
fertility tourism
मातृत्व और पितृत्व की चाह दुनिया की सबसे स्वाभाविक मानवीय आकांक्षाओं में से एक है, लेकिन बदलती जीवनशैली, देर से विवाह, बढ़ती उम्र, तनाव और प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं ने लाखों दंपतियों के लिए संतान प्राप्ति की राह कठिन बना दी है। ऐसे में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, विशेषकर इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आइवीएफ), उम्मीद की नई किरण बनकर उभरा है। दिलचस्प बात यह है कि अब भारत केवल अपने नागरिकों के लिए ही नहीं, बल्कि विदेशी दंपतियों के लिए भी प्रजनन उपचार का एक आकर्षक केंद्र बनता जा रहा है। अपेक्षाकृत कम खर्च, प्रशिक्षित चिकित्सक, आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और उपचार के विविध विकल्प भारत में फर्टिलिटी टूरिज्म को बढ़ावा दे रहे हैं। हालांकि, इस बढ़ते कारोबार के बीच उपचार की सफलता, चिकित्सा नैतिकता, कानूनी जटिलताओं और आम भारतीयों की पहुंच जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण हो गए हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में लगभग हर छह में से एक वयस्क अपने जीवनकाल में बांझपन की समस्या का सामना करता है। यह स्थिति केवल विकसित देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि विकासशील देशों में भी प्रजनन संबंधी समस्याएं गंभीर चुनौती बन रही हैं। भारत वैश्विक फर्टिलिटी टूरिज्म के मानचित्र पर अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है। वर्तमान में, 30 से अधिक देशों के मरीज भारत में आइवीएफ सहित प्रजनन उपचार कराने पहुंच रहे हैं। इनमें अफ्रीकी देशों, ब्रिटेन, अमरीका, यूरोप और पड़ोसी देशों के मरीज शामिल हैं। भारत में उपलब्ध चिकित्सा विशेषज्ञता और अपेक्षाकृत सस्ती उपचार सुविधाएं विदेशी मरीजों के आकर्षण का प्रमुख कारण हैं। भारत में आइवीएफ उपचार की लागत कई विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। एक क्लीनिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एक आइवीएफ चक्र का खर्च लगभग 2.3 लाख रुपए है, जबकि अमरीका में यह लगभग 14 लाख रुपए और ब्रिटेन में करीब 10 लाख रुपए तक है। इन आंकड़ों के आधार पर अमरीका की तुलना में भारत में उपचार लगभग 84 प्रतिशत और ब्रिटेन की तुलना में लगभग 77 प्रतिशत सस्ता पड़ सकता है। भारत में आइवीएफ उपचार कराने आने वाले विदेशी मरीजों में लगभग 49 प्रतिशत अफ्रीकी देशों से संबंधित हैं। इनमें नाइजीरिया, केन्या और अन्य देशों के मरीज शामिल हैं। ब्रिटेन और यूरोप से लगभग 25 प्रतिशत तथा अन्य देशों से भी मरीज भारत पहुंच रहे हैं। भारत के लिए यह केवल चिकित्सा सेवाओं के निर्यात का अवसर नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने का माध्यम भी बन सकता है। विदेशी मरीजों की बढ़ती संख्या के साथ उनकी भाषा, परामर्श, कानूनी जानकारी और उपचार के बाद देखभाल की सुविधाएं विकसित करना जरूरी होगा।
फर्टिलिटी टूरिज्म का आर्थिक प्रभाव आइवीएफ केंद्रों तक सीमित नहीं रहता। विदेशी मरीजों के आगमन से अस्पतालों, डायग्नोस्टिक प्रयोगशालाओं, दवा कंपनियों, होटल व्यवसाय, परिवहन और अन्य सेवाओं की मांग बढ़ती है। इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं। भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय फर्टिलिटी केंद्र बनाने के लिए उपचार के परिणामों की मानकीकृत रिपोर्टिंग, पारदर्शी शुल्क व्यवस्था और स्वतंत्र गुणवत्ता मूल्यांकन पर जोर देना चाहिए। भारत में प्रजनन उपचार का विस्तार कानूनी और नैतिक दृष्टि से भी संवेदनशील है। सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 तथा सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के अंतर्गत विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं। आइवीएफ उपचार और सरोगेसी को एक समान नहीं माना जा सकता। विदेशी नागरिकों के लिए उपचार की पात्रता, दाता संबंधी प्रावधान, दस्तावेजी आवश्यकताएं और अन्य कानूनी शर्तें महत्वपूर्ण हैं। इसलिए अस्पतालों और चिकित्सा पर्यटन एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे मरीजों को भारत के लागू कानूनों तथा उनके अपने देश के नियमों के बारे में स्पष्ट जानकारी दें।
फर्टिलिटी टूरिज्म का बढ़ता आकर्षण देश की चिकित्सा विशेषज्ञता, प्रतिस्पर्धी लागत और स्वास्थ्य सेवाओं की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता का संकेत है। इससे निवेश, रोजगार और चिकित्सा पर्यटन को नई गति मिल सकती है। भारत को ऐसा प्रजनन चिकित्सा केंद्र बनना होगा, जहां कम खर्च के साथ उच्च गुणवत्ता, पारदर्शी परिणाम, कानूनी सुरक्षा और मानवीय संवेदनशीलता भी उपलब्ध हो। साथ ही यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि विदेशी मरीजों के लिए विकसित हो रही सुविधाओं का लाभ भारतीय परिवारों तक भी पहुंचे।
सतीश सिंह,(बैंकिंग एवं आर्थिक विषयों के जानकार)
Updated on:
4 Nov 2026, 6:03 PM IST
Published on:
4 Nov 2026, 6:03 PM IST
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