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सर्कुलर इकोनॉमी को बनाना होगा जीवनशैली का हिस्सा

सर्कुलर इकोनॉमी से तात्पर्य उत्पादों एवं संसाधनों का पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण (रिसायक्लिंग) तथा अपशिष्ट को उपयोगी संसाधनों में परिवर्तित करना है। पारंपरिक ‘उपयोग करो और त्याग दो’ व्यवस्था के स्थान पर यह प्रणाली संसाधनों के कुशल उपयोग और पुनर्निर्माण पर बल देती है।

4 min read
May 29, 2026
circular economy

प्रो. मिलिंद कुमार शर्मा एवं डॉ. प्रदीप कुमार
एम.बी.एम. विश्वविद्यालय, जोधपुर

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पश्चिम एशिया का वर्तमान संकट केवल ईंधन आपूर्ति ही नहीं, बल्कि विश्व की संपूर्ण आपूर्ति शृंखला को भी प्रभावित कर रहा है। इसी संदर्भ में आज पूरे विश्व में ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ विषय पर गंभीर चर्चा होना स्वाभाविक है। सर्कुलर इकोनॉमी से तात्पर्य उत्पादों एवं संसाधनों का पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण (रिसायक्लिंग) तथा अपशिष्ट को उपयोगी संसाधनों में परिवर्तित करना है। पारंपरिक ‘उपयोग करो और त्याग दो’ व्यवस्था के स्थान पर यह प्रणाली संसाधनों के कुशल उपयोग और पुनर्निर्माण पर बल देती है। इसका उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा की बचत, व्यय में कमी तथा भविष्य के लिए सशक्त, सुरक्षित और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण करना भी है।
विश्वभर में सर्कुलर इकोनॉमी की ओर बढ़ते आकर्षण का सबसे बड़ा कारण वैश्विक ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ता तनाव है। पश्चिम एशिया, जो विश्व का प्रमुख तेल एवं गैस भंडार है, आज संघर्ष और अस्थिरता का केंद्र बना हुआ है। ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में परिवहन प्रभावित होने से विश्व भर में तेल एवं गैस की आपूर्ति बाधित हो रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि का प्रभाव अब भारत में भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के महंगे होने से तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ा है, जिसके परिणामस्वरूप तेल विपणन कंपनियों के बढ़ते घाटे को देखते हुए हाल के समय में ईंधन की कीमतों में कई बार वृद्धि करनी पड़ी है।


महंगाई अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसमें से लगभग 40 प्रतिशत से अधिक तेल एवं गैस ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ मार्ग से आता है। इसके अतिरिक्त भारत अपनी एलपीजी एवं एलएनजी गैस आवश्यकता का बड़ा भाग कतर तथा अन्य पश्चिम एशियाई देशों से प्राप्त करता है। सामान्यत: यह देखा गया है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो उसका अतिरिक्त भार प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से आम जनता पर पड़ता है। तेल एवं गैस के महंगे होने से परिवहन खर्च बढ़ जाता है, किसानों के लिए ट्रैक्टर एवं सिंचाई महंगी हो जाती है, उद्योगों में उत्पादन लागत बढ़ जाती है तथा दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। स्पष्ट है कि बढ़ती महंगाई देश की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर चुनौतियां उत्पन्न करती है।

सर्कुलर इकोनॉमी भारत के लिए प्रभावी समाधान
किंतु नवीकरणीय ऊर्जा इस चुनौती और समाधान के बीच की खाई को पाटने का कार्य कर सकती है। भारतीय आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत की लगभग 47 प्रतिशत स्थापित विद्युत क्षमता अब सौर, पवन तथा अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से जुड़ चुकी है। यह परिवर्तन दर्शाता है कि भारत धीरे-धीरे पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में सर्कुलर इकोनॉमी भारत के लिए एक प्रभावी समाधान सिद्ध हो सकती है। यह उत्साहवर्धक है कि भारत में एथेनॉल मिश्रण, हरित हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक वाहन तथा सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों को अपनाकर जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही, बायोमास भी एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभर रहा है, जो स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी उत्पन्न कर सकता है। नीति आयोग की ‘एथेनॉल मिश्रण मार्गदर्शिका’ के अनुसार, पेट्रोल में जैविक ईंधन एथेनॉल का मिश्रण कच्चे तेल के आयात को कम करने तथा प्रदूषण घटाने में सहायक है। एथेनॉल का उत्पादन गन्ना, मक्का, खराब अनाज तथा कृषि अपशिष्ट से किया जाता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। इसी क्रम में पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग आधारित ई-20, ई-22 और ई-30 ईंधनों का उपयोग भविष्य में भारत को ईंधन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

भारत में प्रतिदिन उत्पन्न होता है 1.68 लाख टन ठोस कचरा
नीति आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार, भारत में प्रतिदिन लगभग 1.68 लाख टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है। यदि इसका उचित प्रबंधन किया जाए, तो इससे ऊर्जा, रोजगार और आर्थिक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। इस दिशा में मध्यप्रदेश का कचरा प्रबंधन मॉडल अनुकरणीय माना जा सकता है। केवल गीले कचरे के प्रभावी उपयोग से भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रतिवर्ष लगभग 2,460 करोड़ रुपए का योगदान संभव है। वर्तमान में गैसीकरण और बायो-मीथनेशन जैसी तकनीकों के माध्यम से कृषि अवशेष, खाद्य अपशिष्ट तथा गीले कचरे को उपयोगी ऊर्जा में परिवर्तित किया जा रहा है। ई-कचरा और बैटरी पुनर्चक्रण भी सर्कुलर इकोनॉमी के महत्त्वपूर्ण आयाम बन चुके हैं। उचित ई-कचरा एवं बैटरी पुनर्चक्रण के माध्यम से तांबा, एल्यूमिनियम और सोने जैसी मूल्यवान धातुओं को पुन: प्राप्त कर आयातित संसाधनों पर निर्भरता कम की जा सकती है। साथ ही, इससे पर्यावरण संरक्षण, कार्बन उत्सर्जन में कमी तथा रोजगार के नए अवसरों को भी बढ़ावा मिल सकता है।


सर्कुलर इकोनॉमी को जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाना होगा
यह रेखांकित करना आवश्यक है कि दैनिक जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तन करके भी सर्कुलर इकोनॉमी के सफल क्रियान्वयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जा सकती है। सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग, वाहन-मुक्त दिवस, ऊर्जा संरक्षण, घर से कार्य व्यवस्था तथा स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देना ईंधन की खपत कम करने में सहायक हो सकता है। ‘15-मिनट परिसर’ जैसी अवधारणाएं, जहां दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएं निकट ही उपलब्ध हों, परिवहन पर निर्भरता कम करने में उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। अत: सरकार, उद्योगों तथा नागरिकों को संयुक्तरूप से सर्कुलर इकोनॉमी को जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाना होगा। ऊर्जा-संरक्षित राष्ट्र और आत्मनिर्भर विकसित भारत 2047 के स्वप्न को साकार करने में सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा आधारशिला सिद्ध हो सकती है। संसाधनों के पुन: उपयोग, ऊर्जा दक्षता तथा सतत विकास के माध्यम से यह राष्ट्र को आर्थिक एवं पर्यावरणीय रूप से सशक्त बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

Updated on:
29 May 2026 07:23 pm
Published on:
29 May 2026 07:15 pm
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