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पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ पाक के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के लोगों का आक्रोश चरम पर है। पाकिस्तान एक तो इस इलाके पर जबरन कब्जा करके बैठा है वहीं दूसरी ओर लंबे समय से इस क्षेत्र के लोगों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखकर वह खुद ही यह साबित करता रहा है कि यह हिस्सा पाकिस्तान का अंग नहीं है। अब तो वहां के लोगों ने खुद को पाकिस्तान का हिस्सा मानने तक से इनकार कर दिया है। पिछले करीब एक माह से चल रहे आंदोलन को कुचलने के लिए पाक सरकार का दमन चक्र जारी है। वहां जनआक्रोश सिर्फ महंगाई, बिजली, अनाज या सब्सिडी से जुड़े संकट का ही नही, बल्कि पीओके को लेकर पाकिस्तान की जनविरोधी नीतियों का भी नतीजा है। चिंता की बात यह है कि पाकिस्तान की सरकार और सेना क्षेत्र की जनता की समस्याओं का समाधान संवाद से नहीं, बल्कि दमन से करने में जुटी हैं।
इतिहास बताता है कि पाकिस्तान ने पीओके के लोगों की मांग की सदैव अनदेखी की है। न तो इस क्षेत्र के लोगों को उनके मूलभूत अधिकार मिल पा रहे हैं और न ही विकास के समान अवसर। मिल पा रहे हैं। स्थानीय संसाधनों का दोहन तो हुआ, लेकिन उसका लाभ वहां की जनता तक अपेक्षित रूप से नहीं पहुंचा। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं के क्षेत्र में भी पीओके लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रहा है। पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे को उठाता रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र पर उसका कब्जा है, वहां के लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं और लोकतांत्रिक अधिकारों की लगातार अनदेखी में जुटा रहा। पाकिस्तान ने पीओके का हमेशा भारत के खिलाफ एक टूल की तरह इस्तेमाल किया है। उसे कभी वहां के नागरिकों की फिक्र नहीं रही। असंतोष की यह एक बड़ी वजह है। हाल के प्रदर्शनों में कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा भारत से लगी सीमाएं खोलने जैसी बातें भी सामने आई हैं। ऐसे बयानों से इतना स्पष्ट है कि वे वहां की जनता की गहरी निराशा और व्यवस्था से मोहभंग को चुका है। जनभावनाओं की यह अनदेखी और दमन की कार्रवाई वहां राजनीतिक संकट को और गहरा ही करते हैं। बलपूर्वक असंतोष दबाने की पाकिस्तान की दमनकारी नीति लंबे समय तक सफल नहीं हो सकती।
पाकिस्तान ने पीओके में सदैव लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने का काम ही किया है। जाहिर तौर पर जनता की समस्याओं के समाधान का विचार तो कभी उसे सूझ ही नहीं सकता। किसी भी क्षेत्र में स्थिरता केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से आती है। पाक हुक्मरानों को सीधा संदेश है कि वहां की कि जनता सम्मान, अधिकार और बेहतर जीवन चाहती है। पाकिस्तान इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लेता, तो वहां नागरिक अधिकारों को लेकर लोग और मुखर हो सकते हैं।
Published on:
02 Jul 2026 03:42 pm
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