
पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी (फोटो: पत्रिका)
मेरे पिता श्रद्धेय कर्पूरचन्द्र कुलिश जी की जन्म जयन्ती का 100वां वर्ष आज सम्पन्न हो रहा है। यूं तो प्रत्येक व्यक्ति की जन्म शताब्दी तो होती ही है, किन्तु मनाई (जनता द्वारा) उसी की जाती है, जिसने माटी से निकलकर माटी में लीन होने से पूर्व, देश का ऋण लौटाया हो। जितना देश ने दिया, उससे अधिक लौटाया हो। पाठकों की आत्मा से स्वयं की आत्मा को एकाकार करके, स्वयं स्वार्थ से ऊपर उठकर, पाठकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए संघर्ष किया हो। जिन्होंने कलम से सिद्ध कर दिया हो कि पत्रकार शिक्षा से पैदा नहीं किया जा सकता, विशुद्ध बुद्धिमानी भी अपनी उष्णता नहीं छोड़ती। अतः वही व्यक्ति श्रेष्ठ पत्रकार बन सकता है, जो स्वयं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व समझता हो, दूसरों के अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा करना अपना धर्म समझता हो। क्योंकि अभिव्यक्ति आत्मा का विषय है। न शरीर का, न ही बुद्धि का। पत्रकारिता साधना है, रक्त में प्रवाहित रहती है। वह एक संत की भाति समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए जीता है। समाज उसका पेट भरता है। श्रद्धेय बाबूसा. सत्यमेव जयते के उद्घोष के साथ जन-जन के हृदय में प्रतिष्ठित श्रद्धा और विश्वास से पत्रिका वृक्ष को पोषित करके, समय के साथ निवृत्त भी हो गए-अनासक्त भाव से। आज वही श्रद्धेय पितृ पुरुष मेरे रक्त में प्रवाहित हैं। वे ही मेरी कलम यात्रा की निरन्तरता को बनाए रखते हैं।
मानव जीवन का उद्देश्य शास्त्रों ने पुरुषार्थ के माध्यम से आत्म कल्याण बताया है। इसी क्रम में हमारे ऋषियों ने आशीर्वचन रूप कहा-जीवेत शरदः शतम्। स्वस्थ और सक्रिय सौ वर्षों की अवधि में जागरूक रहकर श्रेष्ठ देखें, श्रेष्ठ सुनें और श्रेष्ठ अभिव्यक्त करें। ज्ञानवान होकर उन्नति करें। किसी के अधीन नहीं होकर आत्मनिर्भर बनें। इस तरह श्रेष्ठ मानव के रूप में शतायु होकर कर्म करें ताकि आपका यश, आपकी कीर्ति भावी युगों में गूंजती रहे। श्रद्धेय बाबूसा का जीवन ऐसी ही श्रेष्ठता का प्रतिबिम्ब बना।
शताब्दी वर्ष के दौरान देशभर में, विशेषकर राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में सालभर अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से श्रद्धेय बाबूसा. की स्मृतियों को जीवन्त होते देखा। राजस्थान पत्रिका के रूप में लोक कल्याण की जो मशाल उन्होंने जलाई, उसके प्रकाश में लोकतंत्र को मजबूत होते देखना हम सबके लिए हर्ष और गर्व की बात है।
अभिव्यक्ति की पावनता उसके खरेपन में है। सत्य ही विश्वास की नींव बनता है। श्रद्धेय बाबूसा. ने अभिव्यक्ति पर अंकुश स्वीकार नहीं किया और इसी संकल्प के साथ राजस्थान पत्रिका का बीज रोपा था। फिर जिस यात्रा पर वे चल पड़े, वहां सूर्य की भांति केवल देना ही ध्येय बन गया। जिसने देना सीखा, माटी से निकलकर माटी का कर्ज चुकाना सीख लिया, उसी की यशोगाथा जनमानस में अंकित हो जाती है। बाबूसा. ने पाठकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने के साथ ही सिद्ध कर दिया कि पाठकों के आत्मा से स्वयं के आत्मा को एकाकार करके ही व्यक्ति श्रेष्ठ पत्रकार बन सकता है।
षष्टिपूर्ति पर पत्रिका के दैनन्दिन कामकाज से निवृत्ति लेने से पूर्व बाबूसा. ने पत्रकारिता का ऐसा सुदृढ़ संस्थान खड़ा कर दिया था, जो पाठकों के विश्वास पर हमेशा खरा उतरा। इसी ऊर्जा ने पत्रिका को श्रेष्ठ समाचार पत्र के रूप में स्थापित किया, जो मूल्यों, संस्कृति व संस्कारों की धरोहर को अक्षुण्ण बनाए रखने में सतत् समर्पित रहा है। उतार-चढ़ाव के विकट दिनों में पाठकों और सहयोगियों का सम्बल पत्रिका की थाती रहा है।
बाबूसा. के आत्मकथ्य पर आधारित 'धाराप्रवाह' आपने अवश्य पढ़ी होगी। कैसे शुरुआत के दिनों से ही पत्रिका जनसंघर्ष की आवाज बनकर पाठकों के हृदय में स्थान बनाता गया, यह कई घटनाओं से आप समझ सकते हैं। चुंगी आंदोलन और हाईकोर्ट प्रकरण जैसे अनेकानेक अवसरों पर बाबूसा की नजर सदैव व्यापक जनहित पर केन्द्रित रही। चीनी घोटाले में मंत्री को पद छोड़ना पड़ा हो अथवा महादेवी वर्मा के अपमान के मामले में सरकार को कुर्सी गंवानी पड़ी हो, पत्रिका ने बाबूसा की दृष्टि के अनुरूप मूल्य आधारित जनसापेक्ष भूमिका निभाई। आपातकाल के दौरान अभिव्यक्ति के संकट के समय उनके आलेखों ने पाठकों को जागरूक रखा। अखबार को जनचेतना के संवाहक के रूप में प्रतिष्ठित कर उन्होंने पत्रकारिता और पत्रकार को नई ऊंचाइयां प्रदान की।
उनके कवि मन की संवेदनशीलता पत्रिका में रच-बस गई। उन्होंने जब पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण किया तब वह दौर राजस्थान का शैशवकाल था। राजस्थान की विकास यात्रा को समझने के लिए अवश्य ही राजस्थान पत्रिका और बाबूसा की उस दृष्टि को भी समझना होगा जिसमें जनचेतना और राष्ट्र देवता के प्रति अर्चना का भाव है। वह सजगता भी है जो पाठकों को उनके अधिकारों के प्रति कदम-कदम पर सावचेत करती है। वस्तुतः सरकारों के साथ कदमताल करने की बजाय पत्रिका ने एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाते हुए पत्रकार धर्म को जीया है। पाठकों की विश्वसनीयता को ही सर्वस्व मानते हुए सदैव आनन्द की अनुभूति की है। सरकारों का विरोध सहन करके, कई तरह के नुकसान झेलते हुए पाठकों के मन में विश्वास बनाया है। इसी को जीवन की कमाई कहना चाहिए।
विश्वसनीयता का यह रस हमें जन्मघूंटी में पिलाया गया है। पाठक ही हमारा ईश्वर है। रोजाना प्रातः अखबार के रूप में हमारी आराधना के पुष्प पाठकों के मन मन्दिर तक पहुंचते हैं। चेतना के इस स्तर पर पाठकों के प्रति कलम का धर्म निभाया जाए तो उनका कई गुना स्नेह और विश्वास अवश्य प्राप्त होता है।
पत्रिका ने जनता और सरकार के बीच विश्वास का सेतु बने रहकर लोकतंत्र को शक्ति सम्पन्न रखने का अनुष्ठान किया है। इस दिशा में पत्रिका ने कभी अर्थलाभ को महत्त्व नहीं दिया। सरकार का अंग बनने की बजाए जनता की आवाज बने रहना श्रेयस्कर माना। संस्कार और मूल्यों के प्रति अलख जगाते रहने का निरन्तर प्रयास किया है। नई पीढ़ी को हमारे ऋषि ज्ञान से अवगत कराते रहने का बीड़ा श्रद्धेय बाबूसा. ने वेदविज्ञान के माध्यम से उठाया। इससे सम्पूर्ण उत्तर भारत में संस्कृत-संस्कृति और भारतीय चिन्तन के प्रति नया रुझान अनुभूत होता रहा है। आज भी यह उपक्रम जारी है जो पाठकों को अपनी माटी की संस्कृति से जोड़े रखने का विनम्र प्रयास है।
पत्रिका की नींव के साथ ही सदैव जागते रहने का जो संकल्प श्रद्धेय बाबूसा ने किया वह ऊर्जा के रूप में हम सभी को चेतन बनाए हुए है। इसी ऊर्जा के स्पन्दन से समाज को सजग रखने की जिम्मेदारी को भी दिशा मिलती रही है। श्रद्धेय बाबूसा. ने आंधी-तूफान-भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों की मदद का जब भी आह्वान किया तो पाठकों के भरपूर सहयोग से राहत प्रदान करने के प्रतिमान बन गए। शिक्षा-स्वास्थ्य और खेल क्षेत्र की प्रतिभाओं की मदद, गोडावण-गिद्धों के संरक्षण के रूप में पर्यावरण की चिंता, लोककलाओं को प्रश्रय और आतिशबाजी के माध्यम से शोरगरों के पुनरुत्थान जैसे अनेक उपक्रमों के माध्यम से समाज का ऋण लौटाने का भाव ही बलवती रहा।
संवाद आत्मा का विषय है। प्रतिदिन एक नए ग्रन्थ के रूप में लिखा जाता है। बुद्धि सदा भ्रमित करती है। इसमें संवेदना नहीं होती-धर्म निरपेक्षता का तड़का होता है। आत्मा सब में एक ही होती है। अखबार आत्मा को सम्बोधित करता है। धर्म निरपेक्ष शिक्षा से नहीं निकल सकता, न ही बुद्धि के धरातल से इसका उद्गम है। मन की संवेदना-लोकहित-माटी का ऋण-'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की वेदी पर वासन्ती भावनाओं की आहुतियां लगती हैं। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' ही निष्पक्ष और विश्वसनीय संवाद का साहस देता है। अर्थ और काम की जीवन-शैली तो व्यापार के लिए प्रेरित करती है, जहां व्यक्ति संसाधन बन जाता है। संसाधन का परिणाम मुद्रा है।
राजस्थान पत्रिका न मुद्रा है, न ही संसाधन। इसे सिद्धान्तों के रक्त से सींचा गया है। पाठकों के हित में यह भी आवश्यक है। सृष्टि में तीन चौथाई असुर रहते हैं। इनके मध्य धर्म की रक्षा संघर्ष मांगता है। तभी 'धर्मो रक्षति रक्षितः' के आधार पर पत्रिका जन-संवाद का सत्य-धर्म निभा रहा है, निभाता रहेगा।
पाठकों की सहायता से पत्रिका ने प्रत्येक सरोकार के अभियान को एक कीर्तिमान बना दिया। प्रगति के सेतु-बंध का यह श्रेष्ठ उदाहरण है, जहां हर पाठक का पत्थर तैर रहा है। पाठकों के विश्वास पर कभी कोई आंच नहीं आई। करगिल युद्ध में शहीदों की वीरांगनाओं व परिजनों को घर-घर जाकर सहायता पहुंचाई, वह मानवीय संवेदना का अनूठा प्रमाण था। 'एक मुट्ठी अनाज' योजना बच्चों को मातृभूमि से जोड़ने का ही एक प्रयास था। सेना के साथ 'तृष्णा नौका अभियान' ने राजस्थान की शौर्यगाथा को चंदन का तिलक लगाया था।
आज राजनेता बदल गए, कार्यपालिका अर्थ-काम में डूब गई, न्यायपालिका अपने ही फैसलों के प्रति पूरी तरह उदासीन होने लगी है। सरकारें आज भी 21 वीं सदी के अनुरूप शिक्षित भी नहीं है। बात सनातन की करती है, निर्णय धर्म निरपेक्ष। अतः आज राज्यों में कार्यपालिका का ही वर्चस्व होने के कारण 'न किसी के दबाव में, न किसी के प्रभाव में' का नारा लेकर चलना सहज कर्म नहीं है। हमें देने के लिए जीना है। इस वृक्ष के फल समाज को मिलते रहें, समाज वृक्ष को सींचता रहे, यही हार्दिक कामना भी है।
देश ऊंचा होता है अपनी संस्कृति से, जो पढ़ाई जाती है मां की पाठशाला में। सभ्यता जमाना सिखाता है, जो कि परिवर्तनशील है। जब तक हमारे देश की हर माता सभ्यता और संस्कृति में संतुलन बनाए रखेगी, यह देश कभी नहीं झुकेगा। पत्रिका का अभियान हर स्त्री को उसकी आन्तरिक शक्तियों, अन्तर्मन को, सनातन वैदिक धारा से जोड़े रखेगा। हर घर में अभिमन्यु की तरह संस्कारवान संतान होगी। तभी तो हम विश्वगुरु बन सकेंगे।
आज जब श्रद्धेय बाबूसा. की शताब्दी मनाई जा रही है-जो कि हमारे रक्त-चेतना में प्रवाहित हैं, जिन्होंने राजस्थान और स्वच्छ पत्रकारिता के विकास में लाखों आहुतियां दी थीं, पाठकों के बीच राष्ट्र चेतना का सपना संजोया था, उनको भाव-भीनी श्रद्धांजलि देने के साथ ही कृत संकल्प होने का अवसर है कि प्रदेश में, राष्ट्र में पत्रकारिता की छवि धूमिल नहीं होने देंगे। पाठक भी तभी सशक्त बनेगा, जब वह स्वतंत्र मीडिया की शक्ति को बनाए रखेगा।
आज के इस पावन पर्व पर देशवासियों को कोटि-कोटि बधाइयां-शुभकामनाएं! आओ मिलकर लोकतंत्र का मान बढ़ाएं! अर्थ काम से लड़कर ही देश को विश्वगुरु बना सकते हैं। उठो, आगे बढ़ो! हम साथ-साथ आगे बढ़ें।
ओम् सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सहवीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा
विद्विषावहै।।
gulabkothari@epatrika.com
Published on:
20 Mar 2026 08:31 am
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