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शरीर ही ब्रह्माण्ड: दशम द्वार-चेतना का अवतरण

वैज्ञानिक दृष्टि से शरीर एक अद्भुत जैविक प्रणाली है जिसमें सृजन की क्षमता प्रकृति का चमत्कार है। चेतना पुरुष और नारी प्रकृति है। चेतना द्रष्टा, निर्गुण आधार है। प्रकृति सृजन की क्रियाशील ऊर्जा और गति है।

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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

May 09, 2026

Sharir Hi Brahmand

फोटो: पत्रिका

नवद्वारों का पिंजरा तामे पंछी पौन
रहने को अचरज है, उड़ै अचंभा कौन?

पिंजरा माया है, अचरज माया है, अचंभा भी माया है। द्वार सदा खुले हैं किन्तु पंछी उड़ नहीं पाता। यही माया है। यही माटी की इस देह की कहानी है। कैसा खिलौना है। पंचकोश और 9 द्वार। दो आंख-कान-नाक (6), मुंह, गुदा, मूत्र द्वार (9)। ये सारे पंचतत्त्व के प्रतीक हैं, दैहिक कर्मों के संचालक हैं। सभी स्थूल प्राणी-युगलों में कार्य करते हैं। क्षर सृष्टि के अंग हैं और प्रकृति के नियंत्रण में कार्य करते हैं। इनके भीतर ही प्राण रूप आत्मा (पंछी) का वास है।


आत्मा भी स्त्री-पुरुष में समान है। देह भी समान है। फिर स्त्री शरीर की दैवीय महिमा क्या है? पुरुष शरीर ब्रह्म वाचक है- एक रूप है, स्त्री शरीर में 'एक म्यान दो तलवार' होती हैं। एक शरीर पुरुष के समान आत्मा का आश्रय होता है। दूसरा शरीर माया का, ब्रह्म का मार्ग होता है। इसका जीवन की दैनिक गतिविधियों से जुड़ाव नहीं होता। इसको दसवां द्वार (ब्रह्म मार्ग अथवा प्रजनन द्वार) कहा जाता है। ब्रह्म इसी मार्ग से स्त्री शरीर में प्रवेश करता है। और इसी मार्ग से योनिरूप शरीर धारण करके बाहर आता है। यह मार्ग चन्द्रमा द्वारा नियंत्रित रहता है। मासिक आर्तव ही द्वार खोलता है, जो चान्द्रमास से नियंत्रित है। आत्मा सूर्यांश है, चन्द्रमा सूर्य पत्नी है। ये दम्पती ही अग्नि-सोमात्मक यज्ञ से ब्रह्म का आह्वान करते हैं। यही बीज योषग्नि में आहुत होकर सूक्ष्म शरीर में प्रतिष्ठित हो जाता है।


छान्दोग्य उपनिषद् में पंचाग्नि का वर्णन है जो जीवात्मा की सूक्ष्म से स्थूल तक की यात्रा का विवरण है। स्त्री शरीर पंचाग्नि का अन्तिम पड़ाव होता है। मंत्र कहता है-
योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिद्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्त: करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गा:॥ (5.8.1)
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भ: संभवति॥ (5.8.२)

अर्थात् —हे गौतम! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ समिधा है। शरीर के रोम धुआं हैं, योनि ज्वाला है, क्रिया अंगारे हैं, सुख चिंगारियां हैं। देवता इस अग्नि में रेत की आहुति देते हैं। सन्तान (पुरुष) उत्पन्न होता है।
योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चि… बृहदारण्यक उपनिषद् (6.2.13) का भी यही मन्तव्य है। दोनों ही मंत्र लगभग एक-सा अर्थ कर रहे हैं। स्त्री शरीर वेदी है। अग्नि-समिधा-धुआं (रोम), ज्वाला तो स्थूल शरीर के अंग हैं। अंगारे विज्ञान और सुख तो आनन्द है जिसके अभाव में सृष्टि संभव नहीं है।


माया का यह संसार स्त्री के भौतिक शरीर का अंग तो है किन्तु इसकी क्रियाएं स्वतंत्र हैं। क्योंकि प्रजनन की सभी सूक्ष्म क्रियाएं चन्द्रमा पर आधारित हैं। मासिक चक्र-चन्द्रमास (28 दिन) तथा मंगल ग्रह के प्रभाव से होता है। चन्द्रमा मन का स्वामी है। सन्तान के लिए मन/चन्द्रमा का शक्तियुक्त-पूर्ण-शान्त-प्रसन्न होना आवश्यक है। चन्द्रमा जल तत्व और भावना का स्वामी भी है। स्त्री शरीर भी जल प्रधान (सौम्य)—रक्त, रज, गर्भ-द्रव्य आदि होता है।


चन्द्रमा ही पितर लोक भी है। आत्मा गर्भ में चन्द्रमा के माध्यम से आता है। चन्द्रमा ही अत्रि पुत्र (पृथ्वी के आर्तव से निर्मित) है। आर्तव भी ज्वार-भाटा के सिद्धान्त से प्रभावित होता है। पूर्णिमा/अमावस्या भी मन के संचालक हैं। पूर्णिमा को भावनाएं उद्दीप्त रहती हैं और रक्त प्रवाह तेज। अमावस्या को मानसिक चिन्ता और तनाव। चन्द्रमा प्रजनन क्षेत्र (जन्म-मरण) का कारक है। सृष्टि का मातृ भाव है। कमजोर चन्द्रमा स्त्री रोग कारक होता है। स्त्री देह अपरा प्रकृति द्वारा तथा दसवां द्वार परा प्रकृति का क्षेत्र होने से सूक्ष्म क्रियाओं का क्षेत्र है।


दसवां द्वार स्त्री की अपनी दिव्यता की स्वतंत्र विरासत है। इस पर स्त्री के देवत्व का ही एकाधिकार रहता है। पुरुष शायद इस तथ्य से सर्वथा अनभिज्ञ ही रहता है कि स्त्री शरीर का यह क्षेत्र मूल शरीर से स्वतंत्र कार्य करता है। जहां स्थूल शरीर पंचभूतों से निर्मित जड़ पिण्ड है, वहीं यह सृष्टि का प्रवेश द्वार है। इसके माध्यम से नई चेतना जगत में प्रवेश करती है। ब्रह्म इसी मार्ग से जीव रूप में अवतरित होता है अत: दिव्य मार्ग है। स्त्री रूप में माया निराकार ब्रह्म को साकार रूप देती है।
गर्भस्थ चेतना पर मां के संस्कार, भावनाएं और विचार सीधे प्रभाव डालते हैं (सभी सूक्ष्म)। शांत, सात्विक, योगमयी स्त्री का गर्भ एक तपोभूमि है। यहीं से उच्च कोटि का आत्मा संसार में प्रविष्ट होता है।

स्त्री का दसवां द्वार केवल जैविक न होकर चैतन्य का प्रवेश-निकास द्वार है। ब्रह्म यहां एक नए आत्मा के रूप में आता है। स्त्री उस चेतना को पोषित करके (आवरण-योग-शक्ति से) जगत के लिए एक दिव्य उपहार बनाती है। वैज्ञानिक दृष्टि से शरीर एक अद्भुत जैविक प्रणाली है जिसमें सृजन की क्षमता प्रकृति का चमत्कार है। चेतना पुरुष और नारी प्रकृति है। चेतना द्रष्टा, निर्गुण आधार है। प्रकृति सृजन की क्रियाशील ऊर्जा और गति है। दसवें ब्रह्म द्वार पर शक्ति चेतना के अवतरण का माध्यम बनती है।


अन्न और नाद का युगल सगुण-निर्गुण, स्थूल-सूक्ष्म का पूरक युगल है। केवल शरीर की पुष्टि से चेतना जाग्रत नहीं होती, इसके लिए नाद चाहिए। ब्रह्म का स्पन्दन ही नाद है, ध्वनि रूप में चेतना का प्रवाह है। गर्भ में शिशु पहले नाद—मां की धड़कन, ध्वनि, संगीत आदि के माध्यम से चेतना को संस्कारित करता है। आने वाली चेतना को जगत के लिए तैयार करते हैं। नाद ही चेतना का भोजन है। चेतना की माता है। स्त्री अन्न है, पुरुष नाद। स्त्री मूर्त आधार, पोषण और धारण करने वाली भूमि है। पुरुष अमूर्त स्पन्दन, चेतना का स्वर है। अन्न बिना नाद जड़ है और नाद अन्न के बिना निराधार है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:— एक ओर हमारे शास्त्रों का यह उद्घोष और दूसरी ओर वह विलासिता का साधन बनती जा रही है। स्त्री माया है, ब्रह्म की शक्ति है। शक्ति चेतना के बिना जड़ है, शक्ति के बिना चेतना अव्यक्त है।


स्त्री दो स्तरों पर जीती है, स्थूल भी, सूक्ष्म भी। उसकी दिव्यता का आधार भी उसके दो शरीर ही हैं। हम पढ़ चुके हैं कि विवाह के बाद स्त्री का आत्मा, पुरुषात्मा से युक्त होकर सूक्ष्म सृष्टि-जीवात्मा-का अवतरण जगत में संभव करते हैं। स्त्री गर्भस्थ शिशु की देह का निर्माण स्वयं की देह से ही करती है। वास्तव में तो संतान का शरीर 'माता’ ही है। वही जीव के आत्मा को संस्कारित करती है, अभिमन्यु बनाती है। अन्तज्र्ञान और परोक्षा भाषा भी उसकी दिव्यता का प्रमाण हैं—परोक्षप्रिया इव हि देवा: कहा गया है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com