
InclusiveGovernance
उमा व्यास
स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार
‘पंचायत’ वेब सीरीज में चुनाव मंजू देवी जीतती हैं, लेकिन निर्णय उनके पति लेते दिखाई देते हैं। यह दृश्य ग्रामीण भारत की उस सच्चाई की याद दिलाता है, जहां कई बार महिला निर्वाचित होती है, पर निर्णय प्रक्रिया में उसकी भूमिका सीमित रह जाती है। यही प्रश्न आज भी पंचायती राज के सामने है कि क्या महिलाओं का प्रतिनिधित्व वास्तविक नेतृत्व में बदल पाया है?
पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू हुए तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है। आज देशभर में 15 लाख से अधिक महिलाएं ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषदों में निर्वाचित प्रतिनिधि हैं तथा अनेक राज्यों में उनका प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों में से एक है। इसने लाखों महिलाओं को पहली बार सार्वजनिक नेतृत्व का अवसर दिया। लेकिन अब समय यह पूछने का है कि क्या केवल प्रतिनिधित्व ही पर्याप्त है, या वास्तविक सशक्तीकरण अभी भी अधूरा है।
वित्तीय और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण अभी भी प्रभावी नहीं
आज भी अनेक पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के हस्ताक्षर होते हैं, लेकिन निर्णय कोई और लेता है। ग्राम सभा में महिला अध्यक्षता करती है, पर चर्चा उसके पति या परिवार का कोई पुरुष सदस्य करता है। कुछ स्थानों पर प्रशासनिक स्तर पर भी संवाद निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के बजाय उनके परिजनों से होने लगता है। यही कारण है कि ‘सरपंच पति’ जैसी अभिव्यक्ति सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन गई है, जबकि कानून में ऐसी किसी भूमिका का कोई स्थान नहीं है। यह कागज पर मिले अधिकार और उनके वास्तविक उपयोग के बीच की दूरी को उजागर करता है। इस स्थिति के लिए केवल सामाजिक सोच को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिलने के बावजूद वित्तीय और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण अभी भी पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाया है। अनेक योजनाओं में संसाधनों और निर्णयों पर अंतिम नियंत्रण उच्च स्तर पर बना रहता है। परिणामस्वरूप महिला प्रतिनिधियों के लिए स्वतंत्र नेतृत्व विकसित करना कठिन हो जाता है। पहली बार निर्वाचित होने वाली अनेक महिलाओं को प्रशासनिक प्रक्रियाओं, सरकारी योजनाओं और वित्तीय प्रबंधन को समझने में शुरुआती कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। प्रशिक्षण और अनुभव के साथ यह स्थिति बेहतर होती है, लेकिन आरंभिक वर्षों में संस्थागत सहयोग की कमी स्पष्ट दिखाई देती है।
उम्मीद जगाता तस्वीर का दूसरा पक्ष
फिर भी तस्वीर का दूसरा पक्ष उम्मीद जगाता है। राजस्थान के टोंक जिले के सोडा गांव की छवि राजावत ने जल संरक्षण और पंचायत प्रशासन में नवाचार का उदाहरण प्रस्तुत किया। झुंझुनूं जिले के लांबी अहीर गांव की नीरू यादव ने स्वच्छता, पौधरोपण, बालिका शिक्षा और खेल को बढ़ावा देकर अपने गांव को नई पहचान दिलाई। वहीं ओडिशा के गंजाम जिले की आरती देवी ने स्वयं सहायता समूहों और डिजिटल सेवाओं के माध्यम से महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को मजबूत किया। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि जब महिलाओं को केवल पद नहीं, बल्कि निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी मिलती है, तब पंचायतें विकास का प्रभावी माध्यम बन जाती हैं।
विभिन्न अध्ययनों में यह पाया गया है कि जहां महिलाओं की वास्तविक भागीदारी होती है, वहां पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और स्वच्छता जैसे विषयों को अधिक प्राथमिकता मिलती है। इससे स्पष्ट है कि महिला नेतृत्व केवल प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ाता, बल्कि विकास की दिशा और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है।
हाल के वर्षों में इस दिशा में सकारात्मक पहल भी हुई हैं। गुजरात के जूनागढ़ जिला पंचायत ने स्वतंत्र रूप से कार्य करने वाली महिला सरपंचों को सम्मानित करने की पहल शुरू की है, ताकि वास्तविक महिला नेतृत्व को प्रोत्साहन मिले और ‘सरपंच पति’ जैसी प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जा सके। वहीं राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार 2025 में भी महिला नेतृत्व वाली पंचायतों को उल्लेखनीय स्थान मिला, जो प्रभावी महिला नेतृत्व की बढ़ती राष्ट्रीय पहचान का संकेत है।
निर्णयों को पूरे सम्मान के साथ स्वीकार किया जाए
अब आवश्यकता केवल आरक्षण तक सीमित रहने की नहीं है। प्रत्येक नव निर्वाचित महिला प्रतिनिधि को नियमित प्रशासनिक, वित्तीय और डिजिटल प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। हर जिले में अनुभवी महिला सरपंचों का एक मार्गदर्शक समूह बनाया जा सकता है, जो पहली बार निर्वाचित प्रतिनिधियों का सहयोग करे। अधिकारियों के लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे सीधे निर्वाचित महिला प्रतिनिधि से ही संवाद करें। ग्राम सभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए, स्वयं सहायता समूहों को पंचायत योजनाओं से जोड़ा जाए तथा महिलाओं को डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास और वित्तीय प्रबंधन से जोडकऱ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाए। आर्थिक आत्मनिर्भरता ही उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने का वास्तविक आत्मविश्वास देती है। अंतत: लोकतंत्र की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि पंचायतों में कितनी महिलाएं निर्वाचित हुईं। वास्तविक सफलता तब होगी, जब वे बिना किसी दबाव के अपनी बात रखें, अपने निर्णय स्वयं लें और उनके निर्णयों को पूरे सम्मान के साथ स्वीकार किया जाए।
आरक्षण ने महिलाओं को पंचायत तक पहुंचाया, लेकिन लोकतंत्र की मंजिल केवल कुर्सी तक पहुंचाना नहीं, बल्कि निर्णय की शक्ति सौंपना है। जिस दिन पंचायत की बैठक में महिला प्रतिनिधि अपनी आवाज स्वयं उठाएगी और अंतिम निर्णय भी उसी का होगा, उसी दिन पंचायती राज में महिलाओं के आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।
Updated on:
01 Jul 2026 07:45 pm
Published on:
01 Jul 2026 07:44 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
