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AI in Bollywood Industry: एआइ से कितना बदलेगा सिनेमा?

एआई तकनीक सिनेमा को तेजी से बदल रही है। कम बजट में वर्चुअल अभिनेता, आवाज और भव्य सेट तैयार करना संभव हो गया है। जहां यह युवा फिल्मकारों के लिए अवसर है, वहीं कलाकारों के भविष्य और भावनात्मक जुड़ाव पर सवाल भी खड़े करता है। सिनेमा का भविष्य एआई से जुड़ा जरूर है, पर पूरी तरह उसी पर निर्भर नहीं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Feb 14, 2026

AI Generated Film India

आपके पास एक कहानी होनी चाहिए या फिर एक गीत, फिर एआइ उसे आपका मनचाहा आकार दे सकता है।

विनोद अनुपम - राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक,

क्या यह सिनेमा का भविष्य है, जिसमें हम अपनी पसंद के अभिनेता-अभिनेत्री तैयार कर सकते हैं, अपनी पसंद की आवाज में गीत तैयार कर सकते हैं, अपनी सुविधा से म्यूजिक बना सकते हैं… कोई कापीराइट का मामला नहीं। सब कुछ आपके हाथों क्रिएटेड, आपका अपना। प्रयोग धर्मी फिल्मकार प्रतीक शर्मा दो साल पहले 3.15 मिनट का एक वीडियो एआइ से तैयार किया था, जिसमें मनुष्य की भागीदारी सिर्फ गीत के बोल और परिकल्पना तक थी। बाकी सब के सब एआइ पर कमांड का कमाल है। मतलब गायिका की आवाज, संगीत कंपोजिशन, लोकेशन, अभिनेता सब कुछ। उस समय इंडस्ट्री के लिए यह थोड़ा चौंकाने वाला भी था और भयभीत करने वाला भी कि जब पूरी फिल्म ही मशीन पर बनने लगेगी फिर इंडस्ट्री में काम कर रहे लाखों कलाकार स्टार से लेकर स्पाटबॉय तक आखिर क्या करेंगे।

जब शुरुआत से अंत तक फिल्म एक लैपटॉप पर ही बन जानी है, फिर कोई शहर क्यों बसाए सिनेमा के लिए। प्रतीक वहीं नहीं रुके उन्होंने बाद में प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' पर एक खूबसूरत शार्ट फिल्म बनाकर एआइ की असीम संभावनाओं को भी रेखांकित किया। उस समय कतई यह अंदाजा नहीं था कि कुछेक दिनों बाद ही देश एआइ जनरेटेड फीचर फिल्म के लिए तैयार हो जाएगा, टेलीविजन पर एआइ जनरेटेड शो आने लगेंगे। लेकिन बीते कुछेक महीनों में यह सबकुछ संभव होता गया। भारत की पहली एआइ जनरेटेड फीचर फिल्म 'नाइसा' विवेक अंचलिया के निर्देशन में बनकर तैयार हो गई। मतलब आपको अपनी फिल्म के लिए स्टार चाहिए, लेकिन बजट इजाजत नहीं दे रहा तो एआइ की मदद से वैसा ही कुछ तैयार कर सकते हैं।

जाहिर है धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्मों के लिए जहां भव्य सेट और महंगे कॉस्ट्यूम की आवश्यकता होती है, एआइ किसी वरदान से कम नहीं। वास्तव में मौलिकता एआइ की सीमा है। आपके पास एक कहानी होनी चाहिए या फिर एक गीत, फिर एआइ उसे आपका मनचाहा आकार दे सकता है। जाहिर है, एक अर्थ में कहें तो युवा फिल्मकार जो अपने गांव में, अपनी जमीन पर रहकर अपनी कहानी परदे पर दिखाना चाहते हैं, उनके लिए तो यह वरदान है। हालांकि एआइ की सहूलियतें हैं तो खतरे भी, खासकर सिनेमा जैसी रचनात्मक विधा में। एआइ से नायक-नायिका तो गढ़ लिए जाएंगे, लेकिन इमोशन देखने के आदि भारतीय दर्शक उन कृत्रिम चेहरों से कितना रिलेट कर पाएंगे, आने वाले दिन तय करेंगे।

सवाल यह भी है कि क्या जिस तरह हम मुकेश से लेकर अरिजीत सिंह की आवाज या अक्षय कुमार तक के चेहरे से हम एक इमोशन महसूस कर पाते हैं। दक्षिण में जिस तरह अपने सितारों के लिए प्रशंसक जान देने तक को आतुर हो जाते, वह अहसास एआइ जनित आवाज-चेहरे से कैसे आ सकता? जाहिर है भविष्य में एआइ का भी सिनेमा होगा, पर सिनेमा का भविष्य एआइ में नहीं हो सकता।