
हमारी डिजिटल पहचान किसी दूसरे के हाथों में पहुंंच जाए तो नुकसान चौतरफा होता है। बैंकिंग संस्थाओं के मामले में यह पहचान सुरक्षित रखना इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि साइबर अपराध अब लोगों के भरोसे पर बड़े हमले के रूप में सामने आ रहे हैं। देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया' के ग्राहकों की निजी जानकारियां डार्क वेब पर मिलने की घटना ग्राहकों के उस भरोसे पर चोट पहुंचाती है जिसमें वह अपनी निजी जानकारियां किसी भी बैंकिंग संस्थान के हाथों सौंप देता है। तमाम बैंक व दूसरे वित्तीय संस्थान अपने उपभोक्ताओं के डेटा यों तो सौ तालों में बंद होने का दावा करते हैं लेकिन हैकर समूह हर ताले का तोड़ निकालने के काम में इस सुरक्षा घेरे से सौ कदम आगे नजर आते हैं। इसलिए डेटा सुरक्षा को लेकर चिंता और बढऩा स्वाभाविक है।
आज साइबर अपराधियों को किसी खाते का पासवर्ड चुराने की जरूरत भी नहीं पड़ती। यदि उनके पास ग्राहक की पर्याप्त व्यक्तिगत जानकारी हो तो वे ग्राहक को ही जाल में फंसाकर बैंकिंग सिस्टम को भेद देते हैं। आमतौर पर कोई साइबर ठगी होती है तो यह मान लिया जाता है कि उपभोक्ता के स्तर पर ही गोपनीय जानकारी जाने-अनजाने में देने का काम हुआ होगा। जबकि बैंकिंग सुरक्षा तंत्र में सेंध लगाने वाले किसी बाहरी व्यक्ति या ठग गिरोह की यह करतूत होती है। सारा बोझ उपभोक्ता पर डालकर हर बार अपनी सुरक्षा खुद करने की नसीहत देते हुए संबंधित संस्थान एक नया ताला उपभोक्ता के हाथ में थमा देते हैं। कोई सड़क दुर्घटना होती है तो लापरवाह वाहन चालक पर जिम्मेदारी तय की जाती है। चोरी होने पर पुलिस से अपेक्षा की जाती है कि वह चोरों का पता लगाए। लेकिन जब लोगों का संवेदनशील डेटा लीक होता है तब शायद ही किसी की जवाबदेही तय होती दिखाई देती है। बहुत कम मौकों पर यह बताया जाता है कि कितने ग्राहकों का कौनसा डेटा प्रभावित हुआ और संभावित नुकसान रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए।
दोषी अधिकारियों या तकनीकी एजेंसियों पर कार्रवाई को लेकर तो जैसे चुप्पी साध ली जाती है। यह बात सही है कि साइबर सुरक्षा की मजबूती को लेकर सरकारी स्तर पर पिछले सालों में काफी कदम उठाए गए हैं। बैंकों की 1600 सीरीज से किए जाने वाले कॉल पर दोनों तरफ से बातचीत की अनुमति व ओटीपी वाले एसएमएस का प्रारूप एक जैसा करने के ताजा प्रयास भी इसी दिशा में आगे के कदम कहे जा सकते हैं। डेटा लीक को अक्सर तकनीकी त्रुटि या साइबर हमले का परिणाम मानना ही काफी नहीं होगा। डेटा लीक की महज स्वीकारोक्ति ही नाकाफी है। संस्था के स्तर पर डेटा सुरक्षा में चूक होने पर सबसे पहले ग्राहक के अधिकार, सुरक्षा और क्षतिपूर्ति को महत्व मिलना चाहिए। डेटा सुरक्षा की दिशा में संस्थागत और व्यक्तिगत स्तर पर जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होगी।