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ऊर्जा आत्मनिर्भरता की चुनौती: संकट से अवसर तक का सफर

यह बोझ हमारे विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।लेकिन इस निर्भरता को कम करने का रास्ता भी हमारे पास है और वह है साल में 300 से अधिक दिनों तक सूर्य की असीम ऊर्जा।

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अजीत रानाडे, वरिष्ठ अर्थशास्त्री (द बिलियन प्रेस)- पश्चिम एशिया के आसमान में जब मिसाइलें चमकती हैं, तो उसके झटके भारत के हर घर के बिजली और पेट्रोल के बिल तक महसूस होते हैं। इस क्षेत्र में जारी संकट ने भारत की ऊर्जा-निर्भरता में गहरी कमी को उजागर किया है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता होने के बावजूद भारत अपनी जरूरत का लगभग 89 प्रतिशत-यानी सालाना करीब 1.75 अरब बैरल या हर दिन लगभग 48 लाख बैरल आयात करता है। इसमें से 60 प्रतिशत से अधिक का आपूर्ति मार्ग भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य है।

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 137 अरब डॉलर रहा। यदि कीमतें मार्च के औसत 113.57 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती हैं, तो यह बिल बढ़कर 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। कच्चे तेल के दाम में हर 10 डॉलर की वृद्धि भारत के आयात बिल में 14 से 16 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ डालती है। यह बोझ हमारे विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।लेकिन इस निर्भरता को कम करने का रास्ता भी हमारे पास है और वह है साल में 300 से अधिक दिनों तक सूर्य की असीम ऊर्जा। हालांकि हाल के वर्षों में बढ़ती यह भीषण गर्मी कभी-कभी अभिशाप जैसी प्रतीत होती है, लेकिन आबोहवा के लिहाज से बोझ लगने वाली यही तपिश ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक अवसर भी है। भारत आज भरपूर धूप वाले 120 से अधिक देशों के समूह 'इंटरनेशनल सोलर अलायंस' का नेतृत्व कर रहा है।

वर्ष 2025 में भारत ने 38 गीगावाट नई सौर क्षमता जोड़ी, जो अमरीका के 35 गीगावाट से अधिक है। अब देश की कुल स्थापित सौर क्षमता 150 गीगावाट से ऊपर पहुंच चुकी है, जबकि सौर ऊर्जा उत्पादन 2013-14 के 3.4 टेरावाट प्रति घंटे से बढ़कर 2024-25 में 144 टेरावाट प्रति घंटे तक पहुंच गया है।अप्रेल में जब तापमान 45 डिग्री के पार चला गया था और उत्तर भारत में एयर कंडीशनर पूरी क्षमता से चल रहे थे, तब बिजली की मांग रिकॉर्ड 256 गीगावाट तक पहुंच गई।

इस कठिन समय में अकेले सौर ऊर्जा ने 81 गीगावाट बिजली प्रदान की, जो कुल उत्पादन का लगभग एक-तिहाई था। राष्ट्रीय ग्रिड इस दबाव को झेल गया, यह सौर ऊर्जा की क्षमता का स्पष्ट प्रमाण है। सौर ऊर्जा केवल स्वच्छ विकल्प ही नहीं, अपितु विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने का जरिया भी है। तेल आयात में केवल 10 प्रतिशत की कमी करने भर से हर साल 13 से 20 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। यदि पेट्रोल-डीजल से चलने वाले उपकरणों में ईंधन के रूप में सौर ऊर्जा इस्तेमाल की जाए तो 10 करोड़ बैरल तेल की खपत घट सकती है, और इससे 7.5 से 11 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है। संभावना और भी प्रबल है।

भारत की 258 मिलियन मीट्रिक टन की रिफाइनिंग क्षमता, इसकी 239 मिलियन मीट्रिक टन की घरेलू खपत से ज़्यादा है। वर्ष 2025 में भारत ने 64.7 मिलियन मीट्रिक टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात कर 52 अरब डॉलर से अधिक कमाई की। वर्ष 2028 तक यह क्षमता 309 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने की उम्मीद है। यदि सौर ऊर्जा और विद्युतीकरण के कारण घरेलू खपत घटती है, तो भारत अधिक निर्यात कर क्षेत्रीय ऊर्जा केंद्र बन सकता है।हालांकि, इस राह में चुनौतियां भी अनेक हैं। सौर पैनलों के लिए बड़े भूमि क्षेत्र की जरूरत होती है, जिसका समाधान बंजर जमीन, छतों, हाईवे और नहर किनारों पर इंस्टॉलेशन से किया जा सकता है। राजस्थान और गुजरात में धूल और पानी की कमी के कारण सफाई मुश्किल है, जिसके लिए जलरहित रोबोटिक तकनीक उपयोगी है। सबसे अहम बात यह है कि सूरज हर शाम डूब जाता है, लेकिन बिजली की मांग बनी रहती है। वर्ष 2025 में भारत को 2.3 टेरावाट-घंटे स्वच्छ सौर ऊर्जा इसलिए छोडऩी पड़ी, क्योंकि ग्रिड उसे समाहित नहीं कर सका। भंडारण सुविधा की कमी भी एक बुनियादी कमी है। भारत को तुरंत बड़े पैमाने पर स्टोरेज सिस्टम लगाने की जरूरत है।

इसके अलावा, सौर उपकरणों का चीन से आयात चिंता का विषय है, हालांकि भारत की घरेलू क्षमता 172 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। सरकार ने 2028 तक सोलर सेल और वेफर का स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जिससे ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूती मिल सकती है। इस परिप्रेक्ष्य में पांच कदम आवश्यक हैं, सौर ऊर्जा में निवेश बढ़ाना, बैटरी स्टोरेज का विस्तार, ट्रांसमिशन ग्रिड का उन्नयन, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा और रूफटॉप सोलर योजनाओं का विस्तार। पश्चिम एशिया का संकट स्पष्ट करता है कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। युद्धों के कारण रातोंरात तेल आपूर्ति बाधित होने वाली दुनिया में ऊर्जा आत्मनिर्भरता केवल विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अनिवार्यता है। हर गीगावाट सौर ऊर्जा हमें होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता से एक कदम दूर ले जाती है। हर इलेक्ट्रिक वाहन एक आयातित तेल के बैरल को कम करता है। हर छत पर लगा सौर पैनल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक छोटा, लेकिन निर्णायक कदम है। सूर्य हर सुबह बिना किसी समझौते, बिना किसी भू-राजनीति उगता है। अब सवाल यह है कि क्या हम इस अनंत ऊर्जा को उस गति और पैमाने पर साध पाएंगे जिसकी आज जरूरत है।