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संपादकीय: इंटर्नशिप को गंभीरता से लेने पर ही तराशे जाएंगे पेशेवर

यह सच है कि देश की यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों से हर साल लाखों की संख्या में डिग्रीधारी युवा निकलते हैं। नौकरी के बाजार में कदम रखने वाले युवाओं को अर्जित की गई डिग्रियों व उद्योग जगत की उम्मीदों के बीच बड़े 'गेप' का सामना करना पड़ता है।
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जयपुर

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Opinion Desk

Jul 01, 2026

internships

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हमारे देश में उद्योग जगत लगातार यह शिकायत करता रहा है कि डिग्रियों की भरमार भले ही हो लेकिन उसके पास व्यावहारिक ज्ञान और वास्तविक कार्य क्षमता (स्किल) रखने वाले युवाओं का घोर अभाव है। शिक्षा को महज किताबी दुनिया से निकालकर जमीनी हकीकत से जोडऩे की दिशा में हाल ही भारतीय मानक संस्थान की ओर से इंटर्नशिप को लेकर तय किए गए नए बेंचमार्क इसी शिकायत को दूर करने की दिशा में अहम कदम कहा जा सकता हैं। फेक इंटर्नशिप की परिपाटी पर प्रहार करने वाले ये नियम प्रशासनिक बदलाव ही नहीं, हमारी शैक्षणिक सोच में आने वाले एक गहरे वैचारिक परिवर्तन का भी संकेत हैं।

नए नियमों के तहत अब कंपनियों और शिक्षण संस्थानों के लिए इंटर्नशिप के नाम पर केवल एक कागज का टुकड़ा यानी सर्टिफिकेट थमा देना काफी नहीं होगा। अब प्रशिक्षण की पूरी गुणवत्ता, मेंटरशिप का ढांचा और सबसे महत्त्वपूर्ण बात- इंटर्न के काम का परफार्मेंस ऑडिट करना अनिवार्य कर दिया गया है। सीधा मतलब यह है कि अब कंपनियों पर भी यह नैतिक दबाव होगा कि वे अपने यहां आने वाले इंटर्न को एक बोझ या मुफ्त का कामगार न समझें बल्कि उन्हें एक योग्य पेशेवर के रूप में तराशें। शिक्षा को रोजगारोन्मुखी बनाने के इरादे से नई शिक्षा नीति में अब सामान्य स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए भी इंटर्नशिप को अनिवार्य किया गया है। यह सच है कि देश की यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों से हर साल लाखों की संख्या में डिग्रीधारी युवा निकलते हैं। नौकरी के बाजार में कदम रखने वाले युवाओं को अर्जित की गई डिग्रियों व उद्योग जगत की उम्मीदों के बीच बड़े 'गेप' का सामना करना पड़ता है। भारतीय उच्च शिक्षा और कॉर्पाेरेट जगत के बीच का यह विरोधाभास हमेशा चिंता का विषय रहा है। इसका कारण यह भी है कि अब तक देश में इंटर्नशिप की संस्कृति औपचारिकता मात्र बनकर रह गई थी। कॉलेज के अंतिम वर्षों में या सेमेस्टर के अंत में छात्र किसी भी परिचित संस्थान, रिश्तेदार की कंपनी या किसी शॉर्टकट के माध्यम से एक प्रमाण पत्र हासिल करते रहे हैं। कई बार तो ऐसे छात्र कार्यस्थल पर एक दिन भी नहीं जाते। इस फर्जीवाड़े ने न केवल छात्रों में सीखने की ललक को खत्म किया, बल्कि उस व्यवस्था को भी पंगु बना दिया जो उन्हें पेशेवर दुनिया की चुनौती के मुकाबले के लिए बनाई गई थी।

किसी भी देश की प्रगति और आर्थिक सुदृढ़ता उसके युवाओं की कार्यकुशलता पर निर्भर है। अगर हम उन्हें वास्तविक कार्य अनुभव, सही मेंटरशिप और पारदर्शी मूल्यांकन के माध्यम से कुशल बनाएंगे, तो देश की अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकेंगे। हालांकि, फिलहाल कागज पर बने नए बेंचमार्क की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि शिक्षण संस्थान और उद्योग जगत मिलकर इसका कितनी ईमानदारी से पालन करते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इन प्रावधानों से यथार्थ कौशल की ताजपोशी होगी।