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नश्तर: दरकता सिस्टम, दहकता सफर

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस वे पर दौसा के पास हुआ हादसा किसी एक गलती का नतीजा नहीं, इसके पीछे हैं कई चूकें और कई बेपरवाहियां। यह कोई पहली बार नहीं जब चलती बस आग का शोला बनी हो और यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही मौत ने घेर लिया हो।
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Dausa Road accident

Dausa Road accident

हरीश पाराशर

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस वे पर दौसा के पास हुआ हादसा किसी एक गलती का नतीजा नहीं, इसके पीछे हैं कई चूकें और कई बेपरवाहियां। यह कोई पहली बार नहीं जब चलती बस आग का शोला बनी हो और यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही मौत ने घेर लिया हो। चालक की लापरवाही, यातायात संकेतकों का अभाव और तकनीकी खामियां मिलकर बसों को चलते-फिरते लाक्षागृह बना रही हैं।

हमेशा की तरह दौसा के इस हादसे की जांच के भी रस्मी आदेश हुए हैं। जांच होगी तो कारण भी सामने आएंगे। जिम्मेदारी एक-दूसरे पर मढऩे व दोषियों को बचाने के जतन भी होंगे। सडक़ सुरक्षा के नाम पर अभियान भी चलेंगे। हर बार की तरह हादसों की रोकथाम के नए लक्ष्य तय होंगे। लेकिन जो सबसे ज्यादा जरूरी है वे काम नहीं होंगे। क्या इस बात की कोई चिंता करेगा कि अब कोई बस सडक़ों पर दौड़ते आग का गोला नहीं बनेंगी? राष्ट्रीय राजमार्गों पर गश्त को और प्रभावी करने के प्रयास होंगे। सभी यात्री बसों और खास तौर पर वातानुकूलित स्लीपर बसों में सुरक्षा के उपाय होंगे।

क्या बिना फिटनेस प्रमाण पत्र के किसी वाहन को सडक़ पर आने दिया जाएगा? क्या नशे में और तेज रफ्तार वाहन चलाने वालों के ड्राइविंग लाइसेंस स्थाई रूप से रद्द करने के काम होंगे। क्या राजमार्गों के संकेतक जहां जरूरत है वहां लगाए जा सकेंगे? ये तमाम सवाल ऐसे हैं जिन्हें धरातल पर उतारना मुश्किल काम नहीं है। लेकिन एक के बाद एक हो रहे हादसे बताते हैं कि पग-पग पर लापरवाही हो रही है।

दौसा के इस जानलेवा हादसे में भी प्रारंभिक तौर पर ओवरटेकिंग, तेज रफ्तार व बस के आपातकालीन गेट नहीं खुलने जैसे कारण सामने आए हैं। जब जांच होगी तो सडक़ निर्माण या यातायात संकेतकों की खामियां भी सामने आएंगी। देखा जाए तो यह महज एक हादसा नहीं बल्कि समूचे तंत्र की कमजोरियों व लापरवाहियों को आईना दिखाने वाला है।

आग का शोला बनी बस में अपनों को खो चुके परिवारों के दर्द का अंदाज लगाया जा सकता है। ऐसा दर्द जिसमें परिवारों के सपने भी आग के साथ ही राख हो गए। बड़ी पीड़ा यह कि जलकर मरने वालों की शिनाख्त तक मशक्कत भरा काम हो गया है। पहले भी जब चलती बसें इसी तरह आग का गोला बनीं तो समूचा परिवहन महकमा हरकत में आ गया था। पता चला कि यात्री बसों में आपातकालीन निकास द्वार तक बंद थे और वहां सीटें लगाकर कमाई का इंतजाम किया गया था। नींद के झोंके आने पर भी वाहन चलाते रहना नशे में वाहन चलाने जैसा ही है। ज्यादातर भीषण हादसों की वजह यह भी सामने आती है कि लम्बी दूरी से चलकर आए वाहन चालक को आराम का वक्त ही नहीं मिला। समय पर पहुंचने की पाबंदी सो अलग।

इसी दौसा एक्सप्रेस वे पर पिछली फरवरी में ही कार ट्रेलर में जा घुसी थी और ६ जनों की मौके पर ही मौत हो गई थी। हादसों की फेहरिस्त लम्बी है। सिर्फ इसी एक्सप्रेस वे की नहीं बल्कि समूचे प्रदेश की। कई वाहनों में ब्रेक, इंजन और वायरिंग से जुडीं खामियां रहती है। ये खामियां ही हादसे के बाद आग लगने की वजह बनती है। यह सही है कि हादसा किसी गलती की वजह से होता है। लेकिन गलती लोगों की मौत में बदल जाए वह ज्यादा चिंताजनक है। दुर्घटना के बाद ‘गोल्डन ऑवर’ यानी शुरुआती एक घंटे में घायलों को उपचार मिल जाए तो जान बचाई जा सकती है।

लेकिन राजमार्गों पर ट्रोमा सेंटर तो दूर एम्बुलेंस सेवाएं, फायर ब्रिगेड तक की मदद देर से पहुंचती है। सडक़ किनारे अवैध ढाबे, अतिक्रमण, बिना अनुमति बने कट एक्सप्रेस-वे पर बेतरतीब पेचवर्क, और बीच सडक़ पार्क किए जाने वाले वाहन भी जानलेवा साबित होते हैं।

जाहिर है आपातकालीन सेवाओं को भी मजबूत करना होगा। दुर्घटना संभावित ब्लैक स्पॉट्स तय करना ही काफी नहीं, इनकी पहचान कर वहां चेतावनी संकेत, कैमरे और रोशनी का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। हादसों पर शोक जताना अब पर्याप्त नहीं। अगर सरकार और प्रशासन ने तुरंत कठोर कदम नहीं उठाए तो हर नई बस, हर नया राजमार्ग मौत की नई पटकथा लिखेगा। सड़क और बसें सफर के लिए हैं, शवयात्रा के लिए नहीं।