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पश्चिम एशिया संकट की आंच भारतीय स्टार्टअप्स पर भी

युद्ध और क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण इन सॉवरेन वेल्थ फंड्स का ध्यान अब विदेशी बाजारों में जोखिम भरे उद्यमों से हटकर अपनी घरेलू आर्थिक सुरक्षा, रक्षा बजट और घरेलू तरलता बनाए रखने पर केंद्रित हो गया है।
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जयपुर

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Opinion Desk

Jun 27, 2026

indian startups

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राहुल लाल, (वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार)

भारत का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र पिछले 10 वर्षों में विश्व के सबसे गतिशील और नवाचार केंद्रित पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक के रूप में उभरा है। ऐतिहासिक रूप से भारत और पश्चिम एशिया के संबंध कच्चे तेल की आपूर्ति और प्रवासियों द्वारा भेजे जाने वाले रेमिटेंस तक सीमित माने जाते थे। परंतु बदलते आर्थिक परिदृश्य में भारतीय स्टार्टअप पश्चिम एशिया संकट की आंच को सीधे तौर पर महसूस कर रहा है।

वर्ष 2025 में भारतीय स्टार्टअप्स ने एक कठिन 'फंडिंग विंटर' से उबरते हुए लगभग 11 अरब डॉलर का निवेश आकर्षित किया था, जिससे बाजार में सुधार की उम्मीदें बंधी थी। लेकिन वर्ष 2026 में पश्चिम एशिया संकट के गहराने से भारतीय स्टार्टअप के लिए फंडिंग का नया संकट उभर आया। भू राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच निवेशक सतर्क हो गए और वे काफी सोच समझकर निवेश कर रहे हैं। 1 मार्च से 15 जून 2026 के बीच स्टार्टअप फंडिंग पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 43 फीसदी घटकर 7.81 अरब डॉलर रह गई।

सबसे ज्यादा मंदी अंतिम चरण की डील्स में देखी गई, जहां फंडिंग 61 प्रतिशत घटकर 3.8 अरब डॉलर से 1.5 अरब डॉलर रह गई। प्रारंभिक चरण की फंडिंग भी 71.4 करोड़ डॉलर से घटकर 29.2 करोड़ डॉलर रह गई। पिछले कुछ वर्षों में खाड़ी देशों विशेषकर सऊदी अरब के पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड (पीआईएफ) और संयुक्त अरब अमीरात के सॉवरेन वेल्थ फंड 'मुबाडाला' और 'अबूधाबी इनवेस्टमेंट अथॉरिटी (एआइडीए)' ने भारतीय स्टार्टअप्स में अरबों डॉलर का निवेश किया है। संकट के इस दौर में इन देशों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। युद्ध और क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण इन सॉवरेन वेल्थ फंड्स का ध्यान अब विदेशी बाजारों में जोखिम भरे उद्यमों से हटकर अपनी घरेलू आर्थिक सुरक्षा, रक्षा बजट और घरेलू तरलता बनाए रखने पर केंद्रित हो गया है। अनिश्चितता के माहौल में वैश्विक निवेशक 'रिस्क ऑफ' मोड में चले जाते हैं, जिसका सीधा असर भारत जैसे उभरते बाजारों पर पड़ता है।

पश्चिम एशिया संकट ने वैश्विक मुद्रास्फीति को बढ़ावा दिया है। परिणामत: अमरीकी फेडरल रिजर्व और अन्य केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरों को उच्च स्तर पर बनाए रखना पड़ रहा है। पिछले सप्ताह ही अमरीकी फेडरल रिजर्व ने मुद्रास्फीति को काबू रखने के लिए ब्याज दरों को उच्च स्तर पर बनाए रखा है और इस वर्ष के अंत तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना है। जब विकसित देशों में ब्याज दरें ऊंची होती हैंं, तो संस्थागत निवेशक विकासशील देशों के उच्च जोखिम वाले स्टार्टअप्स से पैसा निकालकर सुरक्षित बॉन्ड में निवेश करना बेहतर समझते हैं। इसे ही पूंजी की 'फ्लाइट टू सेफ्टी' कहते हैं। इस बहुआयामी संकट का सामने करने के लिए भारतीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को एक विशिष्ट रणनीति की आवश्यकता है। समाधान केवल सरकार या केवल स्टार्टअप के स्तर पर नहीं, बल्कि दोनों के समन्वित प्रयास से ही संभव है। स्टार्टअप्स के लिए यह समझना आवश्यक है कि वित्तीय अनुशासन अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण है। उन्हें 'यूनीकॉर्न' बनने की होड़ को छोड़कर 'सस्टेनेबल मॉडल' अपनाना होगा, जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रह सके। केवल एक बाजार या भौगोलिक क्षेत्र पर निर्भर न रहकर राजस्व विविधीकरण पर बल देना होगा।