
पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी (फोटो: पत्रिका)
पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आ गए हैं। मतदाताओं ने फैसला भी सुना दिया है। पश्चिम बंगाल समेत तीन राज्यों में जनता ने सत्ता भी बदल दी है। पश्चिम बंगाल के चुनाव ने तो इस बार देश के सामने कितने तरह के नए-नए अनुभव रख दिए। अनेक कल्पनाओं का सूत्रपात भी किया। लोकतंत्र की कितनी तरह की करवटें और सलवटें सामने आईं।
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन की मुख्य वजह तलाशी जाए तो कानून-व्यवस्था की कमजोरी सबसे ऊपर होगी। केंद्र सरकार के निर्देश के बावजूद बांग्लादेश सीमा पर तारबंदी के लिए जमीन नहीं देने जैसे कई अन्य कारण भी रहे। राज्य में कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति का अनुमान इसी बात से लग सकता है कि निर्वाचन आयोग को चुनाव के ऐन पहले वहां न केवल मुख्य सचिव और डीजीपी, बल्कि ग्यारह सौ से ज्यादा पुलिस व प्रशासनिक अफसरों के तबादले करने पड़े। पुलिस में तो न केवल बड़े अफसरों के बल्कि थानेदार तक के तबादले हुए। सीधे तौर पर कहा जाए तो एक संवैधानिक संस्था को दूसरी संवैधानिक संस्था पर विश्वास नहीं रहा।
इस अविश्वास का कारण भी खुद पुलिस ही है। पश्चिम बंगाल में पुलिस विभाग में बड़े पैमाने पर तबादलों से पूरा विभाग भले ही स्तब्ध न हो, देश तो स्तब्ध है। जहां 15 साल से किसी एक दल ने राज किया हो। जिस पुलिस के अधिकारियों को इन वर्षों में तरह-तरह के राष्ट्रपति पदक, सेवा पदक, न जाने कितनी तरह के मेडल अन्य प्रदेशों की तरह ही मिले। वहां इस तरह का अविश्वास!
प्रश्न यह है कि क्या बाकी प्रदेशों की भी पुलिस की छवि अन्दरखाने वही है जो इस बार पश्चिमी बंगाल में देखने को मिली। पश्चिम बंगाल में पुलिस ने कुछ वर्षों में सेवक के रूप में ऐसी छवि बनाई जिससे 15 साल से शासन चला रहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अपनी सीट पर चुनाव में सफल नहीं हो पाईं। आज हर प्रदेश में पुलिस, माफिया और नेताओं की सांठ-गांठ चर्चा में है सुप्रीम कोर्ट तक कई बार इस सांठ-गांठ को लेकर तीखी टिप्पणियां कर चुका है। पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखने के दिशानिर्देश भी न जाने कहां हवा हो जाते हैं। पुलिस सुधार को लेकर दर्जनों कमेटियों की रिपोर्ट भी धूल फांक रही हैं।
सवाल पश्चिम बंगाल का ही नहीं। आपको लगता है कि यह माफिया आज ही दिखाई दे रहा है। क्या राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को दिखाई नहीं दे रहा था, क्या वसुन्धरा राजे को दिखाई नहीं देता था। और, आज भजनलाल शर्मा को दिखाई नहीं देता है। क्या मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह को, कमलनाथ को नहीं दिखाई देता था और डॉ. मोहन यादव को आज दिखाई नहीं देता है। क्या छत्तीसगढ़ में रमण सिंह और भूपेश बघेल को नहीं दिखाई देता था और आज विष्णुदेव साय को नहीं दिखाई देता है? कमोबेश देश के दूसरे राज्यों में भी ऐसे ही सवाल उठने स्वाभाविक हैं।
चुनाव आयोग को किसी प्रदेश की पुलिस पर भरोसा नहीं रहा। इससे बड़ी धिक्कार की बात और क्या है? लोकतंत्र के झूठे मुखौटे लगाकर हम बैठे है। पुलिस अफसर पदक पर पदक तो लिए जा रहे हैं किन्तु उनके किसी पदक का सम्मान करने वाला इन्हें नहीं मिलेगा। आज पुलिस की छवि करीब-करीब इसी प्रकार की हो गई। क्यों किसी पुलिस अधिकारी को अपना सम्मान पैसे से बड़ा नहीं दिखाई देता? मुझे पता नहीं उनके परिवारजन, उनकी सन्तानें, उनके इस आचरण को देखकर क्या सोचते होंगे। क्या भारतीय दर्शन और भारतीय संस्कार, सनातन की व्यवस्था उनके लिए है ही नहीं?
अभी भी जो आईएएस, आईपीएस अफसर आ रहे हैं तैयार होकर, ये सब अंग्रेजीदां बने हुए ही आ रहे हैं। समझ में नहीं आया कि उन्हें भारतीय दर्शन का कोई पाठ पढ़ाया भी जाता है अथवा नहीं। सम्पूर्ण तंत्र ही अंग्रेजीदां बना बैठा है। सम्पूर्ण तंत्र में सेवा का भाव नहीं है, जिसके लिए पुलिस विभाग बना है। आज तो इसकी छवि माफिया व अपराधियों को ढकने और बचाने की हो गई। सभ्य व्यक्ति तो थाने तक जाने में भयभीत है। जिस तरह लोगों के साहबजादों को बचाने में उसकी भूमिका देशभर में सामने आ रही हैं वह शर्मनाक है। कोई पुलिस अधिकारी पक्के अवैध निर्माण को ध्वस्त करता दिखाई नहीं देता। क्या बांग्लादेशी घुसपैठिए पुलिस को कहीं नहीं दिखाई देते? सही पूछे तो आज पुलिस, माफिया का पर्याय बन गई हैं। आज स्थिति यह हो गई है कि अपराधियों पर विजय पाना तो दूर कई बार तो उनके साथ ही हो जाती है।
चुनाव में मतदाता ने ममता बनर्जी को वापस बुलाया अथवा नहीं यह सब बाद की बात है। उन्हें जाना ही था। प्रश्न मेरे सामने चुनाव से बड़ा पुलिस की भूमिका को लेकर है। आखिर क्यों सत्ता में बैठे लोगों के सामने पुलिस बिछ सी जाती है। कहा तो यह भी जाता है कि नेता, पुलिस के दम पर सत्ता चलाते हैं। ये वही है जो हमारी रक्षक कही जाती हैं। पर जो छवि बन गई है वह ऐसी कि आज एक भी पुलिसकर्मी को देखकर कोई भी आदमी उसे नमस्कार करने वाला दिखाई नहीं देता है। वे धूप में खड़े होकर चालान काटने को तैयार हैं। लेकिन कहीं भी जाम में राहत दिलाने को तैयार नहीं होंगे। सड़कें रोकने को तैयार हैं किसी न किसी बहाने से। लेकिन वो जनता के नहीं रहे। उन्होंने साबित कर दिया कि वे जनता के लिए काम नहीं कर रहे हैं। कहने को तो ये जनता के नौकर है और उनके पैसों से प्राप्त तनख्वाह से अपने बच्चों के पेट पालते हैं पर उसकी ही पीठ में छुरा घोंपते हैं।
इतिहास में अगर झाकें तो असुर भी पीठ पीछे छुरा मारने का काम नहीं करते थे। तंग करते थे, हिंसा भी करते थे पर सामने खड़े होकर। दुस्साहस दिखाकर। अट्टहास करके। पर पीठ में छुरा मारने का उदाहरण हमारे अफसर रखते रहते हैं। बहुत समय हाथ में नहीं होता आदमी के, आता है चला जाता है। हम भी सब चले जाएंगे। लेकिन पीठ में छुरा मारने का जैसा काम हो रहा है उससे आने वाली पीढ़ियां जरूर सबक लें। जनता के सेवक कहलाना चाहते हैं तो पहले जनता के सेवक ही बनें, सत्ता के नहीं।
gulabkothari@epatrika.com
Updated on:
05 May 2026 09:35 am
Published on:
05 May 2026 09:31 am
