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संपादकीय: रोकना होगा व्यवस्था की ढाल को खंजर बनने से

यह बैंकों का वही सिस्टम है, जो रसूखदारों के लिए नियमों को लचीला बनाने में पल भर की देर नहीं लगाता। बैंक के ये ही अधिकारी कहीं व्यवस्था को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैंं तो कहीं खंजर की तरह। यह सच है कि दस्तावेजी सबूतों से जुड़े नियम-कायदे किसी तरह के फर्जीवाड़े को रोकने के लिए बने हैं।

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अपनी मृत बहन के बैंक खाते में जमा रकम निकलवाने के लिए ओडिशा के गांव में आदिवासी युवक जीतू मुंडा ने जो कदम उठाया वह गरीब की बेबसी, सिस्टम की बेरुखी और कानून-कायदों की पालना से जुड़ी संवेदनहीनता का जीता-जागता उदाहरण है। बहन की मौत का सबूत देने के लिए कब्र खोदकर उसके कंकाल को बैंक की चौखट पर रखने वाले जीतू के लिए १९३०० रुपए बड़ी रकम थी। बहन की मौत के बाद उसके खाते की रकम जीतू को जीवनयापन का बड़ा सहारा नजर आ रही थी।

एक अनपढ़, गरीब व कानून-कायदों से अनजान जीतू जैसे कई लोगों को इस देश में आए दिन दस्तावेजी सबूतों को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ता है। चिंता की बात यह है कि सिस्टम से जुड़े लोग ऐसी स्थिति में मदद करने के बजाय नियमों के ऐसे जंजाल में फंसा देते हैं कि वह लाचारी में कोई भी अप्रिय लगने वालाकदम उठाने को मजबूर हो जाता है। बैंक में जमा रकम निकालने के लिए उठाया गया यह कदम किसी एक व्यक्ति से जुड़ी त्रासदी ही नहीं है बल्कि उस समूचे सिस्टम को आईना दिखाने वाली घटना है, जो जरूरतमंदों को उसके हक से वंचित करने में ही अपनी उपलब्धि मानता है। इस प्रकरण में भी बैंक के जिम्मेदार लोगों ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए मदद की राह निकालने के बजाय नियम-कायदों की ऊंची दीवारें खड़ी कर दीं। यह बैंकों का वही सिस्टम है, जो रसूखदारों के लिए नियमों को लचीला बनाने में पल भर की देर नहीं लगाता। बैंक के ये ही अधिकारी कहीं व्यवस्था को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैंं तो कहीं खंजर की तरह। यह सच है कि दस्तावेजी सबूतों से जुड़े नियम-कायदे किसी तरह के फर्जीवाड़े को रोकने के लिए बने हैं। अहम सवाल यह है कि क्या ऐसे नियमों का उद्देश्य किसी लाचार को परेशान करना भर ही होना चाहिए।

जीतू मुंडा के इस लाचारी भरे कदम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो उसे मदद की राह खुली जरूर है। घटना पर लीतापोती के प्रयासों में हो सकता है कि बचाव में जीतू की मानसिक स्थिति पर ही सवाल खड़े कर दिए जाएं। हकीकत तो यही है कि जीतू मुंडा का कदम उस गहरी पीड़ा का प्रतीक है, जो हर उस गरीब के दिल में पलती है, जिसे व्यवस्था बार-बार ठुकराती है। सिस्टम में बैठे लोगों का ऐसा बर्ताव न सिर्फ किसी को दी मानसिक प्रताडऩा है, बल्कि अन्याय भी है। बैंकों को ही नहीं, जनता के कामकाज से सीधे जुड़े सरकारी व गैरसरकारी प्रतिष्ठानों को मानवीय संवेदनाओं का पाठ पढ़ाने की ज्यादा जरूरत है।नियमों का मकसद जरूरतमंद की मदद करना है न कि इनकी आड़ लेकर किसी को ठोकरें खाने को मजबूर करना। चिंता की बात यह है कि सरकारें गरीब-आदिवासियों के कल्याण के कई कार्यक्रमों का दावा करती हैं वहीं दूसरी ओर जीतू जैसे लोग सिस्टम से लड़ ही नहीं पाते। संवेदनहीन कानून-कायदे व बेरहम सिस्टम तो पीड़ा बढ़ाने वाले ही होंगे। इन्हें लचीला बनाना होगा।