8 मई 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

संपादकीय: हार की बौखलाहट व जीत का उन्माद दोनों ही घातक

यही संघर्ष हिंसा में तब्दील होते देर नहीं लगती। पश्चिम बंगाल में नतीजों के बाद जो घटनाएं सामने आ रही हैं, वे हार-जीत की प्रतिक्रिया के रूप में ही देखी जा रही हैं। सीधे तौर पर किसी दल विशेष की संलिप्तता इन घटनाओं में भले ही सामने नहीं आए लेकिन संकेत जरूर दे देती है।

2 min read
Google source verification

चुनाव प्रक्रिया लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली का अहम हिस्सा है। चुनाव में हार-जीत व अल्पमत-बहुमत का दौर भी राजनीतिक दलों के लिए उतार-चढ़ाव के माफिक होता है। भारतीय लोकतंत्र की खासियत यही है कि यहां जनादेश को राजनीतिक दल विनम्रता से स्वीकार करते आए हैं। चुनाव प्रचार के दौरान व्यक्तिगत हमले और तीखी बयानबाजी का दौर तो पहले ही चिंता का विषय बना हुआ है। लेकिन जब चुनावी हार में बौखलाहट और जीत में उन्माद नजर आने लगे तो दोनों ही स्थितियां हिंसा को बढ़ावा देने वाली और लोकतंत्र को कमजोर करने वाली ही होती हैं।

एक दौर में हमारे देश में कुछ राज्य चुनाव पूर्व और चुनाव बाद की हिंसा के लिए बदनाम थे। कानून-व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त करने का काम हुआ तो धीरे-धीरे हिंसा की घटनाएं कम भी हुईं। लेकिन पश्चिम बंगाल इसका अपवाद ही रहा। यह सही है कि इस बार सुरक्षा बलों ने पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा पर एक हद तक रोक लगाने का प्रयास किया है। लेकिन नतीजों के बाद में हिंसा के जो संकेत आ रहे हैं वे चिंताजनक हैं। पश्चिम बंगाल में सीएम पद के दावेदार और भाजपा नेता सुवेन्दु अधिकारी के पीए समेत अलग-अलग घटनाओं में चौबीस घंटे में ही पांच जनों की हत्या कर दी गई। मरने वालों में भाजपा व तृणमूूल कांग्रेस दोनों के ही कार्यकर्ता बताए जा रहे हैं। बात केवल पश्चिम बंगाल की ही नहीं। चुनावी हिंसा कहीं भी होती है तो दोनों ही पक्षों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनादेश को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करें। हार-जीत को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लगाना लोकतंत्र में स्वाभाविक है लेकिन जीत की प्रक्रिया में अतिरेक हो जाए तो संघर्ष को टालना मुश्किल हो जाता है। यही संघर्ष हिंसा में तब्दील होते देर नहीं लगती। पश्चिम बंगाल में नतीजों के बाद जो घटनाएं सामने आ रही हैं, वे हार-जीत की प्रतिक्रिया के रूप में ही देखी जा रही हैं। सीधे तौर पर किसी दल विशेष की संलिप्तता इन घटनाओं में भले ही सामने नहीं आए लेकिन संकेत जरूर दे देती है।

स्वस्थ लोकतंत्र में यह आवश्यक है कि जीतने वाला दल बड़प्पन दिखाते हुए सत्ता में आने पर बदले की भावना से काम नहीं करे तो हारने वाले दल से भी यह उम्मीद की जाती है कि वह हार की प्रतिक्रिया को हिंसा में तब्दील नहीं करे। हार स्वीकार न करना, ईवीएम या चुनाव प्रक्रिया पर समुचित आधार के बिना सवाल उठाने को जनादेश का अपमान ही कहा जाएगा।नुकसान उस जनता का ही है जो उम्मीदों के साथ अपने प्रतिनिधियों को चुनकर विधाायिकाओं में भेजती है। राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई में जनता से जुड़े मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और स्वाभाविक रूप से विकास भी बाधित होता है। जीत में विनम्रता और हार में मर्यादा जरूरी है। राजनीति में यह लक्ष्मण रेखा दलों और उनके कार्यकर्ताओं को ही खींचनी होगी।