
मानसिक स्वास्थ्य
कृष्ण प्रताप सिंह - स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
आत्महत्या आज के समय में एक गंभीर सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। तेजी से बदलती जीवनशैली, प्रतिस्पर्धा का दबाव और सामाजिक अपेक्षाएं कई बार व्यक्ति को भीतर से तोड़ देती हैं। यहीं नहीं, अब सामूहिक आत्महत्या के मामलों में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है।
पिछले दिनों मथुरा के एक गांव में एक ही परिवार के पांच सदस्यों की सामूहिक आत्महत्या की खबर ने विचलित कर दिया। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक देश में हर चार मिनट से भी कम में अपनी जिंदगी या जीवन स्थितियों से हताश-निराश कोई न कोई व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है। दिहाड़ी मजदूरों और किसानों की आत्महत्याएं समस्या का दूसरा ही पहलू सामने लाती हैं। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो मनोविकारों या मनोरोगों से पीडि़त और अवसादग्रस्तों को छोड़ दें तो कोई भी व्यक्ति यों ही अपने जीवन का अंत नहीं करता। वह तब तक अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश करता है, जब तक उसे लगता है कि उसके सामने उपस्थित रात की कोई न कोई सुबह जरूर है। उसका यह विश्वास बनाए रखने में आसपास के परिवेश, परिजनों और प्रियजनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब वे यह भूमिका नहीं निभा पाते और संबंधित व्यक्ति इस निष्कर्ष तक पहुंच जाता है कि अब उसकी कोई सुबह नहीं बची, तभी वह आत्महत्या के फैसले तक पहुंचता है।
हम जिस सामाजिक ताने-बाने में रह रहे हैं, उसमें हत्याएं (जो आत्महत्याओं की अपेक्षा बहुत कम होती हैं) रोकने या अपराधियों को दंड दिलाने के लिए तो कई कानून प्रवर्तन एजेंसियां, जेल व न्यायालय हैं, लेकिन आत्महत्याओं के विरुद्ध कोई कारगर तंत्र बनाने पर विचार तक नहीं किया जाता। बस, साल में एक दिन आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाकर कर्तव्य समाप्त मान लिया जाता है। मानसिक अवसाद आत्महत्याओं का सबसे बड़ा कारक है। अभी तक उन समूहों को ठीक से चिह्नित करने का काम भी पूरा नहीं हुआ है, जिनमें आत्महत्या की दर या आशंकाएं अधिक देखी गई हैं।
परीक्षाओं में विफल छात्र, पारिवारिक तनाव से जूझते पुरुष-महिलाएं, जटिल परिस्थितियों में तनाव के बीच काम करने वाले सैन्य व अर्धसैनिक बलों के जवान और थोड़े से वेतन में जिंदगी को जैसे-तैसे घसीटते रहने को अभिशप्त लोगों की संख्या आत्महत्या करने वालों में अधिक है। आंकड़ों के अनुसार आत्महत्या करने वालों में 67 प्रतिशत लोग 18 से 45 साल की उम्र के बीच के होते हैं और उनमें पढ़े-लिखे लोगों की संख्या भी कम नहीं होती। केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से हेल्पलाइन नंबर एवं जागरूकता अभियान चलाने के बावजूद गांवों-कस्बों और दूरदराज के क्षेत्रों के साथ महानगरों तक में हालात चिंताजनक हैं।
आत्महत्या एक गहरे टूटे हुए मन की पुकार है। जब हमारे बीच कोई किसान, बेरोजगार, महिला, पुरुष, वयस्क या अवयस्क इस हद तक निराश हो जाता है कि उसे जीवन से अधिक मृत्यु आसान लगने लगे, तो यह संकेत है कि उसे सहारा, संवाद और संवेदना की जरूरत है। यह केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे अकेलेपन को पनपने न दे। बढ़ती घटनाएं हमें चेतावनी ही नहीं, समय रहते मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने का, सहयोग की संस्कृति बनाने का और ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करने का अवसर भी देती हैं, जहां हर व्यक्ति खुद को सुने और समर्थित महसूस करे। हम मिलकर संवेदनशील, सहायक और जागरूक समाज का निर्माण करें।
Published on:
14 Feb 2026 02:19 pm
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