
बेंगलूरु में एक आइटी कंपनी के परिसर में डे-केयर सेंटर में बच्चों के रोने पर उन्हें चुप कराने के लिए वहां कार्मिकों ने जो तरीके अपनाए वह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा। बच्चों को वॉशिंग मशीन के अंदर बैठाने, बाथरूम में बंद कर टॉयलेट के जेट स्प्रे से उनके मुंह में पानी डालने जैसी कू्ररता सामने आ ही नहीं पाती यदि सोशल मीडिया पर इसके वीडियो वायरल नहीं होते।
हैरत की बात ये है कि दो से तीन साल तक के बच्चों से यह अमानवीय व्यवहार महिला कार्मिकों ने किया जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे डे-केयर सेंटर में बच्चों का मातृत्व भाव से देखरेख करेंगी। यह सही है कि महिला शिक्षा के प्रसार से सरकारी व कॉर्पोरेट क्षेत्र में महिलाओं को रोजगार के अवसर पहले से कहीं ज्यादा मिलने लगे हैं। आज के दौर में जब माता-पिता दोनों ही कामकाजी हैं और संयुक्त परिवार प्रणाली पीछे छूटती जा रही है, बच्चों को डे-केयर सेंटर में रखना मजबूरी हो गई है। इसीलिए सरकारी स्तर पर भी दफ्तरों में बच्चों के लिए डे-केयर सेंटर बनाने के कानूनी प्रावधान किए गए हैं। माताएं जब काम पर हों तो अपने छोटे बच्चों की देखभाल को लेकर वे निश्चिंत रह सकें, इसके लिए भी इस तरह के क्रेच की उपयोगिता बढ़ गई है। लेकिन नियमों की बाध्यता के कारण कार्यस्थल पर डे-केयर सेंटर बना देना ही काफी नहीं, इनमें कार्मिकों की नियुक्ति भी कड़े परीक्षणों के बाद करना जरूरी हो गया है।
ऐसे कार्मिकों को बाल्यावस्था की देखभाल से जुड़ा प्रशिक्षण तो होना ही चाहिए, नियुक्ति के साथ ही उनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराया जाना भी जरूरी है। कई बार घर-परिवार में तनाव का असर कार्मिकों के बर्ताव में भी नजर आता है। ऐसे में इस बात की तो पूरी पड़ताल की ही जानी चाहिए कि जिन्हेें ऐसे डे-केयर सेंटर में बच्चों की देखभाल करनी है वे बच्चों के प्रति कितने संवेदनशील हैं? हमारे यहां बड़ी संख्या में माताएं सिर्फ इसी वजह से घर से बाहर काम पर जाने का मानस नहीं बना पातीं क्योंकि डे-केयर सेंटर में बच्चों की बेहतर देखभाल हो सकेगी, इसको लेकर वे आश्वस्त नहीं होतीं। यों तो नियमों में प्रत्येक डे-केयर सेंटर को अपने यहां निगरानी समिति बनाने का प्रावधान भी है। लेकिन बेंगलूरु की इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि ऐसी समितियां प्रभावी तौर से काम नहीं कर रही हैं। क्रेच में खिलौने, साफ-सफाई और मेडिकल किट जैसी प्रारंभिक जरूरतों की भी अनदेखी होती दिखे तो इनकी निगरानी व्यवस्था पर सवालिया निशान उठ जाता है।
तकनीक ने हमारे कई काम आसान कर दिए हैं। डे-केयर सेंटर में बच्चों की देखभाल ठीक से हो रही है अथवा नहीं, इसकी माताएं खुद सीसीटीवी के जरिए निगरानी रख सकती हैं। संबंधित प्रतिष्ठान अपनी कार्मिकों को डे-केयर सेंटर पर लगे सीसीटीवी कैमरों की अपने मोबाइल से निगरानी रखने की सुविधा दें तो संवेदनहीनता की ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकेगा।