
पाकिस्तान से आए ड्रोन में हेरोइन की खेप (फोटो: पत्रिका)
रात के अंधियारे में पाकिस्तान से एक ड्रोन उड़ता है। उसमें बंधी होती है हेरोइन की खेप। हमारे युवाओं की तबाही का सामान। उसी वक्त सरहद पर तैनात पुलिस और सीआइडी की टीम सतर्क होती है, लोकेशन मांगती है, डेटा मांगती है और तब श्रीगंगानगर पुलिस मुख्यालय के सीडीआर सेल से एक हवलदार जानबूझकर गलत सूचना देता है। तस्कर निकल भागते है। वर्दी शर्मसार होती है। यह महज एक हवलदार की कारस्तानी नहीं। यह उस वर्दी के भीतर की सड़न है, जो पूरे तंत्र को शनैः शनैः खोखला कर रही है।
और सबसे जहरीला पहलू यह है कि इस हवलदार को नवंबर 2025 में गैलेंट्री प्रमोशन मिला था… उसी काम के लिए, उसी सेल में, जहां उसने अब गद्दारी की। सरकार ने जिस हुनर के लिए उसे पुरस्कृत किया, उसी हुनर को उसने दुश्मन के नेटवर्क की सेवा में झोंक दिया। यह विडंबना नहीं… यह पुलिस की चयन प्रक्रिया, निगरानी और जवाबदेही के पूरे तंत्र पर एक करारा तमाचा है।
बात केवल हवलदार तक सीमित नहीं है। प्रश्न यह है कि 35 दिन की जांच के बाद यह मिलीभगत सामने आई, तो इससे पहले क्या हुआ? इस इलाके का रेकॉर्ड बताता है कि बीते सवा सौ दिनों में 172 करोड़ से ज्यादा की हेरोइन सरहद पार से यहां आई। जो खेपें पकड़ी गई, उनके पीछे एजेंसियां पहुंचीं, लेकिन जो नहीं पकड़ी गई, उनमें कितने 'हवलदार' थे? भ्रष्टाचार का दीमक एक जगह नहीं लगता, वह पूरी लकड़ी को चाट जाता है इसीलिए पुराने सभी मामलों की नए सिरे से जांच होनी चाहिए।
पाकिस्तान की मंशा कोई छुपी नहीं है। सीमावर्ती युवाओं को नशे में धकेलो, अवैध नेटवर्क मजबूत करो, सामाजिक ताना-बाना तोड़ो। ड्रोन तकनीक उसका नया हथियार है, लेकिन अगर इस हथियार को हमारी अपनी वर्दी का साथ मिलने लगे तो दुश्मन को और क्या चाहिए?
अत्याधुनिक रडार और समन्वय तब तक बेकार है, जब तक भीतर का दुश्मन बाहर के दुश्मन से हाथ मिलाता रहेगा। राजस्थान पुलिस को अब केवल एक हवलदार को निलंबित करके इतिश्री नहीं करनी चाहिए। इस अदने हवलदार के पीछे पुलिस के मालदार भी छुपे हो सकते है। जांच वहां तक जानी चाहिए, जहां सच दफन है। जांच निडर हो, निष्पक्ष हो और इतनी गहरी हो कि इस दीमक के पीछे जो भी बड़े नाम हों, वे बे-नकाब होकर ही रहे। वर्दी की साख बचानी है तो वर्दी को भीतर तक बदलना होगा।
veejay.chaudhary@in.patrika.com
twitter/veejaypress
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