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डॉ पी.एस. वोहरा, (आर्थिक मामलों के जानकार)
भारतीय रुपया पिछले एक वर्ष से लगातार कमजोर होता जा रहा है और अब यह गिरावट के ऐतिहासिक स्तर 96 रुपए के आसपास पहुंच गई है। रुपए पर दबाव का एक बड़ा कारण पश्चिम एशिया में ईरान, इजराइल और अमरीका के बीच बढ़ा तनाव भी है, जिसके चलते वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। इसके साथ ही ट्रंप की टैरिफ नीतियों का असर भी वैश्विक बाजारों पर दिखाई दे रहा है। लेकिन समझना यह होगा कि क्या आज भी भारत उसी दौर में खड़ा है, जहां वैश्विक दबावों के चलते रुपए की कमजोरी भारतीय अर्थव्यवस्था को डांवाडोल कर सकती है? नहीं, अब भारतीय अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और सक्षम है। हालांकि अनिश्चितता और आशंका का माहौल जरूर दिखाई देता है। यह मान लेना भी गलत होगा कि किसी देश की कमजोर मुद्रा हमेशा उसकी कमजोर अर्थव्यवस्था का संकेत होती है, क्योंकि वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव हर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले एक वर्ष में रुपए के मूल्य में लगभग 13 फीसदी की गिरावट के बावजूद मजबूत बनी हुई है। किसी भी देश की मुद्रा का आदर्श मूल्य क्या होना चाहिए या वह किस स्तर पर स्थिर रहेगी, इसका सटीक अनुमान लगाना लगभग असंभव है। जापान भारत से अधिक विकसित देश है और उसकी प्रति व्यक्ति आय भारत से कई गुना अधिक है, लेकिन वर्तमान में एक अमरीकी डॉलर का मूल्य लगभग 158 जापानी येन के बराबर है। क्या इससे यह साबित होता है कि जापान की अर्थव्यवस्था भारत से कमजोर है? वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। जापान तकनीकी और औद्योगिक दृष्टि से आज भी दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। हां, भारत की आबादी जापान से कहीं अधिक है। रुपए की कमजोरी यह आशंका भी पैदा करती है कि चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि चालू खाता केवल आयात-निर्यात के अंतर से तय नहीं होता, बल्कि विदेशी पूंजी निवेश से भी प्रभावित होता है। यह निवेश एफपीआइ और एफडीआइ दोनों रूपों में आता है।
पिछले वित्तीय वर्ष में भारतीय पूंजी बाजार से करीब दो लाख करोड़ रुपए की विदेशी निकासी हुई, जिससे रुपए पर दबाव बढ़ा। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती इस बात से दिखाई देती है कि इतनी बड़ी निकासी के बाद भी सेंसेक्स और निफ्टी लगभग उन्हीं स्तरों पर बने हुए हैं, जहां वे एक वर्ष पहले थे। इससे यह संकेत मिलता है कि डॉलर की तुलना में रुपए की कमजोरी आने वाले समय में विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार की ओर आकर्षित कर सकती है, क्योंकि अब भारतीय संपत्तियां तुलनात्मक रूप से अधिक सस्ती हो गई हैं। यदि विदेशी निवेश बढ़ता है, तो चालू खाते के घाटे को संतुलित करने में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि, रुपए की कमजोरी का दूसरा पक्ष यह है कि आयात महंगे हो जाते हैं। इसका सीधा असर घरेलू बाजार में महंगाई के रूप में दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक प्राय: ब्याज दरों में वृद्धि का सहारा लेता है। हालांकि इससे वित्तीय तरलता और लोगों की क्रय क्षमता प्रभावित होती है। इसी कारण सरकार ने जीएसटी दरों में संशोधन कर करों का बोझ कम करने का प्रयास भी किया था। दूसरी ओर, भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपए को संभालने के लिए पिछले वित्तीय वर्ष में लगभग 53 अरब डॉलर बाजार में उतारे, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि रुपया केवल आयात घटने पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह वैश्विक परिस्थितियों के बीच खुद को संतुलित बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।
पश्चिम एशिया के तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के दबाव को देखते हुए पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाना आवश्यक हो गया है। जरूरी है कि तेल घरेलू बाजार के विक्रय मूल्य में शामिल विभिन्न प्रकार के करों को अब अधिक तर्कसंगत बनाया जाए क्योंकि पिछले कई दशकों से भारतीय बाजार में महंगाई को बढ़ाने में हमेशा पेट्रोल व डीजल के मूल्य की बढ़ोतरी ही अहम भूमिका निभाती है।
Updated on:
29 May 2026 07:12 pm
Published on:
29 May 2026 07:12 pm
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