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रोहित कौशिक, (स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार)
पिछले कुछ समय से ऐसी कई घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं कि फ्लैट में अकेली रह रही वृद्ध महिला या वृद्ध पुरुष ने दम तोड़ दिया। लाश कई दिनों तक सड़ती रही। छह-सात दिनों बाद जब बदबू आई तो पड़ोस के लोगों ने पुलिस को सूचना दी। ऐसी खबर भी सामने आई कि जब विदेश में रह रहे पुत्र को भारत में अकेले रह रहे पिता की मृत्यु की खबर दी गई तो वह भारत आया ही नहीं। संवेदनहीनता की ये शर्मनाक घटनाएं कई सवाल खड़े करती हैं।
एक अनुमान के अनुसार भारत में वृद्ध जनसंख्या (60 वर्ष और उससे अधिक) वर्ष 2011 के 10 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2036 तक दोगुने से भी ज्यादा यानी 23 करोड़ हो जाएगी। उस समय लगभग हर सात में से एक भारतीय 60 वर्ष या उससे अधिक आयु का होगा। औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं और एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है। इस वजह से बुजुर्गों को पारिवारिक देखभाल नहीं मिल पाती है। मानसिक स्तर पर उन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अकेलापन एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है। कई बार बच्चों की बेरुखी बुजुर्गों को जख्म देती हैं तो कई बार उम्र के कारण एक अनजाना डर उनका आत्मविश्वास कम कर देता है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि भारत में लगातार वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ती जा रही है। कुछ परिवारों में दो पीढ़ी के बीच के अंतर को सहज रूप से नहीं लिया जाता है। यहीं से असली समस्या शुरू होती है। बच्चे यह नहीं समझ पाते हैं कि बुजुर्गों के विचार अपनी जगह सही हैं। उन्होंने कई तरह के संघर्षों से जूझकर अपना जीवन जिया है। कई मुद्दों पर पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच टकराव हो जाता है। कुछ परिवारों में बच्चे इस टकराव को टालकर बुजुर्गों के साथ सामंजस्य बैठा लेते हैं। दूसरी तरफ अनेक परिवारों में बच्चे विचारों के इस अंतर को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर बुजुर्गों को पिछड़ा हुआ घोषित कर देते हैं। ऐसे परिवारों में बच्चे धीरे-धीरे बुजुर्गों के साथ अपनी बातें साझा करना छोड़ देते हैं और उन्हें अलग-थलग छोड़ दिया जाता है। बच्चे यह नहीं सोच पाते हैं कि हमारे बुजुर्ग पिछड़े हुए नहीं है बल्कि अपने अनुभवों को हमारे साथ साझा कर रहे हैं।
यह कहा जाता है कि उम्र बढऩे के साथ बुजुर्गों का व्यवहार बच्चों जैसा हो जाता है। बुजुर्गों को यह महसूस होने लगता है कि उनकी उम्र ज्यादा नहीं बची है। इस आभास का उन पर मानसिक दबाव पड़ता है। इसके साथ ही इस उम्र में कई स्वास्थ्यगत समस्याएं भी सामने आने लगती हैं। यही कारण है कि उनका मानसिक स्तर वह नहीं रहता जो युवाओं का रहता है। इसलिए बच्चों को ही बुजुर्गों के साथ किसी न किसी तरह से सामंजस्य बैठाने की कोशिश करनी चाहिए। इसके विपरीत बच्चे यह अपेक्षा करते हैं कि बुजुर्ग बच्चों के साथ सामंजस्य बैठाएं। बुजुर्गों से यह अपेक्षा करना ही गलत है। इसी अपेक्षा के आधार पर बुजुर्गों से रूखा व्यवहार किया जाता है। अंतत: बुजुर्ग अपने परिवार से तंग आकर अलग रहना शुरू कर देते हैं या फिर वृद्धाश्रमों का रुख करते हैं। कई बार बच्चे ही बुजुर्गों को अकेला छोड़कर उनसे अलग रहना शुरू कर देते हैं। दरअसल बुजुर्गों के साथ भावनात्मक स्तर पर जुडऩे की जरूरत होती है लेकिन हम भावनात्मक स्तर पर ही उन्हें जख्म दे देते हैं।
कुछ मामलों में बच्चों की परवरिश में भी गलती होती है। माता-पिता नए दौर की प्रतिस्पर्धा के चक्कर में अपने बच्चों को व्यावहारिक नहीं बनाते। उनका सारा ध्यान इस बात पर रहता है कि बच्चे समाज और रिश्तेदारों से दूर रहकर सिर्फ पढ़ते रहें। ऐसे बच्चे अपने कॅरियर में तो सफल हो जाते हैं लेकिन अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में असफल हो जाते हैं। उनका सारा ध्यान अपने कॅरियर और अपनी सफलताओं पर ही रहता है। ऐसी स्थिति में बच्चे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर भागने लगते हैं। उन्हें अपने बुजुर्गों की जिम्मेदारी भी बोझ लगने लगने लगती है। भारतीय संस्कृति में परिवार का विशेष महत्व है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि कहीं हम अपने बुजुर्गों की भावनाओं को ठेस पहुंचाकर परिवार नामक संस्था को ही तो ठेस नहीं पहुंचा रहे हैं? बुजुर्गों से बेरुखी नहीं बल्कि उन्हें मानसिक संबल प्रदान करने की जरूरत है।
Published on:
30 Jun 2026 05:07 pm
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