ओपिनियन

बदलती जलवायु से पौधों के प्राकृतिक आवास पर संकट

यहां लद्दाख से लेकर भूटान तक हिमालय के छह अलग-अलग क्षेत्रों में वनस्पति की सीमा ऊपर की ओर खिसकी है। यह माउंट एवरेस्ट के घर खुंबू में सालाना 1.42 मीटर से लेकर नेपाल के मानथांग में 6.95 मीटर तक रही है।
3 min read
Aug 27, 2026
climate
climate

जलवायु परिवर्तन अब न केवल बच्चों का भविष्य छीन रहा है, लोगों में अकेलापन बढ़ा रहा है, महिलाओं पर गंभीर असर डाल रहा है, मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है, बल्कि दुनिया की बहुमूल्य धरोहरों के अस्तित्व के संकट को बढ़ा रहा है। वह दुनिया की हजारों पौध-प्रजातियों के घर ही नहीं छीन रहा, उन पर विलुप्ति का खतरा भी मंडराने लगा है। दुनिया के हालिया शोध और अध्ययन इन तथ्यों को प्रमाणित करते हैं। सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार यही बरकरार रही तो इस सदी के आखिर तक दुनिया की हजारों पौध-प्रजातियां अपने प्राकृतिक आवास के बड़े हिस्से से न केवल महरूम हो जाएंगी, बल्कि बहुतेरी पौध-प्रजातियां विलुप्ति के कगार तक पहुंच जाएंगी।

हालात इतने खराब हो गए हैं कि जलवायु परिवर्तन के चलते 7 से 16 फीसदी पौधे ऐसे हैं जो अपने रहने की 90 फीसदी से भी ज्यादा जगह खोने के कगार पर हैं। सच कहा जाए तो अब वे विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए हैं। इसका असर इंसानों पर पड़े बिना नहीं रहेगा। देखा जाए तो किसी पौधे का आवास केवल जमीन का एक हिस्सा नहीं होता। बल्कि वह तापमान, बारिश, मिट्टी, नमी, छाया और पर्यावरणीय संतुलन जैसी बहुतेरी परिस्थितियों का मेल होता है। जलवायु परिवर्तन इन सारी चीजों को बहुत ही तेजी से बदल रहा है। यही वजह है कि पौधे अपने अस्तित्व की खातिर अपने लिए उपयुक्त मौसम का पीछा करने की कोशिश कर रहे हैं। तापमान बढऩे से पेड़-पौधों की बहुतेरी प्रजातियां पर्वतीय इलाकों में ऊंचाई की ओर या फिर ठंडे इलाकों की ओर रुख कर रही हैं।

देश का हिमालयी अंचल इसका जीता-जागता उदाहरण है जहां तापमान वृद्धि के चलते पौधे पहाड़ों की ऊंचाई की ओर बढ़ रहे हैं। यह हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र में आ रहे बदलावों का एक प्रमुख संकेतक है। यहां लद्दाख से लेकर भूटान तक हिमालय के छह अलग-अलग क्षेत्रों में वनस्पति की सीमा ऊपर की ओर खिसकी है। यह माउंट एवरेस्ट के घर खुंबू में सालाना 1.42 मीटर से लेकर नेपाल के मानथांग में 6.95 मीटर तक रही है। गौरतलब है कि यह इलाका जो बर्फ कम होने और अधिक गर्मी के कारण पहले सालभर बर्फ से ढका रहता था, अब पौधों के उगने के लिए अनुकूल होता जा रहा है।

यहां इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि अल्पाइन इलाके में कठोर वातावरण है, जो छोटे पौधों और लकड़ी की झाडिय़ों के द्वारा नियंत्रित होता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण यहां हिमालय में स्थितियां तेजी से बदल रही हैं और सभी क्षेत्र में वनस्पति रेखा लगातार ऊपर की ओर बढ़ रही है। दावे कुछ भी किए जाएं दुनियाभर के शोधों-अध्ययनों का निष्कर्ष और हकीकत यह है कि मौजूदा हालात को देखते हुए जलवायु परिवर्तन को रोकने की कोशिशें नाकाफी हैं और यह भी सच है कि जलवायु परिवर्तन का संकट दिनोंदिन विकराल होता जा रहा है। वैश्विक तापमान को अगले 100 वर्षों में १.५ डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं बढऩे देने का लक्ष्य हासिल कर लेने के बावजूद विश्व के संवेदनशील क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचा पाना आसान नहीं होगा। आर्कटिक और दक्षिण पूर्व एशियाई मानसून जैसे क्षेत्रों को होने वाली अपरिवर्तनीय क्षति से रोक पाना दुष्कर कार्य है।

ऐसी स्थिति में भारत को विभिन्न क्षेत्रों के लिए अपने उत्सर्जन लक्ष्य नए सिरे से तय करने की जरूरत है। जबकि क्लाइमेट ट्रांसपेरेंसी की रिपोर्ट की मानें तो 2030 तक भारत के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी करीब करीब दोगुने की बढ़ोतरी होने की आशंका है। फिर जलवायु परिवर्तन से वेलकम ट्रस्ट और क्लाइमेट ओपिनियन रिसर्च के अध्ययन द्वारा सेहत पर होने वाले भयावह खतरे की चेतावनी ने चिंता को और बढ़ा दिया है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण की चिंता नहीं रह गया है, बल्कि यह अब लोगों के शरीर, उनकी सांस, उनके बच्चों की सेहत की चिंताओं तक पहुंच गया है। इसलिए जीवन शैली में बदलाव समय की महती आवश्यकता है।

Updated on:
27 Aug 2026 03:28 pm
Published on:
27 Aug 2026 03:28 pm