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अनाज से ईंधन बनाने की दौड़ और बढ़ती चिंताएं

भारत दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा प्रणालियों में से एक चलाता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत लगभग 80 करोड़ लोगों को सस्ता या मुफ्त अनाज दिया जाता है। इसके लिए सरकार हर साल लाखों करोड़ रुपये खर्च करती है। ऐसे में जब राज्यों जो इस अनाज को लोगों तक पहुंचाते हैं, को ज्यादा कीमत चुकानी पड़े और उद्योगों को कम, तो यह एक बड़ा विरोधाभास पैदा करता है।

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फोटो - AI

गजेंद्र सिंह
लोक नीति विश्लेषक

भारतीय खाद्य निगम के आंकड़ों के अनुसार निजी डिस्टिलरी को इथेनॉल बनाने के लिए चावल सस्ते दाम पर बेचा जा रहा है। जहां राज्य सरकारें चावल के लिए लगभग 34 रुपए प्रति किलो तक भुगतान कर रही हैं, वहीं निजी कंपनियों को यही चावल 20-23.20 रुपए प्रति किलो में मिल रहा है। यह नीति की प्राथमिकताओं का संकेत है। पहली नजर में सरकार का तर्क यह है कि देश में चावल का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर है और भंडार भी जरूरत से ज्यादा है, इसलिए ‘अधिशेष’ अनाज का उपयोग इथेनॉल बनाने में किया जा रहा है। यह ऊर्जा सुरक्षा और तेल आयात कम करने के लक्ष्य से जुड़ा हुआ है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या अधिशेष होने का मतलब यह है कि उसे सस्ते में उद्योगों को दे दिया जाए, जबकि राज्यों को वही अनाज महंगा पड़े?
भारत दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा प्रणालियों में से एक चलाता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत लगभग 80 करोड़ लोगों को सस्ता या मुफ्त अनाज दिया जाता है। इसके लिए सरकार हर साल लाखों करोड़ रुपये खर्च करती है। ऐसे में जब राज्यों जो इस अनाज को लोगों तक पहुंचाते हैं, को ज्यादा कीमत चुकानी पड़े और उद्योगों को कम, तो यह एक बड़ा विरोधाभास पैदा करता है। इस पूरी व्यवस्था को समझने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीद प्रणाली को भी देखना जरूरी है। सरकार, खासकर भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से, किसानों से धान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदती है ताकि उन्हें उचित मूल्य मिल सके। 2025-26 में धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य लगभग 2,183 रुपए प्रति क्विंटल है। लेकिन जब इसमें खरीद, भंडारण, मिलिंग और परिवहन का खर्च जुड़ता है, तो सरकार के लिए चावल की वास्तविक लागत 35 रुपए प्रति किलो से भी अधिक हो जाती है। ऐसे में जब यही चावल उद्योगों को इससे कम कीमत पर दिया जाता है, तो इसका मतलब है कि किसानों और खाद्य प्रणाली पर खर्च किया गया सार्वजनिक पैसा अप्रत्यक्ष रूप से निजी क्षेत्र को फायदा पहुंचा रहा है। इस मूल्य अंतर का आर्थिक असर भी कम नहीं है। अनुमान है कि इस व्यवस्था के कारण 4,000 करोड़ से अधिक का सार्वजनिक संसाधन उद्योगों की ओर शिफ्ट हुआ है।
समर्थक मानते हैं कि इथेनॉल उत्पादन से तेल आयात घटता है, प्रदूषण कम होता है और किसानों की आय बढ़ती है, इसलिए यह ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह खाद्य सुरक्षा की कीमत पर होना चाहिए? भारत में कुपोषण और खाद्य असमानता अभी भी मौजूद है, ऐसे में प्राथमिकता भोजन को मिलनी चाहिए या ईंधन को? खाद्य फसलों का बड़े पैमाने पर इथेनॉल में उपयोग करने से उनकी मांग और कीमतें प्रभावित नहीं होगी? भारत में इथेनॉल उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। पहले यह मुख्य रूप से गन्ने के मोलेस पर निर्भर था, लेकिन अब मक्का और चावल जैसे अनाज प्रमुख स्रोत बन गए हैं, जो कुल उत्पादन का 50 प्रतिशत से अधिक योगदान देते हैं। 2023 तक देश में 200 से अधिक संयंत्रों के माध्यम से 4 अरब लीटर से ज्यादा इथेनॉल का उत्पादन हुआ और भारत ने 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य भी हासिल कर लिया है। आगे ई 25, ई 27 और ई 30 जैसे उच्च लक्ष्यों की ओर बढऩे के साथ कृषि कच्चे माल की मांग तेजी से बढ़ेगी। अनुमान है कि 20 प्रतिशत के लिए ही सालाना लगभग 10 अरब लीटर इथेनॉल की जरूरत होगी, जिसमें करीब 23 मिलियन टन चावल की भूमिका हो सकती है। मक्का सबसे प्रमुख फीडस्टॉक बनकर उभर रहा है, और ई 30 लक्ष्य के लिए इसका उत्पादन 2030 तक 65-70 मिलियन टन तथा 2047 तक 100 मिलियन टन से अधिक तक पहुंचाने की आवश्यकता होगी। साथ ही, इथेनॉल उत्पादन के लिए कृषि भूमि भी 2030 तक 10 मिलियन हेक्टेयर से अधिक हो सकती है, जिससे खाद्य और ऊर्जा फसलों के बीच संतुलन एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
अमरीका में कुल मक्का उत्पादन का लगभग 35-40 प्रतिशत हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में उपयोग होता है और 2022 में देश ने लगभग 15.4 बिलियन गैलन इथेनॉल का उत्पादन कर विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक बनने का दर्जा हासिल किया। इस बड़े पैमाने पर ‘खाद्य से ऊर्जा’ बदलाव के कई महत्वपूर्ण प्रभाव देखने को मिले हैं। मक्का की मांग बढऩे से इसकी कीमतों में लगभग 30 प्रतिशत तक वृद्धि हुई, जिसका असर अन्य खाद्य फसलों की कीमतों पर भी पड़ा। किसानों ने सोयाबीन और अन्य फसलों से हटकर मक्का की खेती को प्राथमिकता दी, जिससे फसल विविधता घट गई और खाद्य आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई। इसके साथ ही पशु आहार की लागत बढऩे से दूध, अंडे और मांस जैसी वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि देखी गई। 2012 के सूखे जैसे संकट के दौरान, जब मक्का उत्पादन पहले ही प्रभावित था, इथेनॉल के लिए उसकी प्राथमिकता ने खाद्य और चारे की उपलब्धता पर और दबाव बढ़ा दिया। मक्का उत्पादन बढ़ाने के लिए अतिरिक्त कृषि भूमि का उपयोग भी बढ़ा, जिससे पर्यावरणीय दबाव और बाजार असंतुलन दोनों सामने आए। इस नीति ने एक गहरी बहस को जन्म दिया कि संकट के समय खाद्य फसलों को ईंधन के लिए उपयोग करना कितना उचित है। समय के साथ यह व्यवस्था मजबूत हो गई क्योंकि इसमें सरकारी नीतियां, औद्योगिक हित और बाजार संरचना आपस में जुड़ गए और आज अमरीका में नवीकरणीय ईंधन मानक जैसी नीतियां इथेनॉल की मांग को बनाए रखती हैं, जिससे एक औद्योगिक लॉबी भी विकसित हो गई है।
यह मुद्दा केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि नैतिकता का भी है। भोजन कोई साधारण वस्तु नहीं है यह जीवन की बुनियादी जरूरत है। सरकार की जिम्मेदारी है कि हर नागरिक को सस्ता और पर्याप्त भोजन मिले। अगर नीतियां इस मूल उद्देश्य से भटकती हैं, तो यह विश्वास को कमजोर करती हैं। यह भी साफ है कि हमारी नीतियां अभी अलग-अलग दिशाओं में काम कर रही हैं। खाद्य नीति, कृषि नीति और ऊर्जा नीति के बीच समन्वय की कमी है। जरूरत है एक ऐसे संतुलित दृष्टिकोण की, जहां सभी लक्ष्यों को साथ लेकर चला जाए। अगर अधिशेष अनाज का उपयोग करना है, तो उसकी कीमत तय करने में पारदर्शिता और न्याय होना चाहिए। साथ ही, इथेनॉल के लिए गैर-खाद्य स्रोतों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
राज्यों की भूमिका भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। वे ही जमीन पर खाद्य वितरण का काम करते हैं, लेकिन मूल्य निर्धारण और आवंटन जैसे फैसलों में उनकी भागीदारी सीमित रहती है। एक अधिक परामर्श-आधारित व्यवस्था इस असंतुलन को कम कर सकती है। अंत में, यह बहस हमें एक बुनियादी सवाल के सामने खड़ा करती है, क्या सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग पहले लोगों के लिए होना चाहिए या उद्योगों के लिए? जब लोगों को खिलाने वाला अनाज, उद्योगों को सस्ते में मिलने लगे, तो यह सिर्फ आर्थिक फैसला नहीं रहता, बल्कि नीति और नैतिकता का प्रश्न बन जाता है।