
Soical Media
पूनम पांडे, स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार
सुबह आंख खुलने से पहले हाथ मोबाइल खोजता है। रात नींद आने तक अंगूठा स्क्रीन पर फिसलता रहता है। कभी किसी की विदेश यात्रा, कभी किसी का नया बंगला, कभी किसी की सालगिरह, कभी किसी का पुरस्कार, तो कभी किसी का मुस्कुराता हुआ ‘परफेक्ट’ परिवार। धीरे-धीरे यह सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा नहीं, हमारी मानसिकता का हिस्सा बन जाता है। हम दूसरों की सजाई हुई दुनिया देखते-देखते अपनी वास्तविक दुनिया से असंतुष्ट होने लगते हैं। सचमुच, सोशल मीडिया ने दुनिया को हथेली पर ला दिया, लेकिन कई बार उसी हथेली में मन की शांति भी फिसल गई। तकनीक स्वयं न अच्छी होती है, न बुरी। चाकू से फल भी काटे जाते हैं और घाव भी किए जाते हैं। दोष चाकू का नहीं, उसके उपयोग का है। यही बात सोशल मीडिया पर भी लागू होती है। उसने संवाद आसान किया, ज्ञान उपलब्ध कराया, दूर बैठे लोगों को जोड़ा, अनेक प्रतिभाओं को मंच दिया। लेकिन दूसरी ओर उसी ने तुलना, प्रदर्शन, लाइक और मान्यता की ऐसी दौड़ भी पैदा कर दी जिसमें मनुष्य स्वयं से ही हारने लगा।
मनोविज्ञान बताता है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसे स्वीकार किए जाने की आवश्यकता होती है। पहले यह स्वीकार परिवार, मित्रों और पड़ोस से मिलता था। आज वही स्वीकार ‘लाइक’, ‘कमेंट’ और ‘फॉलोअर’ की संख्या में मापा जाने लगा है। धीरे-धीरे आत्मसम्मान का आधार भीतर से हटकर बाहर चला जाता है। यदि किसी तस्वीर पर अपेक्षा से कम प्रतिक्रिया मिले, तो मन बुझ जाता है। यदि किसी दूसरे को अधिक प्रशंसा मिले, तो भीतर एक अदृश्य टीस उठती है। यह टीस बार-बार उठे तो चिंता और अवसाद का बीज बनने लगती है।
लोग अपनी सफलताओं का प्रदर्शन करते हैं, संघर्षों का नहीं
एक किशोरी प्रतिदिन अपनी तस्वीरें साझा करती थी। एक दिन उसकी तस्वीर पर सामान्य से कम प्रतिक्रियाएं मिलीं। उसने खाना कम कर दिया, मित्रों से दूरी बना ली और उसे लगने लगा कि अब वह सुंदर नहीं रही। चिकित्सकीय परामर्श के दौरान पता चला कि समस्या उसके चेहरे में नहीं, उसके मन में थी। उसने अपने मूल्य को डिजिटल प्रतिक्रियाओं से बांध दिया था। उपचार में सबसे पहले उसे यह सिखाया गया कि मनुष्य का मूल्य किसी स्क्रीन पर चमकते अंकों से नहीं तय होता।
यह केवल किशोरों की कहानी नहीं है। मध्य आयु का व्यक्ति भी इससे अछूता नहीं। मान लीजिए एक कर्मचारी प्रतिदिन अपने मित्रों की महंगी कारें, विदेश यात्राएं और आलीशान जीवन देखता है। उसे लगता है कि केवल वही पीछे रह गया है। धीरे-धीरे वह अपनी उपलब्धियों को भूलकर दूसरों की सफलता की सीढिय़ां गिनने लगता है। तुलना की यह आदत मन की दीमक है। बाहर से सब ठीक दिखता है, भीतर आत्मविश्वास खोखला होता जाता है।
कहावत है।‘दूर के ढोल सुहावने।’ सोशल मीडिया ने इन ढोलों की आवाज चौबीसों घंटे हमारे कानों तक पहुंचा दी है। लोग अपनी सफलताओं का प्रदर्शन करते हैं, संघर्षों का नहीं। कोई परीक्षा में असफल होने की तस्वीर नहीं डालता, कोई अस्पताल के बिलों का वीडियो नहीं बनाता, कोई वैवाहिक तनाव की रील नहीं बनाता। परिणाम यह कि देखने वाले को लगता है कि दुनिया के सारे फूल दूसरों की झोली में हैं और कांटे केवल उसके हिस्से आए हैं।
अंतर आभासी और वास्तविक निकटता का
एक बार एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग में कुछ युवाओं से कहा गया कि वे एक सप्ताह तक सोशल मीडिया का उपयोग सीमित कर दें और उस समय का उपयोग परिवार, पुस्तक, व्यायाम तथा मित्रों से प्रत्यक्ष बातचीत में करें। सप्ताह पूरा होने पर अधिकांश प्रतिभागियों ने स्वयं को पहले से अधिक शांत, कम तनावग्रस्त और अधिक संतुष्ट महसूस किया। इसका अर्थ यह नहीं कि सोशल मीडिया ही हर समस्या की जड़ है, बल्कि यह कि उसका अतिरेक मन की सहज लय को बिगाड़ सकता है।
अकेलापन भी आज एक बड़ी विडंबना बन गया है। हजारों डिजिटल मित्र होने के बावजूद मनुष्य भावनात्मक रूप से अकेला हो सकता है। पहले लोग शाम को चौपाल, आंगन, बरामदे या छत पर बैठकर बातें करते थे। अब एक ही कमरे में बैठे चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन पर व्यस्त हैं। शब्द कम हुए, इमोजी बढ़ गए। स्पर्श कम हुआ, स्टेटस अधिक हो गए। संबंधों की गर्माहट धीरे-धीरे डिजिटल औपचारिकता में बदलने लगी। एक बुजुर्ग ने बड़ी मार्मिक बात कही थी।‘बेटा रोज वीडियो कॉल कर लेता है, पर कई बार मन चाहता है कि वह बिना कैमरे के सचमुच मेरे समीप बैठकर बस चुपचाप चाय पी ले।’ यही अंतर आभासी और वास्तविक निकटता का है। बच्चों और किशोरों पर इसका प्रभाव और भी गहरा है। उनका व्यक्तित्व अभी निर्माण की अवस्था में होता है। यदि वे लगातार फिल्टर लगे चेहरे, अवास्तविक सौंदर्य और कृत्रिम जीवनशैली देखते हैं तो उन्हें अपना सामान्य चेहरा और सामान्य जीवन फीका लगने लगता है। शरीर के प्रति असंतोष, आत्मविश्वास में कमी और चिंता का यह चक्र धीरे-धीरे गंभीर मानसिक समस्या का रूप ले सकता है।
दिन में कुछ समय ‘स्क्रीन-मुक्त’ रखें
यह भी सच है कि हर दोष सोशल मीडिया का नहीं। यदि कोई व्यक्ति विवेकपूर्वक उसका उपयोग करे, समय की सीमा तय करे, विश्वसनीय जानकारी चुने, तुलना से बचे और वास्तविक संबंधों को प्राथमिकता दे, तो वही माध्यम सीखने, कमाने, सृजन करने और समाज से जुडऩे का शक्तिशाली साधन बन सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब साधन स्वामी बन बैठता है।
भारतीय जीवन-दर्शन हमेशा संतुलन की बात करता है। भगवतगीता का संदेश है कि संयम जीवन का आधार है। भोजन, निद्रा, कर्म और मनोरंजन। सबका संतुलित होना आवश्यक है। यही सिद्धांत डिजिटल जीवन पर भी लागू होता है। यदि मोबाइल हमारी जेब में रहे तो वह उपयोगी है, यदि हमारा मन मोबाइल की जेब में रहने लगे, तो संकट आरंभ हो जाता है।
इस चुनौती से निकलने के लिए कुछ छोटे लेकिन प्रभावी कदम अपनाए जा सकते हैं। दिन में कुछ समय ‘स्क्रीन-मुक्त’ रखें, भोजन के समय मोबाइल दूर रखें, सप्ताह में एक दिन डिजिटल विश्राम लें, पुस्तकें पढ़ें, प्रकृति में समय बिताएं, परिवार के साथ बिना मोबाइल के बातचीत करें, किसी शौक को पुनर्जीवित करें, नियमित व्यायाम और ध्यान करें। यदि लगातार उदासी, घबराहट, नींद की समस्या, निराशा या सामाजिक दूरी बनी रहे तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सहायता लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना शारीरिक स्वास्थ्य।
प्रश्न सोशल मीडिया का नहीं, मनुष्य की प्राथमिकताओं का
अंतत: प्रश्न सोशल मीडिया का नहीं, मनुष्य की प्राथमिकताओं का है। तकनीक हमारे जीवन की सहयात्री बने, सारथी नहीं। जीवन की सबसे सुंदर मुस्कान कैमरे के लिए नहीं, अपने लोगों के लिए होती है। सबसे मूल्यवान संवाद कमेंट बॉक्स में नहीं, आमने-सामने बैठकर होते हैं। सबसे बड़ी उपलब्धि हजारों फॉलोअर नहीं, कुछ ऐसे आत्मीय लोग हैं जिनके सामने हम बिना किसी फिल्टर के स्वयं बने रह सकें। स्क्रीन की रोशनी क्षणिक है, पर रिश्तों की ऊष्मा स्थायी है। आभासी दुनिया सुविधा दे सकती है, पर अपनापन नहीं, सूचना दे सकती है, पर आत्मीयता नहीं, मनोरंजन दे सकती है, पर मन का सुकून नहीं। इसलिए समय आ गया है कि हम डिजिटल दुनिया का उपयोग करें, उसके उपभोक्ता भर न बनें। क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी जरूरत तेज़ इंटरनेट नहीं, गहरे संबंध हैं, सबसे बड़ी उपलब्धि वायरल होना नहीं, भीतर से स्वस्थ और संतुलित होना है। आपको भी तो लगता है ना कि समाज वास्तव में प्रगतिशील कहलाएगा जो तकनीक के साथ-साथ मनुष्य के मन की भी रक्षा कर सके।
Published on:
01 Jul 2026 07:50 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
