
शिक्षा का असली उद्देश्य कुछ 'चमकते सितारे' पैदा करना नहीं, बल्कि पूरे आकाश को रोशन करना होना चाहिए। इस ध्येय के विपरीत देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था विचित्र विरोधाभास के दौर से गुजर रही है। एक ओर आइआइटी, आइआइएम और एनआइटी जैसे संस्थान वैश्विक रैंकिंग में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं वहीं दूसरी ओर उसी व्यवस्था के भीतर गहरी असमानता की खाई भी चौड़ी होती जा रही है। हालिया आंकड़े चौंकाते हैं जिसमें यह तथ्य सामने आया है कि उच्च शिक्षा के कुल बजट का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा महज 3 प्रतिशत छात्रों पर खर्च हो रहा है, जबकि शेष 97 प्रतिशत छात्र संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। संस्थानों की संख्या भले ही 70 हजार के पार पहुंच गई है, लेकिन सकल नामांकन अनुपात अब भी लगभग 31 प्रतिशत के आसपास सिमटा हुआ है।
जाहिर है, विस्तार हुआ है, पर गुणवत्ता और कौशल का संकट जस का तस बना हुआ है। उच्च शिक्षा को लेकर यह तस्वीर केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की प्राथमिकताओं को आईना दिखाने वाला भी है। जब बजट का बड़ा हिस्सा चुनिंदा 'प्रीमियम' संस्थानों पर केंद्रित हो जाता है, तो बाकी विश्वविद्यालय और कॉलेज स्वाभाविक रूप से हाशिए पर चले जाते हैं। इससे एक ओर 'एलीट' शिक्षा का द्वीप बनता है, दूसरी ओर औसत संस्थानों का समुद्र, जहां संसाधनों की नौका अक्सर मंझधार में रहती है। उच्च शिक्षा के विस्तार के नाम पर देश में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या जरूर बढ़ी है, लेकिन सवाल यही है कि क्या उस अनुपात में शिक्षकों की गुणवत्ता, शोध का स्तर और बुनियादी ढांचा भी बढ़ा? निजी क्षेत्र की भागीदारी ने संख्या तो बढ़ाई, पर गुणवत्ता की गारंटी नहीं दे पाई।
'अन्स्र्ट एंड यंग' जैसी रिपोर्ट बताती हैं कि लगभग 85 प्रतिशत इंजीनियरिंग स्नातक प्लेसमेंट पाने में असफल रहते हैं। इससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि करीब 80 प्रतिशत कर्मचारी ऐसे कामों में लगे हैं, जो उनके कौशल से मेल नहीं खाते। यानी डिग्री तो मिल रही है, पर रोजगार की राह अब भी धुंधली है। यह स्थिति एक प्रकार की 'डिग्री मुद्रास्फीति' को जन्म दे रही है डिग्रियां बढ़ रही हैं, पर उनका मूल्य घटता जा रहा है। दूसरी ओर, चुनिंदा संस्थानों के छात्र बेहतर संसाधनों के कारण आगे निकल जाते हैं। यह असमानता केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विषमता को भी गहरा करती है।
समाधान केवल बजट बढ़ाने में नहीं, बल्कि उसके न्यायसंगत वितरण में है। संसाधनों का संतुलित आवंटन, गुणवत्ता पर सख्त निगरानी और पाठ्यक्रमों को उद्योग की जरूरतों के अनुरूप बनाना होगा ताकि डिग्री और रोजगार के बीच की दूरी कम हो। डिजिटल तकनीक और ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से भी संसाधनों की खाई को पाटा जा सकता है।
Updated on:
06 May 2026 02:31 pm
Published on:
06 May 2026 02:31 pm
