
office culture
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में प्रशासनिक संवेदनशीलता और समयबद्धता को जनआकांक्षाओं की पूर्ति के दो मुख्य स्तंभ माना जाता है। हाल ही कैबिनेट सचिवालय द्वारा राष्ट्रीय सुशासन केंद्र के सहयोग से जारी की गई मार्गदर्शिका न केवल देश की प्रशासनिक शिथिलता पर एक गंभीर विमर्श है, बल्कि जन-केंद्रित सुशासन की दिशा में एक साहसिक प्रयास भी है। यह इसलिए भी क्योंकि दशकों से आम नागरिक सरकारी कार्यालयों के गलियारों में 'साहब मीटिंग में हैं' जैसे रूखे और पारंपरिक बहानों से त्रस्त रहा है। ऐसे में बैठकों की अधिकतम समय-सीमा 60 मिनट कर और उन्हें उद्देश्यपूर्ण बनाना शासन व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता को स्पष्ट करता है।
केबिनेट सचिव की ओर से जारी दिशा-निर्देशों के तथ्य और आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि केंद्रीय कार्यालयों में रोजाना 20-30 और विभिन्न राज्यों में दर्जनों ऐसी बैठकें होती हैं जो अक्सर दिशाहीन, उबाऊ और अनिर्णायक साबित होती हैं। अवकाश के आगे-पीछे महत्वपूर्ण बैठकें न रखने और जटिल एजेंडे को भोजन के समय से दूर रखने के निर्देश अधिकारियों के मानसिक स्वास्थ्य और कार्यक्षमता दोनों को संतुलित करने का भी प्रयास हैं। जो कार्य ई-मेल, पत्र या फिर दूरभाष से संभव हैं, उनके लिए लंबी बैठकें आयोजित न करने के सुझाव पर अमल हुआ तो समय और सार्वजनिक धन दोनों की बचत तय है।
अमरीका, ब्रिटेन, चीन और फ्रांस जैसे विकसित राष्ट्रों में 'लीन मैनेजमेंट' और 'स्टैंड-अप मीटिंग्स' की सुदृढ़ परंपराएं रही हैं, जहां समय-प्रबंधन को उत्पादकता की पहली शर्त माना जाता है। भारत जैसे विशाल विविधता वाले देश में भी ऐसे वैश्विक मानकों को अपनाना अब अपरिहार्य हो चुका है। हालांकि, केंद्र सरकार की इस जन-हितैषी पहल की राह में चुनौतियां कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती औपनिवेशिक काल से चली आ रही अफसरशाही मानसिकता और यथास्थितिवाद की है। कनिष्ठ कर्मचारियों को खुलकर अपनी बात रखने का माहौल देना कागजों पर तो सरल है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इसके लिए अधिकारियों के दृष्टिकोण में व्यापक बदलाव की आवश्यकता होगी।
यदि इस नीति की कड़ाई से मॉनिटरिंग नहीं की गई, तो इसका हश्र भी लोक सेवा गारंटी कानून जैसा ही सुस्त हो सकता है, जहां नियम तो बने परंतु क्रियान्वयन लचर ही है। अब भी समय सीमा में आम लोगों के कार्य होते नहीं दिखते। व्यवस्थागत सुधार केवल आदेशों से नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मानुशासन से आते हैं। इसलिए सरकार को इन निर्देशों की अनुपालना के लिए एक पारदर्शी और डिजिटल ट्रैकिंग मैकेनिज्म भी विकसित करना चाहिए, जहां बैठकों के 'एक्शनेबल पॉइंट्स' और उनके परिणामों की नियमित ऑडिट की व्यवस्था हो। तभी 'गुड गवर्नेंस' का वास्तविक स्वप्न साकार हो सकेगा और सार्थक विमर्श से सरकारी कार्यक्षमता बढ़ेगी।
Published on:
30 Jun 2026 04:46 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
