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जनादेश का बदलता संदेश, राजनीति के नए संकेत

34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन को उखाड़कर सत्ता हासिल करने वाली ममता अजेय नजर आने लगी थीं।बेशक पिछले चुनाव में लगभग 38 प्रतिशत मतों के साथ 77 सीटें जीतकर भाजपा ने कड़ी चुनौती पेश की थी, लेकिन तृणमूल को इस बार इस तरह सत्ता से बेदखल कर देगी, इसकी उम्मीद शायद ही किसी को रही होगी।

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राजकुमार सिंह, (वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक)- चुनाव सत्ता के दावेदारों की हार-जीत तय करता है, तो कुछ राजनीतिक संदेश भी देता है। हाल में संपन्न एक केंद्रशासित प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने तीन राज्यों में सत्ता परिवर्तन कर दिया, लेकिन राजनीतिक संदेश ज्यादा दूरगामी है। पांच राज्यों का जनादेश जहां दक्षिणपंथी भाजपा के विस्तार का संकेत दे रहा है, वहीं वामपंथी राजनीति की सत्ता से विदाई पर भी मुहर लगा रहा है। मध्यमार्गी राजनीति की प्रासंगिकता के संघर्ष का संदेश भी इसमें पढ़ा जा सकता है।

इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के माने जा रहे थे, जहां 15 साल से तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी मुख्यमंत्री थीं। 34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन को उखाड़कर सत्ता हासिल करने वाली ममता अजेय नजर आने लगी थीं। बेशक पिछले चुनाव में लगभग 38 प्रतिशत मतों के साथ 77 सीटें जीतकर भाजपा ने कड़ी चुनौती पेश की थी, लेकिन तृणमूल को इस बार इस तरह सत्ता से बेदखल कर देगी, इसकी उम्मीद शायद ही किसी को रही होगी। अपने पितृपुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृह राज्य में 75 साल लंबे इंतजार के बाद सत्ता का सपना साकार होना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनावी सफलता है।
इस सफलता में 15 साल के ममता शासन के विरुद्ध सत्ताविरोधी भावना और भाजपा की जमीनी मेहनत निर्णायक बनी या एसआइआर की विवादित प्रक्रिया, यह बहस लंबी है। एसआइआर और चुनाव प्रक्रिया में केंद्रीय सुरक्षा बलों की अभूतपूर्व भूमिका से चुनाव चोरी का आरोप लगाते हुए ममता द्वारा मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से इनकार से उत्पन्न जटिल स्थिति का समाधान तो राज्यपाल आर. एन. रवि को करना है, जिन्हें विधानसभा चुनाव से कुछ ही पहले तमिलनाडु से वहां भेजा गया, लेकिन विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की साख के लिए यह शुभ संकेत नहीं। 2021 में दिया 200 पार का नारा भाजपा ने इस बार वाकई सच कर दिखाया और ममता बनर्जी को उनकी परंपरागत सीट भवानीपुर से हराते हुए तृणमूल को मात्र 81 सीटों पर समेट दिया।

बेशक बंगाल की जीत भाजपा के लिए ऐतिहासिक है, लेकिन असम में सत्ता की हैट्रिक भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। भाजपा मत प्रतिशत और सीटों दोनों में बढ़त बनाने में सफल रही है जबकि कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा। बंगाल और असम के चुनाव परिणाम इसलिए खास हैं कि दोनों ही राज्यों में मुस्लिम आबादी भाजपा विरोधी दलों के पक्ष में मतदान करने के लिए जानी जाती है। भाजपा ने तीसरी जीत पुदुचेरी में हासिल की है। पुदुचेरी की जीत राष्ट्रीय समीकरण की दृष्टि से इन चुनाव परिणामों के स्कोर को 3-1 से राजग के पक्ष में झुका देती है, जो पहले विपक्षी गठबंधन 'इंडियाÓ के पक्ष में 3-2 से झुका हुआ था।
बेशक हर चुनाव में सरकार बदल देने की परंपरा केरल ने 2021 में तोड़ दी थी, जब मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के नेतृत्व में वामपंथी एलडीएफ ने और भी ज्यादा सीटें जीतते हुए सत्ता बरकरार रखी, लेकिन इस बार कांग्रेसनीत यूडीएफ की जीत के संकेत मिल रहे थे। फिर भी ऐसे प्रचंड बहुमत की उम्मीद खुद यूडीएफ ने भी नहीं की होगी। कांग्रेस ही इस बार 42 सीटें ज्यादा जीत गई। केरल का यह जनादेश एक दशक बाद सत्ता परिवर्तन से भी ज्यादा अहम इसलिए है कि भारत की सत्ता राजनीति में वामपंथ का अंतिम दुर्ग भी ढह गया है।


पश्चिम बंगाल के बाद सबसे चौंकाने वाले चुनाव परिणाम तमिलनाडु ने दिए हैं, जहां थलापति विजय की लहर ने द्रविड़ राजनीति के छह दशक पुराने दुर्ग को ध्वस्त कर दिया। बेशक तमिलनाडु में फिल्मी सितारों की राजनीति की परंपरा रही है। अन्नाद्रमुक के एमजी रामचंद्रन और जयललिता का जादू तो सिर चढ़ कर बोला। विजय की नई नवेली पार्टी टीवीके का पहले ही चुनाव में विधानसभा की 234 में से 108 सीटें जीत जाना उनकी 'जन नायक' की छवि पर मुहर लगाता है। विजय के मुख्यमंत्री बनने में तो कोई संदेह नहीं, पर बहुमत के लिए जरूरी 118 का आंकड़ा पाने के लिए किसका समर्थन लेंगे, यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा। कांग्रेस समेत छोटे दलों के समर्थन से भी यह आंकड़ा जुटाया जा सकता है, लेकिन सरकार पर दबाव और अस्थिरता की तलवार लटकी रहेगी।


जनादेश के बाद अब राजनीतिक दलों के नेतृत्व की परीक्षा होगी कि वे किसे मुख्यमंत्री या नेता प्रतिपक्ष चुनते हैं। बंगाल में तृणमूल से आए सुवेंदु अधिकारी ही ममता को आक्रामक चुनौती देते दिखे, लेकिन भाजपा अप्रत्याशित चयन के लिए ज्यादा जानी जाती है। असम में हिमंता को दूसरी पारी मिलने में संदेह का कोई कारण नहीं दिखता। पुदुचेरी में रंगासामी ही राजग के नेता हैं। हां, केरल में कांग्रेस के लिए नए मुख्यमंत्री का चयन आसान नहीं होगा। कम-से-कम तीन दावेदार हैं रमेश चेन्निथला, के सी वेणुगोपाल और वी डी सतीशन। युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष, केरल में नेता प्रतिपक्ष और गृह मंत्री भी रह चुके चेन्निथला सबसे अनुभवी हैं। इस चुनाव में भी अभियान समिति के अध्यक्ष वही थे। दूसरी ओर निवर्तमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सतीशन 2011 से लगातार विधायक हैं, जबकि मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय ऊर्जा और नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री रह चुके वेणुगोपाल की राहुल गांधी से निकटता किसी से छिपी नहीं है।