14 मार्च 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

शरीर ही ब्रह्माण्ड : ऊर्जा है माया

माया ही श्रेय है, माया ही प्रेय है। दोनों ही आत्मा के आवरण बनते हैं। दोनों शरीर के साथ जुड़े हैं। राग-द्वेष भी मन के धातु हैं। क्रोध बुद्धिरूपी अहंकार से जुड़ा है। काम माया का मोहिनी रूप है।

4 min read
Google source verification

जयपुर

image

Gulab Kothari

image

गुलाब कोठारी

Mar 14, 2026

Shariri Hi Brahmand

फोटो: पत्रिका

देश के सभी शास्त्र इस विषय में प्रमाण हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि में एकमात्र ब्रह्म ही है। वही पुरुष है। शेष सभी माया का बनता-बिगड़ता ढांचा है। माया भी एक तत्व विशेष ही है, जो ब्रह्म के लिए कामना रूप में कार्य करती है। पुरुष के विस्तार में मदद करती है, किन्तु स्वयं में ऊर्जा रूप में ही रहती है। उसका कोई स्वरूप नहीं होता अतः वह दिखाई भी नहीं देती है। ऋतभाव है, सौम्या है, वह ब्रह्म को वेष्टित करके रहती है। ब्रह्म और माया, दोनों में ही कर्ता भाव नहीं है। ब्रह्म सत्य है, अतः सशरीर जीता है। माया रूपा सोम की आहुति से परात्पर और इसके आगे अव्यय पुरुष उत्पन्न होता है।


सृष्टि व्यक्त है और सृष्टिकर्ता अव्यक्त, निष्कर्म। स्त्री-पुरुष भी सृष्टिकर्ता के ही प्रतिनिधि रूप हैं, अतः उनका भी कुछ अंश अव्यक्त होगा ही। वही अव्यक्त अंश हर एक प्राणी में भी उपलब्ध हैं और समान रूप से कार्य करते हैं। इनका स्थान परात्पर है, व्यक्त अव्यय से परे है, अतः अक्षर पुरुष के आगे है। हमारा कर्म क्षेत्र अक्षर के आगे नहीं जाता। जीवात्मा अक्षर रूप सूक्ष्म शरीर का अंश है। चूंकि पुरुष का स्त्रैण भाग अधिकांशतः अपूर्ण पाया जाता है, अतः वह अपने माया भाव तक नहीं पहुंच पाता। स्त्री स्वयं माया का ही अवतार है अतः एक पूर्ण पुरुष ही स्त्री के माया भाव- परोक्ष भाषा में एवं इंगित में समझ सकता है।


स्त्री एक ओर माया है, तो दूसरी ओर बृहस्पति एवं शुक्र नीति में भी पटु होती है। उसे किसी औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती। सहज रूप से जीवन सम्पादन कर सकती है। पुरुष का निर्माण भी केवल स्त्री ही करती है। शिक्षा उसे जीविकोपार्जन सिखाती है, ज्ञान नहीं देती। उसकी मानवीय संवेदना को ही कम करती है। पुरुष (पति) में स्त्री अपना भविष्य देखती है। इससे भी आगे सन्तान सुख और सन्तान में भी भविष्य देखती है।


माया की दृष्टि विवर्त पर टिकी होती है। उसकी प्रथम भूमिका तो यही है। अतः पुरुष को प्रेम से पूर्ण करने का, उसकी मूर्ति निर्माण करने का (जैसी उसकी विवाह पूर्व की कल्पना थी) प्रयास करती है। पति के माया भाव को प्रेरित करके उसके मन में सृष्टि की कामना को प्रेरित करती है। ब्रह्म का बीज पुरुष में ही प्रतिष्ठित रहता है, स्त्री में नहीं। यही एक कारण है कि स्त्री (मादा) को पुरुष के साथ रहना पड़ता है। फिर भी उसका माया भाव पुरुष की समझ में नहीं आता।


कितना बड़ा सच है कि पुरुष (ब्रह्म) की इस सृष्टि में माया मात्र ऊर्जा रूप है। बस, बनती है, बिगड़ती है, स्वयं शरीर धारण नहीं करती। स्वयं का उसका कोई शरीर होता ही नहीं है। ऊर्जा की कोई आकृति नहीं होती। ऋत भाव-न केंद्र, न परिधि। बस व्याप्त रहती है। एक शरीर का रूप धारण करती है, दूसरा शरीर धारण करती है, तीसरा शरीर… ब्रह्म के भ्रमण के लिए नित नए स्वरूप धारण करती जाती है, मिटती जाती है। अर्थात् माया भ्रमित करते हुए विभिन्न योनियों में भ्रमण कराती रहती है। ब्रह्म स्थायी भाव से भीतर प्रतिष्ठित रहता है। प्रत्येक योनि में बीज रूप वही रहता है। कृष्ण भी यही कह रहे हैं कि हे अर्जुन (मानो किसी) यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी माया से घुमाता हुआ भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है-


ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता 18.61)

माया ही गति है-आगति है। स्थूल शरीरों में वही अपरा है अहंकृति है प्रकृति (सत्व, रज, तम) है, आकृति है। इसी का निमित्त रूप परा प्रकृति है। परा में भी कर्म नहीं है। अतः इसका सदा माया से सम्बन्ध रहता है। परा प्रकृति भी प्राण रूप, सूक्ष्म देह होती है। शरीर मिट्टी का घर है, बनता-बिगड़ता रहता है। पंचमहाभूतों के योग से बनता है, उन्हीं में समा जाता है। सारी आकृतियां माया की होती हैं, किन्तु पुरुष के लिए बनाई जाती हैं। पुरुष उन आकृतियों से गुजरता हुआ आगे बढ़ता जाता है। निष्क्रिय रहते हुए भी माया के कारण गतिमान दिखाई देता है।


माया ही श्रेय है, माया ही प्रेय है। दोनों ही आत्मा के आवरण बनते हैं। दोनों शरीर के साथ जुड़े हैं। राग-द्वेष भी मन के धातु हैं। क्रोध बुद्धिरूपी अहंकार से जुड़ा है। काम माया का मोहिनी रूप है। पशु-पक्षियों का काम जीवात्मा की कामना है। मनुष्य भी जब पशुभाव में होता है, तब वासना रूप कामना ही उसे आवृत्त करती है। सन्तति में भी पशुभाव की बहुलता रहती है, जबकि शरीर मनुष्य का ही होता है। विवाह-मर्यादा के बाहर के सम्बन्धों में ऐसा देखा जा सकता है। यहां स्त्री का ब्रह्मांश पति के ब्रह्मांश से युक्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में दूसरा पक्ष यह भी बलवान हो जाता है कि मां के द्वारा जीवात्मा को गर्भकाल में संस्कारित भी नहीं किया जाता। तब न तो जीवात्मा से ब्रह्मांश जुड़ पाता है, न ही जीव संस्कारित ही होता है। शुद्ध जैविक सन्तान, जिसमें जीवात्मा पूर्वजन्म के संस्कारों के साथ ही मानवदेह में पैदा होता है।


पृथ्वी भी माता है। उसका वामांग भी स्त्रैण है, सोमप्रधान है। दक्षिण का पूर्वभाग आग्नेय है। वामांग अथवा पश्चिमी भाग ही माया संसार है। यहां स्त्री और पुरुष दोनों स्वतंत्र रूप से मुख्यतः एकल भाव में ही रहते जान पड़ते हैं। युगल तत्व भी जीवात्मा से आगे नहीं जुड़ पाते। मध्य-पूर्व में भी मंत्रोच्चार ठहर-सा गया है। अतः ये भी भोग योनियां बनकर रह गई हैं।

मूल में ब्रह्म भी निराकार है। ऋतरूप ही है। माया के कारण उसमें पुर भाव आ गया। सत्य रूप में अव्यय बनकर पुरुष रूप हो गया। फिर भी ब्रह्मांश तो केन्द्र में ऋत रूप ही रहता है। परिधि ही आकृति है। इस पर अक्षर पुरुष का आवरण ही इसको तरलता देता है। क्षर रूप में घनता के साथ स्थूल शरीर धारण करता है। प्राणाकाश ही वायु-तेज-जल रूप होता हुआ पृथ्वी रूप में घनता धारण कर लेता है। इसी प्रकार आप्य, वायव्य और सौम्य सृष्टि का निर्माण होता है।


प्राण रूप जीवात्मा प्राणों के स्पन्दन से ही पोषित होता है। गीता में कृष्ण कहते हैं कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे-देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।। (3/11)

देवता और प्राण शब्द पर्यायवाची हैं। प्राणन के स्पन्दन, यज्ञ के मंत्रों के स्पन्दन, प्रार्थना-उपासना के स्पन्दन इन देवताओं का पोषण करते हैं। इन्हीं मंत्रों के माध्यम से दो जीवात्माओं के प्राण युगल रूप धारण करते हैं। भावनाओं के स्पन्दन ही इनकी जीवनशैली बनते हैं। जीवात्मा इन्हीं स्पन्दनों के कारण हृदय केन्द्र में प्रतिष्ठित ब्रह्मांश के सम्पर्क में रहता है।

माया रूप स्त्री ब्रह्मविवर्त को लक्ष्य में रखकर ही पुरुष के साथ रहती है। अतः पति-पत्नी का सम्बन्ध प्राणात्मक ही होता है, देहात्मक नहीं होता। विवर्त के लिये माया ही पुरुष-मन में कामना बनती है, प्रेरित करती है और स्वयं जीवात्मा से आगे अपने मायाभाव से जुड़ जाती है। ब्रह्मांश को आकर्षित करती है। पुरुष देह के सभी अंगाश को भी एकत्र करती है। पुरुष शरीर के पित्रंशों को, अंगांशों और ब्रह्मांश को लेकर पुंभ्रूण में प्रवेश करती है। मातरिश्वा वायु इस पुंभूण को शुक्राणु के रूप में स्थानान्तरित कर देता है, शोणिताग्नि में। अब यह सारा पदार्थ भाग स्वयं माया अपने शरीर में ले आती है। आगे का सारा नियंत्रण माया, परा, अपरा तीनों मिलकर बनाये रखती हैं।

क्रमशः gulabkothari@epatrika.com