
विनय कौड़ा, (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)- पिछले वर्ष 7 मई को भारत ने सीमापार लक्षित सैन्य कार्रवाई करते हुए ऑपरेशन सिंदूर प्रारंभ किया था। यह निर्णय 22 अप्रेल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के प्रत्यक्ष उत्तर के रूप में लिया गया एक राजनीतिक-सैन्य कदम था। इस सैन्य कार्रवाई ने लगभग तीन दशक से चली आ रही उस भारतीय प्रवृत्ति को चुनौती दी, जिसमें हर बड़े आतंकी हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने और कूटनीतिक अपीलों पर निर्भरता दिखाई देती थी। इस बार भारत ने पहले कार्रवाई और बाद में उसकी व्याख्या का मार्ग अपनाया और यही इस बदलाव की केंद्रीय विशेषता थी।
दरअसल 1990 के दशक से लेकर हाल के वर्षों तक भारत की आतंकवाद-रोधी नीति का मूल यह रहा कि साक्ष्य प्रस्तुत कर विश्व समुदाय को आश्वस्त किया जाए। किंतु ऑपरेशन सिंदूर ने इस दृष्टिकोण को बदलकर प्रतिरोध की विश्वसनीयता स्थापित करने की दिशा में रूपांतरित कर दिया। पहलगाम हमले ने यह स्पष्ट कर दिया था कि आतंकवाद केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना की ओर से प्रयुक्त एक रणनीतिक उपकरण है। ऐसे में नैतिक अपीलों और कूटनीतिक आग्रहों की सीमाएं स्वाभाविक रूप से उजागर हो जाती हैं।
ऑपरेशन सिंदूर पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया ने इस यथार्थ को और स्पष्ट किया। एक वर्ष के भीतर यह सिद्ध हो गया कि वैश्विक राजनीति में नैतिकता से अधिक हितों का वर्चस्व है। आतंकवाद के प्रति दृष्टिकोण भी एक समान नहीं हैै, वह भौगोलिक निकटता, आर्थिक स्वार्थों और राजनीतिक उपयोगिता के आधार पर बदलता रहता है। पश्चिमी देशों के लिए आतंकवाद तब वैश्विक संकट बनता है जब वह उनके समाजों को प्रभावित करता है, जबकि दक्षिण एशिया में इसे प्राय: एक क्षेत्रीय समस्या के रूप में सीमित कर दिया जाता है। पहलगाम आतंकी हमला भी इसी श्रेणी में रख दिया गया और धीरे-धीरे वैश्विक विमर्श से ओझल हो गया।
रणनीतिक साझेदारियों के संदर्भ में भारत को एक प्रकार का यथार्थबोध हुआ है। पिछले वर्षों में निर्मित घनिष्ठ संबंधों के बावजूद, पहलगाम हमले के बाद कई सहयोगी देश पाकिस्तान का स्पष्ट उल्लेख करने से बचते दिखे। इसका अर्थ यह नहीं कि ये साझेदारियां निरर्थक हैं, बल्कि यह कि उनका दायरा सीमित है। वे शक्ति-संतुलन में सहायक हो सकती हैं, परंतु हर परिस्थिति में राजनीतिक समर्थन की गारंटी नहीं देतीं। 7 मई के बाद भारत ने इन संबंधों को अधिक यथार्थवादी दृष्टि से देखना प्रारंभ किया है।
इसी परिप्रेक्ष्य में अमरीका की भूमिका भी पुनर्मूल्यांकन की मांग करती है। डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमरीकी विदेश नीति का झुकाव व्यवहारिक सौदों और तात्कालिक रणनीतिक लाभों की ओर अधिक स्पष्ट हुआ है। पाकिस्तान के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख इस व्यापक बदलाव का संकेत है। यह प्रवृत्ति पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व, विशेषकर जनरल असीम मुनीर के लिए एक अवसर के रूप में उभरती है, जिसके माध्यम से वह अमरीका-ईरान में संघर्ष समाप्ति के लिए बिचौलिए की भूमिका निभाकर अपनी क्षेत्रीय प्रासंगिकता में विस्तार करने का प्रयास कर रहा है। पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति इस चुनौती को और जटिल बनाती है। बाहरी तनाव वहां की सैन्य व्यवस्था के लिए आंतरिक वैधता का स्रोत बन जाता है। भारत के लिए इसका अर्थ यह है कि उसे केवल सीमा-पार प्रतिक्रियाओं तक सीमित न रहकर इस व्यापक राजनीतिक-सामरिक संरचना को भी ध्यान में रखना होगा।
चीन की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में और अधिक जटिलता जोड़ती है। उसका दृष्टिकोण लंबे समय से अवसरवादी रहा है। वह आतंकवाद को केवल अपने आंतरिक संदर्भ में गंभीर मानता है, जबकि पाकिस्तान-आधारित आतंकी नेटवर्कों के प्रति उसका रुख लचीला रहता है। संयुक्त राष्ट्र में उसका व्यवहार और पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य-तकनीकी सहायता इस दोहरे मानदंड को रेखांकित करती है। साथ ही, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे जैसे उपक्रम इस साझेदारी को व्यापक भू-आर्थिक आयाम प्रदान करते हैं, जिससे क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ रहा है।
पिछले एक साल में यह भी स्पष्ट है कि भविष्य के सैन्य संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहेंगे। सूचना, प्रौद्योगिकी, साइबर और आर्थिक क्षेत्र समान रूप से निर्णायक बनेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण और वास्तविक-समय खुफिया तंत्र भारत की सुरक्षा संरचना को अधिक सक्षम बना सकते हैं। साथ ही, सूचना-युद्ध के युग में वैश्विक नैरेटिव को प्रभावित करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। यदि भारत अपनी आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता और कूटनीतिक सक्रियता को एकीकृत कर पाता है, तो वह न केवल आतंकवाद की लागत बढ़ा सकेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी वैधता और प्रभाव को भी सुदृढ़ कर सकेगा।
इसके अतिरिक्त, ऑपरेशन सिंदूर ने भारत को यह भी सिखाया है कि समुद्री और क्षेत्रीय भू-राजनीति को अलग-अलग खंडों में नहीं देखा जा सकता। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा और पश्चिम एशिया के साथ भारत के गहरे होते संबंध इस बात की ओर संकेत करते हैं कि आतंकवाद और सुरक्षा का प्रश्न व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ से जुड़ा हुआ है। भारत को अपनी 'एक्ट ईस्ट' और 'लिंक वेस्ट' नीतियों के बीच संतुलन बनाते हुए बहु-क्षेत्रीय रणनीति विकसित करनी होगी।
इसी क्रम में रक्षा आधुनिकीकरण और स्वदेशीकरण की आवश्यकता भी और अधिक स्पष्ट हुई है। लंबे समय तक आयात-निर्भर सैन्य संरचना रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित करती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह समझ मजबूत हुई है कि उन्नत हथियार प्रणालियों, ड्रोन प्रौद्योगिकी और साइबर क्षमताओं में आत्मनिर्भरता हमारी सुरक्षा की अनिवार्यता है। यह आत्मनिर्भरता दीर्घकाल में भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को भी सुदृढ़ करती है।आतंकवाद, भू-राजनीति, आर्थिक शक्ति और तकनीकी प्रतिस्पर्धा आज गहराई से परस्पर जुड़ी हुई है, और ऑपरेशन सिंदूर ने इस जटिल वास्तविकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। परमाणु-सशस्त्र पड़ोस और बहुधु्रवीय विश्व व्यवस्था के दबावों के बीच भारत की नई रणनीतिक सोच उभरी है, जिसमें साक्ष्य-आधारित अपीलों के बजाय प्रत्यक्ष कार्रवाई और सतत प्रतिरोध को प्राथमिकता दी गई है। यह दृष्टिकोण जोखिमपूर्ण अवश्य है, लेकिन साथ ही भारत के बढ़ते रणनीतिक आत्मविश्वास का स्पष्ट संकेत भी देता है।
Updated on:
06 May 2026 02:47 pm
Published on:
06 May 2026 02:43 pm
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