार्वजनिक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर महत्वपूर्ण है। लेकिन ईवी खरीदने वाले व्यक्ति के सामने अब भी यह प्रश्न रहता है कि लंबी यात्रा के दौरान अगला चार्जिंग स्टेशन कहां मिलेगा, वहां चार्जर उपलब्ध होगा या नहीं, चार्जर सही तरीके से कार्य कर रहा होगा या नहीं और चार्जिंग में कितना समय लगेगा। नि:संदेह 'बैटरी समाप्त होने की चिंता' इलेक्ट्रिक वाहनों की स्वीकार्यता में एक बड़ी बाधा है। सरकार ने ईवी इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता को समझते हुए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। पीएम ई-ड्राइव के माध्यम से ईवी अपनाने और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार ने इलेक्ट्रिक बसों, ट्रकों और अन्य इलेक्ट्रिक वाहनों को भी प्रोत्साहन देने की दिशा में कदम उठाए हैं। किंतु सरकारी प्रयासों के बाद भी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता और उसका भौगोलिक वितरण अभी ईवी अपनाने की बढ़ती आवश्यकता के अनुरूप नहीं है। जुलाई 2026 तक देश में 52,718 सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन उपलब्ध थे, जिनमें 16,561 फास्ट-चार्जिंग सुविधाओं से युक्त हैं।
समस्या केवल चार्जिंग स्टेशनों की संख्या की ही नहीं है, अपितु उनके स्थान, चार्जिंग क्षमता, विश्वसनीयता और ग्रिड कनेक्टिविटी की भी है। कई चार्जिंग स्टेशन बड़े शहरों में केंद्रित हैं, जबकि राजमार्गों व ग्रामीण क्षेत्रों में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार अपेक्षाकृत धीमा है। लंबी दूरी की यात्रा करने वाले ईवी चालकों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। फास्ट चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए पर्याप्त विद्युत क्षमता भी आवश्यक है। भारत को अब केवल 'कितने चार्जिंग स्टेशन लगाए गए' इस आंकड़े पर ध्यान देने की अपेक्षा यह देखना होगा कि कितने चार्जिंग स्टेशन वास्तव में उपयोगी, विश्वसनीय और पर्याप्त क्षमता वाले है। साथ ही चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ नवीकरणीय ऊर्जा और बैटरी भंडारण को जोडऩा भी भविष्य की आवश्यकता है। समय आ गया है कि ईवी नीति में 'वाहन पहले' की अपेक्षा 'वाहन और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर साथ-साथ' की सोच अपनाई जाए। नए भवनों और वाणिज्यिक परिसरों में ईवी चार्जिंग की सुविधा, राजमार्ग चार्जिंग कॉरिडोर और शहर स्तर पर सघन योजनाएं बनानी होगी। भारत की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी क्रांति केवल अधिक से अधिक ईवी बेचने से सफल नहीं होगी। इसकी वास्तविक सफलता तब होगी जब कोई व्यक्ति ईवी खरीदते समय यह विश्वास कर सके कि उसे शहर के भीतर व लंबी दूरी की यात्रा के दौरान आसानी से और विश्वसनीय रूप से चार्जिंग उपलब्ध हो सकेगी।
डॉ. मिलिंद कुमार शर्मा,(प्रोफेसर, एमबीएम विवि, जोधपुर) , डॉ. खुशबू शाहनवी,(नीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में कार्यरत)