नागपुर समेत महाराष्ट्र के अनेक शहरों में अतिक्रमण समेत शहरी कानूनों के उल्लंघन पर नियंत्रण हेतु सेवानिवृत्त फौजियों एवं पुलिसकर्मियों को 'मार्शल' के रूप में अधिकृत किया गया था, ताकि वे स्पॉट जुर्माना वसूल सकें। यह मॉडल काफी प्रभावी रहा।
डॉ. विवेक एस. अग्रवाल, (सामाजिक सरोकारों से जुड़े मामलों के जानकार)- समाचार पत्रों में आए दिन खबरें पढऩे को मिलती हैं, 'रोड जाम से डॉक्टर का समय निकला, मरीज खाली हाथ लौटे', 'फंसा रहा शहर', 'एंबुलेंस को भी नहीं मिली राह' या 'जाम के बीच टूट गई सांसें'। जिस तरह शहर बढ़ रहे हैं, उतनी ही तेजी से इस तरह की खबरें भी बढ़ती जा रही हैं। पहले कभी-कभार शहरी यातायात ठहरता था, लेकिन अब यह मानो 'न्यू नॉर्मल' बन चुका है। अब सलाह दी जाती है कि गंतव्य तक समय पर पहुंचने के लिए अतिरिक्त समय की गणना रखें। समाचार पत्र और रेडियो चैनल भी जनता को आगाह करने लगे हैं कि अमुक पर्व, आयोजन या किसी अन्य कारण से यातायात बाधित रहेगा। इस समस्या के कुछ कारण भले ही नियंत्रण से बाहर हों, लेकिन अधिकांश का समाधान प्रभावी योजना और नीति से संभव है। आज धार्मिक पर्व, आंदोलन या राजनीतिक आयोजन अपनी ताकत दिखाने के लिए बिना किसी गंभीर सोच-विचार के सड़कों पर आयोजित कर लिए जाते हैं, जिससे आमजन को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
वाहनों का जाम में फंसना अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। समस्या सिर्फ मुख्य मार्गों तक नहीं है, आवासीय बस्तियों की संकरी गलियां, बाजारों के बाहर खड़े वाहन भी लोगों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। अतिक्रमण को लेकर जब आवाज उठती है तो गाज सिर्फ रेहड़ी या सड़क किनारे के छोटे व्यवसायियों पर ही गिरती है। जबकि बिना पार्किंग व्यवस्था के खुले बड़े रिटेल कार्रवाई से बच जाते हैं। जाम की समस्या को लेकर अनेक बार लिखा और बोला गया लेकिन सब नक्कारखाने की तूती साबित हुआ है। नागपुर समेत महाराष्ट्र के अनेक शहरों में अतिक्रमण समेत शहरी कानूनों के उल्लंघन पर नियंत्रण हेतु सेवानिवृत्त फौजियों एवं पुलिसकर्मियों को 'मार्शल' के रूप में अधिकृत किया गया था, ताकि वे स्पॉट जुर्माना वसूल सकें। यह मॉडल काफी प्रभावी रहा। बढ़ते शहरों एवं घटते मानव संसाधन के दृष्टिगत इस प्रकार की व्यवस्था कारगर सिद्ध हो सकती है।
विडंबना यह है कि नगरीय निकाय, ट्रैफिक पुलिस तथा शहरी आयोजना एवं विकास से जुड़े विभिन्न विभाग सामंजस्य के अभाव में एकाकी रूप से कार्य करते हैं। इसके चलते एक-दूसरे पर हो रहे नियम-प्रावधानों के प्रभावों का भी समग्रता से निस्तारण नहीं हो पाता। एक बड़ी समस्या आयोजन स्थलों, रिटेल एवं खानपान व्यवसायों के समक्ष भारी संख्या में वाहनों द्वारा अवरुद्ध यातायात भी है। अव्वल तो समुचित पार्किंग प्रावधान के बिना व्यावसायिक अनुमति दी ही नहीं जानी चाहिए और यदि नियम विरुद्ध दे दी गई है तो संबंधित अधिकारी की निजी आय से वसूली एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। कम-से-कम किसी भी व्यावसायिक अनुमति हेतु न सिर्फ नगरीय निकाय, अपितु शहरी आयोजना तथा पुलिस महकमे द्वारा संयुक्त रूप से निर्णय लिया जाना चाहिए, ताकि एक-दूसरे पर दोषारोपण न किया जा सके। कई राज्यों जैसे गुजरात, ओडिशा, महाराष्ट्र आदि के कई शहरों में विकसित राष्ट्रों के अनुरूप निकायों एवं निजी व्यवसायियों द्वारा लाइसेंस के तहत बाजारों में पेड पार्किंग स्थापित की गई है, ताकि आमजन सड़क पर पार्किंग न कर निर्धारित स्थल पर वाहन खड़े कर सकें। यह व्यवस्था अत्यंत कारगर साबित हुई है और परिणामस्वरूप सड़कों पर वाहन खड़े होना लगभग नगण्य हो गया है। पेड पार्किंग को प्रोत्साहित करने से रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।