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संपादकीय: खतरे हजार, मोबाइल के हाथ में न जाने दें बचपन

इसके लिए माता-पिता को बच्चों के साथ अधिक समय बिताना होगा। उनसे बातचीत करनी होगी, उनके साथ खेलना होगा और उनकी दुनिया को समझना होगा। मोबाइल बंद करने का आदेश देने से ज्यादा प्रभावी है कि घर में संवाद और सहभागिता का माहौल बनाया जाए।
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जयपुर

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ANUJ SHARMA

Aug 27, 2026

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दुनिया के कई देश बच्चों के स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर नियम कड़े कर रहे हैं। यह इस बात का संकेत है कि डिजिटल लत का बचपन पर मंडरा रहा खतरा बढ़ता ही जा रहा है। आज का बच्चा खेल मैदान से ज्यादा मोबाइल की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ के रायपुर एम्स से जुड़ी यह खबर चिंतित करने वाली है, जिसमें बताया गया है कि वहां इलाज के लिए आ रहे १०० में से १२ बच्चे मनोरोग के शिकार हैं, जो मोबाइल गेम की लत लगने के बाद उपचारधीन हैं। मोबाइल और ऑनलाइन गेम बच्चों के मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उनके व्यवहार, पढ़ाई और पारिवारिक संबंधों को भी प्रभावित करने लगे हैं। स्कूली बच्चों से लेकर 20 वर्ष तक के किशोरों में मोबाइल पर बढ़ती ऐसी निर्भरता चिंता का विषय बन रही है।

ऑनलाइन गेम की सबसे बड़ी खासियत तुरंत परिणाम होती है। कुछ ही सेकंड में जीत, हार, इनाम, अगला लेवल और लगातार मिलने वाला रोमांच बच्चे के दिमाग को तत्काल संतुष्टि का आदी बना सकता है। समस्या तब पैदा होती है, जब यही आदत वास्तविक जीवन में भी तुरंत परिणाम की अपेक्षा पैदा करने लगती है। पढ़ाई में मेहनत, सफलता के लिए इंतजार और विफलता को स्वीकार करना मुश्किल लगने लगता है। मनचाही चीज न मिलने पर चिड़चिड़ापन, जिद और गुस्सा बढ़ सकता है। मोबाइल हटाने या गेम बंद करने को लेकर माता-पिता और बच्चों के बीच बहस आम होती जा रही है। कई बार संवाद की जगह विवाद ले लेता है। जिस मोबाइल से दुनिया को जोडऩे का दावा किया गया था, वही कई घरों में माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी बढ़ा रहा है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम से नींद की कमी, सामाजिक अलगाव और लगातार डिजिटल उत्तेजना जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं। ऐसे में बच्चे के व्यवहार में गंभीर बदलाव दिखाई दें तो उसे केवल 'जिद' मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि समाधान मोबाइल पूरी तरह छीन लेने में भी नहीं है। जरूरत तकनीक से दूरी बनाने की नहीं, उसके इस्तेमाल में संतुलन पैदा करने की है। इसके लिए माता-पिता को बच्चों के साथ अधिक समय बिताना होगा। उनसे बातचीत करनी होगी, उनके साथ खेलना होगा और उनकी दुनिया को समझना होगा। मोबाइल बंद करने का आदेश देने से ज्यादा प्रभावी है कि घर में संवाद और सहभागिता का माहौल बनाया जाए।

बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय हो, सोने से पहले मोबाइल से दूरी हो और रचनात्मक गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय निकाला जाए। बचपन को स्क्रीन का कैदी बनने से बचाना केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। तकनीक आज की जरूरत है, लेकिन सुरक्षित बचपन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है। जरूरत हो तब ही मोबाइल बच्चे के हाथ में रहे, लेकिन बचपन मोबाइल के हाथ में नहीं जाना चाहिए।