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मोतियाबिंद की शिकार ‘तीसरी आंख’

हैरत की बात यह है कि सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील माने जाने वाले सिविल लाइन्स व शासन सचिवालय क्षेत्र तक ये कैमरे मरम्मत की बाट जोह रहे हैं। कहीं कैमरे बिजली आपूर्ति पूरी नहीं होने से बंद हैं तो कहीं कैमरे ही नहीं हैं।

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सावधान आप कैमरे की नजर में हैं। सार्वजनिक स्थानों पर जब यह इबारत लिखी नजर आती है तो पुलिस के ध्येय वाक्य 'अपराधियों में भय, आमजन में विश्वास ' का स्मरण भी हो आता है। सही मायने में किसी भी शहर-गांव में सार्वजनिक स्थलों पर लगे सीसीटीवी कैमरे सचमुच 'तीसरी आंख' का काम करते हैं। पुलिस को भी इन सीसीटीवी कैमरों की मदद से कई मामलों में पुख्ता सबूत मिलते रहे हैं। लेकिन जब पुलिस महकमा ही रखरखाव की चिंता किए बिना सिर्फ कैमरे लगाकर ही निश्चिंत हो जाए तो फिर पुलिस ध्येय वाक्य 'आमजन में भय, अपराधियों में विश्वास' बनते देर नहीं लगती। हैरत की बात यह कि राजधानी जयपुर में ही जिन सीसीटीवी कैमरों के भरोसे आम नागरिक पुलिस में भरोसा रख रहे हैं उनमें आधे से ज्यादा बंद पड़े हैं। महकमों में समन्वय की कमी का आलम यह है कि पुलिस महकमे के पत्र सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग के यहां न जाने कौनसी फाइल में नत्थी हो जाते हैंं कि इन बंद कैमरों की सुध लेने की किसी को परवाह नहीं। पुलिस के अभय कमाण्ड से जुड़े ७०८ सीसीटीवी कैमरों में से तीन सौ से ज्यादा काम ही नहीं कर पा रहे हों तो इससे बड़ी लापरवाही और क्या हो सकती हैï? हैरत की बात यह है कि सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील माने जाने वाले सिविल लाइन्स व शासन सचिवालय क्षेत्र तक ये कैमरे मरम्मत की बाट जोह रहे हैं। कहीं कैमरे बिजली आपूर्ति पूरी नहीं होने से बंद हैं तो कहीं कैमरे ही नहीं हैं। न केवल पुलिस बल्कि स्मार्ट सिटी परियोजना व नगर निगम के कैमरों में भी अधिकांश का यही हश्र है। ये वे ही कैमरे हैं, जिन्हें शहर के चप्पे-चप्पे पर लगाने के पहले जोर-शोर से ऐलान किया गया था कि अब अपराधी तीसरी आंख की नजर से नहीं बच पाएंगे। अब चाहे कोई सड़क हादसा हो, बालिकाओं से छेड़छाड़ की घटनाएं हो या फिर चोरी-डकैती की वारदात, पुलिस के ये दावे उस वक्त मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं। जरूरत विभागों में समन्वय की तो है ही, उन कंपनियों पर भी सख्ती होनी चाहिए जिनकी लापरवाही से इन कैमरों का संधारण नहीं हो रहा।