
venezula earthquake
राकेश गांधी,(वरिष्ठ पत्रकार)
वेनेजुएला में हाल में आए भीषण भूकम्प ने पूरी मानवता को झकझोर दिया है। मृतकों और लापता लोगों के आधिकारिक आंकड़े भले ही बदलते रहे हों, लेकिन त्रासदी की गंभीरता निर्विवाद है। हजारों परिवार असहनीय पीड़ा से गुजर रहे हैं। ऐसे समय में संवेदना व्यक्त करने के साथ एक प्रश्न भी मन में उठता है कि क्या हम हर बड़ी आपदा से कोई स्थायी सबक सीखते हैं या फिर कुछ दिनों की चर्चा और संवेदना के बाद सब कुछ भूल जाते हैं?यह हमें एक बार फिर याद दिलाता है कि प्राकृतिक आपदाएं कभी कैलेंडर देखकर नहीं आतीं। वे न देश चुनती हैं, न मौसम और न समय। जब धरती कांपती है, नदियां उफान पर आती हैं या पहाड़ दरकते हैं, तब विकास के बड़े-बड़े दावे भी कुछ ही पलों में बिखर जाते हैं। ऐसे समय में किसी देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी आर्थिक समृद्धि नहीं बल्कि उसकी तैयारी होती है।
इस बार एक सकारात्मक पक्ष भी सामने आया। आधुनिक तकनीक ने कुछ क्षेत्रों में लोगों को भूकम्प के झटके महसूस होने से कुछ सेकंड पहले चेतावनी दी। सुनने में यह समय बहुत कम लगता है लेकिन आपदा की घड़ी में यही कुछ सेकंड जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन सकते हैं। स्पष्ट है कि विज्ञान इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे चेतावनी तंत्र को और अधिक सटीक, तेज और व्यापक बनाया जाए।
भारत के लिए यह विषय केवल एक अंतरराष्ट्रीय समाचार नहीं है। हमारा देश भी भूकम्प, बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं का लंबा इतिहास रखता है। 1993 का लातूर भूकम्प, 2001 का भुज भूकम्प, 2004 की सुनामी, 2013 की केदारनाथ त्रासदी तथा हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में आई अचानक बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं। इन घटनाओं का एक ही संदेश है कि प्रकृति को कभी हल्के में नहीं लिया जा सकता। वैज्ञानिक आज भी यह नहीं बता सकते कि किस दिन और किस समय भूकम्प आएगा। लेकिन वे वर्षों से यह अवश्य बता रहे हैं कि भारत का बड़ा हिस्सा भूकम्पीय दृष्टि से संवेदनशील है। देश का लगभग 60 प्रतिशत भूभाग किसी न किसी स्तर के भूकम्पीय जोखिम वाले क्षेत्र में आता है। इसका अर्थ यह है कि भविष्यवाणी भले संभव न हो, लेकिन पूर्व तैयारी पूरी तरह संभव है।
यहीं से एक और सवाल उभरता है। आज देश के लगभग हर शहर में कांक्रीट के विशाल जंगल तेजी से खड़े हो रहे हैं। बहुमंजिला आवासीय परिसर, व्यावसायिक भवन और ऊंचे टावर विकास की नई पहचान बन चुके हैं। लेकिन क्या हमने कभी गंभीरता से यह पूछा कि इन इमारतों की मजबूती केवल सामान्य परिस्थितियों के लिए है या किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के लिए भी? किसी भी भवन की असली परीक्षा उसके उद्घाटन के दिन नहीं होती। उसकी परीक्षा उस दिन होती है जब धरती कांपती है, जब अचानक बाढ़ आती है, जब तेज हवाएं चलती हैं या जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है। यदि उस समय भवन लोगों की जान बचा सके तो वही वास्तविक विकास है।
भारत में भूकम्परोधी निर्माण के लिए मानक और नियम मौजूद हैं। समस्या नियमों की कमी नहीं बल्कि उनके पालन की है। क्या हर बहुमंजिला इमारत वास्तव में उन्हीं मानकों के अनुसार बन रही है? क्या निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच होती है? क्या निर्माण पूरा होने के बाद संरचनात्मक सुरक्षा का स्वतंत्र परीक्षण किया जाता है? यदि इन सवालों का जवाब पूरी तरह संतोषजनक नहीं है तो चिंता स्वाभाविक है। निर्माण की गुणवत्ता के साथ किसी भी स्तर पर किया गया समझौता या लापरवाही अंततः निर्दोष नागरिकों के जीवन पर भारी पड़ सकती है। इसलिए सुरक्षा मानकों का पालन केवल कानूनी औपचारिकता नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है।
इस संदर्भ में सबसे बड़ी जिम्मेदारी शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर विकास न्यासों, नगर निगमों और भवन निर्माण की अनुमति देने वाली एजेंसियों की बनती है। किसी भी बहुमंजिला भवन को अनुमति देते समय केवल नक्शा और कागजी औपचारिकताएं पूरी कर लेना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। अनुमति तभी मिले जब प्रत्येक सुरक्षा मानक का पूरी ईमानदारी से पालन हुआ हो। विकास के नाम पर सुरक्षा से किया गया हर समझौता भविष्य में किसी बड़ी त्रासदी का कारण बन सकता है।
एक और सोच बदलने की आवश्यकता है। अक्सर यह मान लिया जाता है कि अमुक शहर में पहले कभी बड़ा भूकम्प नहीं आया इसलिए वहां खतरा कम है। यह आत्मसंतोष खतरनाक हो सकता है। धरती के भीतर क्या हलचल चल रही है, इसका पूरा रहस्य आज भी मानव नहीं जानता। जमीन के नीचे का शोर कब किस रूप में बाहर आएगा, इसका सटीक अनुमान किसी के पास नहीं है। इसलिए किसी क्षेत्र को केवल पुराने अनुभवों के आधार पर पूरी तरह सुरक्षित मान लेना एक बड़ी भूल हो सकती है।आज भवन निर्माण केवल भूकम्प को ध्यान में रखकर नहीं किया जा सकता। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अत्यधिक वर्षा, शहरी बाढ़, भूस्खलन, तेज हवाएं और अन्य प्राकृतिक चुनौतियों को भी निर्माण और नगर नियोजन का हिस्सा बनाना होगा। आने वाले समय के शहर बहुस्तरीय सुरक्षा की सोच के साथ ही सुरक्षित रह पाएंगे। अब समय आ गया है कि किसी भी बहुमंजिला भवन को उसकी ऊंचाई देखकर नहीं बल्कि उसकी सुरक्षा परखकर अनुमति दी जाए।
इतना ही नहीं, पहले से बनी इमारतों का समय-समय पर सुरक्षा परीक्षण भी आवश्यक है। अस्पताल, विद्यालय, सरकारी भवन, पुल, फ्लाईओवर और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक परिसरों का नियमित संरचनात्मक परीक्षण होना चाहिए। जहां कमजोरी मिले वहां समय रहते सुधार किया जाए। आपदा आने के बाद राहत और पुनर्वास पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने से कहीं अधिक बुद्धिमानी पहले से सुरक्षा पर निवेश करने में है।साथ ही नागरिकों को भी आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। विद्यालयों, कार्यालयों और आवासीय परिसरों में नियमित अभ्यास हों। आधुनिक चेतावनी प्रणाली गांवों तक पहुंचे। लोगों को यह पता हो कि संकट की पहली घड़ी में क्या करना है और क्या नहीं करना है। जागरूक समाज ही किसी भी आपदा के प्रभाव को कम कर सकता है।
प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उनसे होने वाली तबाही को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक सूचना तंत्र, मजबूत निर्माण मानक, कठोर निगरानी, ईमानदार प्रशासन और जागरूक नागरिकों का एक साथ काम करना आवश्यक है। प्रकृति कभी यह नहीं पूछती कि इमारत कितनी महंगी है, किस बिल्डर ने बनाई है या वह किस शहर में खड़ी है। वह केवल उसकी मजबूती की परीक्षा लेती है। इसलिए अब समय आ गया है कि विकास की परिभाषा बदल दी जाए। विकसित भारत की पहचान सबसे ऊंची इमारतों से नहीं बल्कि सबसे सुरक्षित इमारतों, सबसे जिम्मेदार नगर नियोजन और सबसे सजग नागरिकों से होगी। क्योंकि आपदा आने के बाद राहत देना व्यवस्था की मजबूरी होती है, लेकिन आपदा आने से पहले तैयारी करना एक दूरदर्शी राष्ट्र की संस्कृति और एक जिम्मेदार शासन की पहचान है।
Updated on:
27 Jun 2026 06:21 pm
Published on:
27 Jun 2026 05:27 pm
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