लोकसभा की याचिका समिति की रिपोर्ट के अनुसार बैंकों ने न्यूनतम शेष राशि न रखने पर आम ग्राहकों से हजारों करोड़ रुपये वसूले हैं। इसे अनैतिक और उपभोक्ता-विरोधी बताया गया है। सरकार और नियामक से दंडात्मक शुल्क समाप्त कर पारदर्शी व जवाबदेह बैंकिंग व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
भारतीय बैंकिंग प्रणाली पर लोकसभा की याचिका समिति ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि बैंकिंग की कार्यशैली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। ऐसा लगता है कि बैंकों में 'सेवा' से अधिक 'वसूली' को प्राथमिकता दी जा रही है। पिछले पांच वर्षों में बचत खातों में न्यूनतम शेष राशि (मिनिमम बैलेंस) न रख पाने के एवज में आमजन से 11 हजार करोड़ रुपए से अधिक की वसूली करना किसी भी कल्याणकारी अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। यह राशि उन करोड़ों निम्न-मध्यम आय वाले खाताधारकों की गाढ़ी कमाई का हिस्सा है, जिन्हें बैंकिंग सेवाओं से जोड़ते समय आसान व सुलभ वित्तीय भविष्य के सपने दिखाए गए थे। विडंबना है कि यह वसूली उस वर्ग से की गई, जो पहले से ही आर्थिक तंगी के कारण अपने खाते में कुछ हजार रुपए भी सुरक्षित नहीं रख पा रहा था।
समिति की रिपोर्ट में यह तथ्य सबसे अधिक परेशान करने वाला है कि यह वसूली अक्सर 'हिडन चार्जेज' के नाम पर की जाती है, जिसकी भनक ग्राहकों को तब लगती है जब उनके खाते से रकम कट चुकी होती है। आधुनिक डिजिटल युग में, जहां पारदर्शिता को बैंकिंग का मूल आधार माना जाना चाहिए, वहां सूचना के अभाव में इस तरह की दंडात्मक कार्रवाई अनैतिक भी है। निजी क्षेत्र के बैंकों का यह रवैया और भी संदेहास्पद है कि उनके पास पुराने रेकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं, जबकि वित्तीय वर्ष 2024-25 में उन्होंने 2772 करोड़ रुपए से अधिक की वसूली की है। बड़े निजी बैंकों की ओर से हजारों करोड़ रुपए केवल जुर्माने के रूप में वसूलना यह दर्शाता है कि बैंकों के लाभ का एक बड़ा हिस्सा अब सेवाओं के बदले नहीं, बल्कि ग्राहकों की मजबूरियों व चूक के दंड से आ रहा है।
लोकसभा की याचिका कमेटी की इस जुर्माने को पूरी तरह समाप्त करने की सिफारिश एक स्वागत योग्य कदम है। समिति ने इसे आम उपभोक्ताओं पर 'अतिरिक्त बोझ' करार दिया है, जो पूरी तरह तर्कसंगत है। एक बचत खाताधारक का बैंक के साथ संबंध भरोसे का होता है, न कि डर का। यदि न्यूनतम राशि न रख पाने पर ग्राहक को दंडित किया जाता है, तो यह उसे औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से दूर धकेलने जैसा है। सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को अब इस दिशा में कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। बैंकिंग क्षेत्र की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसने दंड शुल्क से कितना राजस्व एकत्र किया, बल्कि इस बात से आंका जाना चाहिए कि उसने कितने नागरिकों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया। बैंकों को यह समझना होगा कि वे समाज के प्रति भी उत्तरदायी हैं। यदि कोई खाताधारक न्यूनतम राशि नहीं रख पा रहा है, तो बैंक का प्राथमिक कर्तव्य उसे दंडित करना नहीं, बल्कि उसे बेहतर वित्तीय प्रबंधन के लिए जागरूक करना या उसे ऐसे बचत खाते की ओर मोड़ना होना चाहिए, जहां न्यूनतम शेष की बाध्यता नहीं होती।