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आने वाले समय में किसी देश की ताकत का आकलन केवल मिसाइलों, लड़ाकू विमानों और परमाणु हथियारों से नहीं होगा। अंतरिक्ष में किसके उपग्रह हैं, किसके पास संचार नेटवर्क का नियंत्रण है और संकट के समय किसकी सूचना व्यवस्था बेहतरीन काम करती है- ये सवाल भी किसी देश की सामरिक क्षमता तय करेंगे। दुनिया इस नई प्रतिस्पर्धा के बीच खड़ी है। एक ओर अमरीकी कंपनी स्पेसएक्स का 'स्टारलिंक' है, तो दूसरी ओर चीन अपने उपग्रह आधारित इंटरनेट नेटवर्क विकसित करने में जुटा है। यानी हमारा 'आसमान' इन दो महाशक्तियों के बीच बंटने वाला है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत कहां खड़ा होगा? क्या भारत 'दो ध्रुवीय आसमान' में से किसी एक 'ध्रुव' का हिस्सा बनेगा या अपना 'आसमान' खुद तैयार करेगा।
एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का 'स्टारलिंक' पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित हजारों उपग्रहों के माध्यम से इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने वाला नेटवर्क है। इसकी खासियत यह है कि दुनिया के उन इलाकों में भी उपग्रहों के जरिये सीधा इंटरनेट पहुंचा सकता है, जहां फाइबर केबल नहीं बिछाई जा सकती। फिलहाल तो सैटेलाइट इंटरनेट के क्षेत्र में एलन मस्क का एकाधिकार है, जिसे चीन सीधी चुनौती देने की तैयारी कर रहा है। स्पेसएक्स के पास कक्षा (ऑर्बिट) में लगभग 10 हजार स्टारलिंक उपग्रह हैं। चीन भी दो प्रतिस्पर्धी नेटवर्क-'गुओवांग' और 'कियानफान' बना रहा है, जिनमें से प्रत्येक में 10 हजार से अधिक उपग्रह होंगे। 'गुओवांग' ने तो पिछले महीने ही उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के दुर्गम इलाकों में उपग्रह इंटरनेट के जरिये वीडियोकॉल का सफल परीक्षण कर यह साबित कर दिया है कि चीन जल्द ही उपग्रह इंटरनेट की दुनिया में अमरीका को सीधी टक्कर देगा। यहां सवाल यह है कि क्या भारत के पास ऐसा विकल्प होगा, जो किसी संकट में बाहरी तकनीकी, व्यावसायिक या राजनीतिक निर्णयों से प्रभावित हुए बिना देश की आवश्यकताओं को पूरा कर सके?
दुनिया में भारत की स्थिति अन्य देशों की तुलना में अलग है। यह सबसे बड़ा बाजार है। यहां के लिए 'स्टारलिंक' जैसी कंपनियां लाइसेंस पाने के लिए बेताब हैं। भारत खुद एक अंतरिक्ष शक्ति है, जो दक्षिणी दुनिया की अहम आवाज है। ऐसे में भारत की जिम्मेदारियां और चुनौतियां और बढ़ जाती हैं। मसलन, अंतरिक्ष की निचली कक्षा (लो ऑर्बिट) असीमित नहीं है। जिस तेजी से दुनियाभर में उपग्रह प्रक्षेपित हो रहे हैं, उससे यह तय है कि आने वाले समय में नए उपग्रहों के लिए जगह मिलने की किल्लत हो जाएगी, क्योंकि उपग्रह को एक दूसरे से सुरक्षित दूरी बनाए रखनी होती है। एक निश्चित ऊंचाई पर उड़ान भरना होता है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक सबसे अच्छी ऊंचाई और फ्रीक्वेंसी अक्सर उसको मिल जाती है जो सबसे पहले अपने दावा पेश करता है, पहले लांच करता है और जो बाद में आते हैं उन्हें दूसरे से पूछना पड़ता है। अंतरिक्ष की निचली कक्षा में जरूरतमंद देश को अपना हिस्सा आसानी से मिल सके, इसके लिए आने वाले समय में भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति बनाने के लिए वैसी ही पहल करनी होगी, जिस तरह वर्ष 1976 में कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में आठ भूमध्यरेखीय देशों ने की थी।
भारत के सामने बड़ा सवाल यह नहीं है कि एलन मस्क की कंपनी को भारत आने दिया जाए अथवा नहीं। इस तरह की कनेक्टिविटी के मामले में भारत को कई स्रोतों का विकल्प रखना पड़ेगा, ठीक उसी तरह जिस तरह भारत ने हथियार खरीद के मामले में किसी एक देश पर निर्भरता नहीं रखी। भारत को किसी एक विदेशी प्रदाता, एक तकनीक या एक नेटवर्क पर निर्भर नहीं होना चाहिए। उसके पास भी उपग्रह इंटरनेट के क्षेत्र के लिए भी प्रावधान होना चाहिए। आसमानी जंग में भारत को अपनी ताकत बढ़ानी ही होगी। सबसे पहले स्वदेशी उपग्रहों के विस्तार में तेजी लानी होगी, जिसके तहत संचार उपग्रहों के साथ पृथ्वी कक्षा में काम आने वाले नेटवर्कों की संभावनाओं पर निवेश करना होगा। इसके लिए इसरो, न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड, इन स्पेस और निजी भारतीय कंपनियों के बीच अनुसंधान, उत्पादन और परिचालक का मजबूत तालमेल जरूरी है। मजबूत साइबर सुरक्षा, नेटवर्क नियंत्रण, ग्राउंड स्टेशन की सुरक्षा व उपग्रह की निगरानी जैसी क्षमताओं को प्राथमिकता देनी होगी। बड़े उपग्रह की तैनाती के लिए नियमित, किफायती और तेज प्रक्षेपण की व्यवस्था भी करनी होगी। इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी उतना ही जरूरी है।
स्टारलिंक और चीनी सैटेलाइट नेटवर्क की प्रतिस्पर्धा भारत के लिए सिर्फ खतरे की चेतावनी भर नहीं है। यह अपनी कमियों को पहचानने और नई क्षमताएं विकसित करने का अवसर भी है। हमें यह तय करना होगा कि देश भविष्य में केवल विदेशी नेटवर्कों का बड़ा बाजार बना रहेगा या अंतरिक्ष आधारित संचार तकनीक का निर्माता और प्रभावशाली भागीदार भी बनेगा। अंतरिक्ष की दौड़ में ताकत केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि किस देश में कितने उपग्रह हैं, असली ताकत उस क्षमता में होगी जो संकट के समय देश को जोड़े रखे, संवेदनशील सूचनाओं की रक्षा करे और राष्ट्रीय निर्णय को बाहरी निर्भरता से मुक्त रखे। भारत के लिए यही डिजिटल संप्रभुता की कसौटी है।
रत्नेश मिश्र, (वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार)
Updated on:
22 Oct 2026, 4:32 PM IST
Published on:
22 Oct 2026, 4:32 PM IST
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