3 जुलाई 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

‘सिल्वर इकोनॉमी’ को लेकर बने नेशनल पॉलिसी

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत में वर्तमान में लगभग 15 करोड़ वरिष्ठ नागरिक हैं और 2050 तक उनकी संख्या बढ़कर 34-35 करोड़ हो सकती है।
3 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

Jul 03, 2026

silver economy

silver economy

विजय गर्ग, (आर्थिक मामलोंके विशेषज्ञ)

भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कहा जाता है और उसका 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' भविष्य की आर्थिक शक्ति माना जाता है। यह सही है कि भारत के पास विशाल युवा आबादी है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। आने वाले दो-तीन दशकों में यही भारत तेजी से बड़ी बुजुर्ग आबादी वाले देशों में शामिल होगा। यह परिवर्तन भले ही धीमा हो, पर इसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव अत्यंत गहरे होंगे। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत में वर्तमान में लगभग 15 करोड़ वरिष्ठ नागरिक हैं और 2050 तक उनकी संख्या बढ़कर 34-35 करोड़ हो सकती है। यानी तब देश का लगभग हर पांचवां नागरिक 60 वर्ष से अधिक आयु का होगा। यह केवल जनसंख्या का बदलाव नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करने वाला बड़ा परिवर्तन है। इसी संदर्भ में 'सिल्वर इकोनॉमी" की अवधारणा महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

'सिल्वर इकोनॉमी' से आशय उन आर्थिक गतिविधियों से है जो वरिष्ठ नागरिकों की आवश्यकताओं और जीवनशैली पर आधारित हों। इसमें स्वास्थ्य, आवास, पर्यटन, वित्तीय सेवाएं, तकनीक, बीमा और देखभाल जैसी सेवाएं शामिल हैं। जापान और यूरोप ने यह समझ लिया कि बुजुर्ग केवल सामाजिक सुरक्षा के पात्र नहीं, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण उपभोक्ता और अनुभवी मानव संसाधन भी हैं। भारत में यह सोच अभी प्रारंभिक अवस्था में है। कुछ दशक पहले तक भारतीय समाज में बुजुर्गों को परिवार का आश्रित माना जाता था, लेकिन आज स्थिति बदल रही है। अनेक वरिष्ठ नागरिक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और यात्रा, नई तकनीक तथा सम्मानजनक जीवन जैसी अपनी आकांक्षाएं पूरी करना चाहते हैं। वहीं, एकल परिवारों और बच्चों के दूसरे शहरों या विदेशों में बसने से उनकी आवश्यकताएं भी बदल गई हैं। इसी कारण देश में सीनियर लिविंग, होम केयर, जेरियाट्रिक हेल्थकेयर और सिल्वर टूरिज्म जैसे नए क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहे हैं।

दस वर्ष पहले तक भारत में सीनियर लिविंग कम्युनिटी की अवधारणा लगभग नई थी, लेकिन आज बेंगलूरु, पुणे, चेन्नई, जयपुर, देहरादून और एनसीआर जैसे शहरों में ऐसे प्रोजेक्ट तेजी से विकसित हो रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल आवास उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जुड़ाव सुनिश्चित करना है। व्हीलचेयर-अनुकूल ढांचा, आपातकालीन सहायता, नियमित स्वास्थ्य सेवाएं और सामुदायिक गतिविधियां इन्हें विशिष्ट बनाती हैं। इसलिए यहां रहने वाले वरिष्ठ नागरिक स्वयं को वृद्धाश्रम का नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और सम्मानजनक समुदाय का हिस्सा मानते हैं। सिल्वर इकोनॉमी का सबसे बड़ा क्षेत्र स्वास्थ्य सेवा है। बढ़ती उम्र के साथ डायबिटीज, हृदय रोग, गठिया और डिमेंशिया जैसी दीर्घकालिक बीमारियां आम हो जाती हैं, जिनके लिए केवल अस्पताल आधारित व्यवस्था पर्याप्त नहीं रहती।
इसी कारण होम हेल्थकेयर सेवाएं तेजी से बढ़ रही हैं। लेकिन यहां एक बड़ा प्रश्न भी है- क्या यह सुविधाएं केवल सक्षम वर्ग तक सीमित रह जाएंगी? भारत के अधिकांश बुजुर्ग असंगठित क्षेत्र से आते हैं, जिनके पास न पेंशन है, न बीमा और न पर्याप्त बचत। इसलिए सिल्वर इकोनॉमी का वास्तविक अर्थ तभी सिद्ध होगा, जब इसके लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकें। सिल्वर इकोनॉमी की चर्चा अक्सर बाजार, निवेश और सेवाओं तक सीमित रहती है, जबकि वरिष्ठ नागरिकों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक 'अकेलापन' है।

महानगरों में अनेक बुजुर्ग आर्थिक रूप से सुरक्षित हैं, उनके पास घर, बचत और चिकित्सा सुविधाएं हैं, पर संवाद और साथ का अभाव है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अकेलेपन को सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती मानता है। मानसिक अवसाद, चिंता और स्मृति ह्रास जैसी समस्याएं इससे जुड़ी हैं। इसका समाधान केवल बाजार नहीं, बल्कि परिवार, समाज और सामुदायिक संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है। भारत सरकार ने सीनियरकेयर एजिंग ग्रोथ इंजन, अटल वयो अभ्युदय योजना और राष्ट्रीय वयोश्री जैसी योजनाओं के माध्यम से सकारात्मक पहल की है, लेकिन देश को एक समग्र 'नेशनल सिल्वर इकोनॉमी पॉलिसी' की आवश्यकता है। इसके तहत स्वास्थ्य बीमा को अधिक सुलभ बनाना, हर जिले में जेरियाट्रिक केयर सेंटर स्थापित करना और बुजुर्गों के लिए डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य अधिकार के रूप में विकसित करना जरूरी है। साथ ही, सेवानिवृत्त अनुभवी नागरिकों को शिक्षा, प्रशासन, कृषि और सामाजिक क्षेत्रों से जोडऩे के लिए नेशनल सिल्वर वॉलंटियर फोर्स जैसी व्यवस्था भी उपयोगी हो सकती है।

अंतत: किसी भी राष्ट्र की सभ्यता का मूल्यांकन इस बात से होता है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। भारत के सामने अवसर भी है और चुनौती भी कि वह बुजुर्गों को बोझ नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक पूंजी के रूप में देखे। यह केवल नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और मानवीय गरिमा का प्रश्न है। प्रश्न यही है कि जब भारत वास्तव में वृद्ध होगा, तब क्या वह अपने बुजुर्गों को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन दे पाएगा?