
आधुनिक आर्थिक इतिहास का एक निर्विवाद सत्य है- जब तकनीक का यथार्थ वित्तीय बाजारों के अति-उत्साह और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का बंधक बन जाता है, तब बुलबुलों का फूटना अवश्यंभावी हो जाता है। वर्ष 2000 में इंटरनेट क्रांति के शुरुआती दौर में दुनिया ऐसा ही 'डॉट कॉम' संकट देख चुकी है, जब रातोंरात बनी कंपनियों के शेयर आसमान छूकर अचानक कौडिय़ों के भाव आ गए थे। ठीक 26 वर्ष बाद शंघाई और शेनझेन के वित्तीय गलियारों में एआइ के आधार पर वैसा ही एक मायाजाल रच दिया गया। शंघाई स्टॉक एक्सचेंज का टेक प्रधान 'स्टार 50' इंडेक्स, जिसे चीन का नैस्डेक कहा जाता है, अपने उच्चतम स्तर से 40 प्रतिशत से अधिक टूट चुका है। महज कुछ ही दिनों के अंतराल में चीनी टेक और सेमीकंडक्टर सेक्टर के बाजार पूंजीकरण से लगभग 480 अरब डॉलर अर्थात तकरीबन 40 लाख करोड़ रुपया पूरी तरह स्वाहा हो गए। इसे दुनियाभर में 'चीनी एआइ बुलबुले का फूटना' कहा जा रहा है। बीजिंग द्वारा 'न्यू प्रोडक्टिव फोर्सेज' के नारे तहत पोषित यह तकनीकी उन्माद अंतत: जमीनी हकीकत से टकरा गया है।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में आई यह दरार ऐसे नाजुक मोड़ पर उभरी है, जब संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही मुद्रास्फीति, भू-राजनीतिक तनाव और अनिश्चित ब्याज दरों के दोहरे दबाव से जूझ रही है। वॉल स्ट्रीट से लेकर फ्रैंकफर्ट तक के वित्तीय नीति-निर्माता अब इस आशंका से घिरे हैं कि क्या चीनी एआइ बुलबुले का यह विस्फोट सिलिकॉन वैली के खरबों डॉलर के एआइ पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) पर भी सवाल खड़े करेगा और 2008 के संकट की भांति वैश्विक मंदी की एक नई शृंखला को जन्म देगा? चीन में एआइ बूम की बुनियाद दरअसल आर्थिक से अधिक राजनीतिक और भू-रणनीतिक थी। रियल एस्टेट क्षेत्र के ऐतिहासिक संकट (एवरग्रांडे और कंट्री गार्डन के पतन) के बाद घरेलू पूंजी को एक नए सहारे की आवश्यकता थी।
सरकारी बैंकों, स्थानीय निकायों और राज्य-समर्थित फंड्स ने अरबों युआन बिना किसी ठोस वित्तीय अनुशासन के एआइ स्टार्टअप्स की झोली में डाल दिए। परिणामस्वरूप, वित्तीय बाजारों में एक अवास्तविक तेजी का जन्म हुआ। मिनीमैक्स, बाइचुआन और झिपू जैसी दर्जनों मॉडल लैब्स ने यूनिकॉर्न का दर्जा पा लिया, जबकि उनके पास वास्तविक राजस्व या परिचालन लाभ का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं था। शंघाई और शेनझेन के दैनिक इक्विटी कारोबार का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले एआइ-संबद्ध शेयरों में सिमट गया था। प्रतिद्वंद्विता की दौड़ में सबसे घातक मोड़ तब आया जब बाइडू , अलीबाबा, टेनसेंट और बाइटडांस जैसे दिग्गजों ने अपने लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स के एपीआइ टोकन की कीमतों में 90 से 99 प्रतिशत तक की भारी कटौती कर दी। इस कदम ने बौद्धिक संपदा को एक कमोडिटी बना दिया। इससे छोटे और मध्यम आकार के स्टार्टअप्स का कैश बर्न रेट असहनीय हो गया। उनका बिजनेस मॉडल ताश के पत्तों की तरह ढह गया। अमरीकी प्रतिबंधों ने उन्नत चिप्स और चिप-मेकिंग उपकरणों के चीन निर्यात पर सख्त पाबंदी लगा दी। हार्डवेयर की इस दुर्गम बाधा ने चीनी मॉडल्स की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता को पंगु बना दिया।
जब तिमाही वित्तीय आंकड़े सामने आए और यह साफ हुआ कि खरबों युआन के निवेश के बावजूद कंपनियां मुनाफा तो दूर, परिचालन लागत भी नहीं निकाल पा रही हैं, तो संस्थागत विदेशी निवेशकों ने बड़े पैमाने पर पूंजी निकालना शुरू कर दिया। लगभग 90 अरब युआन का शुद्ध विदेशी आउट फ्लो हुआ, जिसने उस भ्रम को तोड़ दिया जिसे सरकारी प्रचार ने खड़ा किया था। चीनी 'एआइ बुलबुले का फूटना' वॉल स्ट्रीट के लिए भी 'वेक-अप कॉल' है। वर्तमान में अमरीकी टेक दिग्गज- माइक्रोसॉफ्ट, अल्फाबेट, मेटा और अमेजन- वार्षिक रूप से लगभग 200 अरब डॉलर से अधिक का पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) केवल एआइ इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटरों पर कर रहे हैं। चीनी एआइ बुलबुले फूटने के बाद अमरीका में भी वैश्विक संस्थागत निवेशक अब खुले तौर पर यह पूछ रहे हैं कि इन सैकड़ों अरब डॉलर के डेटा सेंटरों से वास्तविक रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट कब मिलेगा? यदि वॉल स्ट्रीट पर 15 से 20 प्रतिशत का सुधार होता है, तो उसका वेल्थ इफेक्ट सीधे तौर पर अमरीकी उपभोक्ता मांग को घटाएगा।
चीन में एआइ बुलबुले के फूटने और टेक शेयरों में आई भारी गिरावट का असर भारत पर एकतरफा नहीं, बल्कि दोधारी तलवार की तरह पड़ रहा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कुछ गंभीर चुनौतियां लेकर आया है, तो साथ ही रणनीतिक बढ़त हासिल करने के दुर्लभ अवसर भी खोल रहा है। सबसे बड़ा तात्कालिक जोखिम भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स और हार्डवेयर विनिर्माण के समक्ष खड़ा हो सकता है। चीन के घरेलू बाजार में मांग घटने और भारी अतिरिक्त क्षमता (ओवरकैपेसिटी) जमा होने के कारण वहां की कंपनियां नुकसान से बचने के लिए अपने नेटवर्किंग उपकरण, सेंसर, चिप्स और ऑप्टिकल हार्डवेयर को औने-पौने दामों पर विदेशी बाजारों में उतार सकती हैं। यदि यह 'डंपिंगÓ भारतीय बाजार में बिना रोक-टोक होती है, तो सरकार की 'पीएलआइ' योजना के तहत अपने पैर जमा रहे घरेलू हार्डवेयर स्टार्टअप्स और स्थानीय विनिर्माताओं के लिए मूल्य प्रतिस्पर्धा में टिक पाना बेहद कठिन हो जाएगा। दूसरा दबाव सेवा क्षेत्र और वित्तीय बाजारों पर आ सकता है। शंघाई और शेनझेन के बाजारों में एआइ बुलबुले का फूटना तकनीक की विफलता नहीं, बल्कि वित्तीय लालच और राज्य-निर्देशित पूंजी के बेलगाम प्रवाह की विफलता है। एआइ एक क्रांतिकारी तकनीक है, लेकिन यह वित्तीय तंत्र के बुनियादी नियमों को नहीं बदल सकती-मुनाफा अंतत: राजस्व और लागत के संतुलन से ही तय होगा, प्रचार से नहीं।
राहुल लाल,(वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार)