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कोर्सेज खत्म नहीं, ‘री-इमेजिन’ करने की जरूरत

दिल्ली या बेंगलूरु की आइआइटी में जो तकनीक उपलब्ध हैं, वह किसी टियर-3 शहर के सरकारी कॉलेज में नहीं है। भारत में कला, मानविकी और भाषाएं केवल डिग्रियां नहीं हैं, बल्कि ये देश की सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता को बनाए रखने का माध्यम हैं।
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जयपुर

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Opinion Desk

Jul 01, 2026

education system

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प्रो.अशोक कुमार, (पूर्व कुलपतिगोरखपुर विश्वविद्यालय)

चीन में हाल ही में शिक्षा प्रणाली में किए गए अभूतपूर्व बदलाव जिसके तहत 12,200 से अधिक पारंपरिक पाठ्यक्रमों को बंद कर 10,200 से अधिक भविष्य की तकनीक (जैसे एआइ, सेमीकंडक्टर और रोबोटिक्स) पर आधारित नए कोर्स शुरू किए गए हैं, ने वैश्विक स्तर पर एक नई बहस छेड़ दी है। एआइ और ऑटोमेशन के इस दौर में शिक्षा का पुराना ढर्रा अब प्रासंगिक नहीं रह गया है। चीन का यह कदम 'शॉक थेरेपी' जैसा है, जो सीधे तौर पर उसके युवा बेरोजगारी संकट से निपटने के लिए उठाया गया है। लेकिन जब हम इस मॉडल की तुलना भारत से करते हैं, तो स्पष्ट होता है कि भारत को चीन की तरह 'रातों-रात पाठ्यक्रम खत्म करने' के बजाय एक 'प्रगतिशील अपग्रेड मोड' की जरूरत है।

चीन ने जिस तेजी से अपने 30 फीसदी से अधिक विश्वविद्यालय पाठ्यक्रमों को बदल दिया, वैसा कदम भारत में उठाना लाखों छात्रों के भविष्य को संकट में डाल सकता है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं, भारत के महानगरीय और ग्रामीण इलाकों के कॉलेजों के बीच संसाधनों, डिजिटल और बुनियादी ढांचे की खाई का बहुत बड़ा अंतर है। दिल्ली या बेंगलूरु की आइआइटी में जो तकनीक उपलब्ध हैं, वह किसी टियर-3 शहर के सरकारी कॉलेज में नहीं है। भारत में कला, मानविकी और भाषाएं केवल डिग्रियां नहीं हैं, बल्कि ये देश की सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता को बनाए रखने का माध्यम हैं। इन्हें पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि भारत यथास्थिति बनाए रखे। नैसकॉम जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट आंखें खोलने वाली हैं, जो बताती हैं कि भारत के लगभग 75 से 80 फीसदी ग्रेजुएट्स और इंजीनियर्स कॉर्पोरेट जगत की जरूरतों के हिसाब से 'अनएम्प्लॉयेबल' (रोजगार के अयोग्य) हैं।

इसलिए, भारत का भविष्य 'कोर्सेज को खत्म करने' में नहीं, बल्कि 'कोर्सेज को री-इमेजिन (पुनर्कल्पना) करने' में है। यदि भारत को अपनी यानी दुनिया की सबसे युवा आबादी का सही लाभ उठाना है, तो अगले कुछ वर्षों में शिक्षा के ढांचे को पांच स्तरों पर बदलना होगा। कोर्सेज को बंद करने के बजाय 'एआइ के साथ विलय' किया जाना चाहिए। चीन ने अनुवाद और फोटोग्राफी जैसे कोर्सेज को यह कहकर बंद या मर्ज कर दिया कि एआइ इन्हें रिप्लेस कर रहा है। जबकि भारत को कला और डिजाइन को खत्म नहीं करना है, बल्कि उन्हें सुपरचार्ज करना है।एआइ-असिस्टेड ह्यूमैनिटीज के तहत अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के साहित्य के छात्रों को अनुवाद के साथ एआइ प्रॉम्ट इंजीनियरिंग सिखाई जानी चाहिए क्योंकि भविष्य में नौकरी उसकी होगी जो एआइ द्वारा किए गए अनुवाद को एडिट और रिफाइन कर सके। पारंपरिक फाइन आट्र्स या फैशन डिजाइनिंग में जनरेटिव आर्टिफिशियल का प्रयोग करना होगा। इंटेलिजेंस एक ऐसी जनरेटिव एआइ टूल्स है (जैसे मिडजर्नी, एडोब का अत्याधुनिक जेनरेटिव एआइ) को पहले साल से ही पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा, क्योंकि आज की इंडस्ट्री में स्पीड और क्रिएटिविटी का यही नया कॉम्बिनेशन है। भारतीय उच्च शिक्षा में आज भी कई कॉलेजों में 15 साल पुरानी कोडिंग भाषाएं या सैद्धांतिक मैनेजमेंट पढ़ाया जा रहा है। कंप्यूटर साइंस के विद्यार्थियों को सेमेस्टर से डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सिक्योरिटी के व्यावहारिक प्रोजेक्ट्स पर काम कराना चाहिए।

भारत को अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और ताकत के हिसाब से नए कोर्सेज डिजाइन करने होंगे। सेमीकंडक्टर और चिप डिजाइनिंग का प्रयोग करना चाहिए। 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' के तहत देश में चिप फैक्ट्रियां लग रही हैं। इसके लिए हमें लाखों कुशल इंजीनियर्स की जरूरत होगी। विश्वविद्यालयों को चैसिस, वीएलएसआइ और चिप डिजाइन के विशेष डिग्री प्रोग्राम शुरू करने चाहिए। भारत कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है। यहां पारंपरिक कृषि शिक्षा में ड्रोन मैपिंग, एआइ आधारित सॉइल मॉनिटरिंग और स्मार्ट फार्मिंग को जोडऩा होगा ताकि ग्रामीण युवा एग्रो-स्टार्टअप्स शुरू कर सकें। शिक्षकों का बड़े पैमाने पर री-स्किलिंग अभियान शुरू करना चाहिए। यह भारत के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती है। हम पाठ्यक्रम तो बदल सकते हैं, लेकिन उसे पढ़ाएगा कौन? हमारे अधिकांश प्रोफेसर्स खुद आधुनिक टूल्स से अनजान हैं। सरकार और विश्वविद्यालयों को शिक्षकों के लिए अनिवार्य तकनीकी अपस्किलिंग कार्यक्रम चलाने होंगे। कॉर्पोरेट जगत के एक्सपट्र्स को 'प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस' के रूप में कॉलेजों में आमंत्रित करना होगा, ताकि विद्यार्थियों को इंडस्ट्री का अनुभव मिल सके। नए नियम के अनुसार कॉलेज के अंतिम दो सेमेस्टर पूरी तरह से अनिवार्य कॉर्पोरेट या फील्ड इंटर्नशिप के लिए होने चाहिए। विद्यार्थी को डिग्री तभी मिले जब उसने किसी कंपनी या प्रोजेक्ट के साथ काम किया हो। इससे 'फ्रेशर' होने का टैग हटेगा और छात्र कॉलेज से निकलते ही नौकरी के लिए तैयार होगा। चीन का उच्च शिक्षा संकट और उसका समाधान हमारे लिए एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी।

भविष्य की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो छात्र को केवल 'डिग्री धारक' न बनाए, बल्कि उसे एक 'समस्या समाधानकर्ता' और निरंतर सीखने वाला बनाए। तकनीकी कौशल के साथ क्रिटिकल थिंकिंग, कम्युनिकेशन और एडेप्टेबिलिटी जैसे सॉफ्ट स्किल्स ही भारतीय युवाओं को एआइ के इस दौर में सुरक्षित और सफल रखेंगे। चीन जिस गति से फैसले लेता है, भारत की लोकतांत्रिक और नौकरशाही व्यवस्था में वैसी गति लाना कठिन है। लेकिन अगर हमने इस गति को नहीं बढ़ाया, तो हमारी सबसे बड़ी ताकत (युवा आबादी) हमारे लिए सबसे बड़ा संकट (युवा बेरोजगारी) बन जाएगी।