
दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस-वे के डिवाइडर पर घास काटती तीन महिलाओं की सड़क हादसे में हुई मौत की घटना के बाद ग्रामीणों द्वारा रास्ता अवरुद्ध किया गया और परिणीति में 17 लाख रुपए के नकद मुआवजे के अतिरिक्त आश्रित परिजनों को सरकारी नौकरी व डेयरी बूथ देने पर सहमति बनी। इस बारे में कोई दो मत नहीं हैं कि हादसों में मृत्यु दुखद व परिवार को प्रभावित करने वाली आकस्मिक घटना है। किंतु इस बाबत कोई भी मुआवजा करदाता के कोष या हिस्से से दिया जाए, यह कितना उचित है?यह घटना एकमात्र हो ऐसा नहीं है, पूर्व में भी सड़क पर वाहन चालक के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार के कारण करदाता की राशि से ही कभी 50 लाख तो कभी कुछ कम राशि आहत व्यक्तियों को मुआवजा भुगतान के रूप में प्रदान की जाती रही है। इस संबंध में यदि प्रचलित नियमों का अवलोकन करें तो उनके तहत भी वाहन चालक की पहचान न होने की अवस्था में हिट एवं रन केस के तहत मृत्यु की एवज में दो लाख रुपए के मुआवजे का ही प्रावधान है। अत: दबाव के आगे झुकते हुए कुछ भी राशि प्रदान करना तर्कसंगत नहीं है। वैसे पंजीकृत वाहन द्वारा दुर्घटना होने पर वाहन स्वामी और चालक को आज के तकनीकी युग में पकडऩा कोई दुष्कर कृत्य भी नहीं है।
विषय यह है कि सार्वजनिक परिवहन या निर्माण की त्रुटि कारण हुए हादसे के लिए तो सरकार या उसके कर्मी जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं, किंतु निजी वाहनों की लापरवाही के लिए भी क्या सरकार ही दोषी है? दुर्भाग्य यह है कि जिनके हिस्से से नौकरी जा रही है या जिनके द्वारा प्रदत्त कर से मुआवजा राशि चुकाई जाती है, वे भी इस विषय में कोई आवाज नहीं उठाते। वैसे तो अधिकारों और करदाता की राशि के दुरुपयोग को लेकर बहुत चर्चाएं होती है, किंतु इस अनुचित व्यय पर कभी कोई मुखर नहीं होता। जहां तक सड़क हादसों एवं मुआवजों का प्रश्न है, उसके लिए समुचित प्रावधान मोटर व्हीकल अधिनियम में किए गए हैं। तदनुसार, दुर्घटना की अवस्था में बीमा कंपनी द्वारा मुआवजा प्रदान किया जाना है और यदि नियमों का उल्लंघन कर कोई वाहन बिना बीमा सड़क पर आता है तो वाहन स्वामी द्वारा इस राशि को वहन किया जाना अपेक्षित है।
गंभीर प्रश्न यही है कि कब तक दूसरे की गलती के लिए गैर तार्किक तरीके से सरकारी खजाने से मुआवजा दिया जाता रहेगा। गैर कानूनी या अनियंत्रित वाहन चलाने वालों को तनिक भी यह अहसास नहीं होता कि दुर्घटना से हुई मानवीय क्षति से कितने जीवन आहत होते है। नियमों की परिधि में वाहन संचालन के बावजूद हुई दुर्घटना को तो बीमा या अन्य साधनों से क्षतिपूर्ति के लिए मान्य होना चाहिए, लेकिन उसके दीगर होने वाले हादसों के लिए कठोरतम कार्रवाई यथा चालक की संपत्ति कुर्क एवं कठोर कारावास ही बदहवास वाहन संचालन पर अंकुश लगाने के लिए नजीर पेश कर सकेंगे।
यदि सरकार की ओर से नियम विरुद्ध आचरण के बावजूद दबाव के आगे झुकते हुए इसी प्रकार भरपाई की कार्यवाही की जाती रही तो पूर्व घटनाओं से प्रोत्साहित हो समाज, वर्ग या कई तरह की ढालों को सामने कर हर दिन कहीं न कहीं मुआवजा मांगने के लिए बाध्य किया जाता रहेगा, क्योंकि सड़क रहेगी तो दुर्घटनाएं भी होंगी और आक्रोश भी बना रहेगा। सरकार की ओर से संतुलित व्यवहार अपनाते हुए यह अपेक्षित है कि नाजायज रूप से सरकारी धन का दुरुपयोग न किया जाए ताकि करदाता पर अवांछित अतिरिक्त बोझ ना पड़े। वैसे भी भीड़ मानसिकता के आगे झुकते हुए अनेकानेक ऐसे निर्णय हो जाते हैं जिनसे आमजन बिना किसी कारण के नुकसान सहता है। उस शृंखला में यह नई कड़ी नहीं जुडऩी चाहिए। व्यवस्था में 'जिसकी गलती वही भुगते' का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए जनता के संसाधनों की शक्ति से अनावश्यक उदारता प्रदर्शित करने से बचना चाहिए। इससे नियम-कानून का भी पालन होगा। वैसे भी सरकार के नुमाइंदे तो सार्वजनिक संसाधनों के न्यासी मात्र ही हैं। उन्हें अपनी इच्छानुसार वाहवाही या दबाव शून्य करने के लिए उसके व्यय का कतई अधिकार नहीं है, खर्चों के प्रति जवाबदेही न सिर्फ वांछित अपितु अवश्यंभावी होनी चाहिए।
विवेक एस. अग्रवाल,(सामाजिक विषयों के जानकार)