
मोहित शर्मा.
जयपुर. नमामि गंगे मिशन अब गंगा संरक्षण को आधुनिक टेक्नोलॉजी से जोड़ते हुए एक नया आयाम दे रहा है। राजस्थान के चंबल नदी क्षेत्र से विशेष रूप से जुड़ी यह पहल देश में जैविक विविधता संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मिशन के अंतर्गत हाल ही में 20 दुर्लभ Batagur kachuga (Red-crowned roofed turtle / तीन-धारी छत वाले कछुए) प्रजाति के युवा कछुओं को रेडियो टैग लगाकर यमुना, सरयू और गंगा नदी में छोड़ा गया है। इन कछुओं की हर गतिविधि अब सैटेलाइट ट्रैकिंग और AI आधारित रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम से लगातार निगरानी में है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर बहने वाली चंबल नदी वर्तमान में इस दुर्लभ कछुए की आखिरी प्रमुख सुरक्षित जगह बची हुई है। यहां की आबादी तेजी से घट रही थी। नमामि गंगे मिशन और राजस्थान वन विभाग के सहयोग से इन कछुओं को चंबल क्षेत्र से उठाकर संरक्षण केंद्रों में तैयार किया गया और अब उन्हें गंगा बेसिन में वापस बसाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
इन कछुओं की हर गतिविधि अब सैटेलाइट और AI आधारित रियल-टाइम ट्रैकिंग सिस्टम से मॉनिटर की जा रही है। यह भारत में नदी संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी-ड्रिवन पहल है। वैज्ञानिकों को अब तुरंत जानकारी मिल रही है कि प्रत्येक कछुआ कहां जा रहा है, किस क्षेत्र में कितना समय बिता रहा है, उसकी गतिविधि का पैटर्न क्या है और वह कितने समय तक जीवित रह रहा है।
AI और डेटा एनालिटिक्स की मदद से यह सारा डेटा विश्लेषित किया जा रहा है। इससे पता चल रहा है कि कछुओं के लिए कौन से क्षेत्र सबसे सुरक्षित हैं, कहां पानी की गुणवत्ता खराब है और कहांं पर प्रदूषण या अन्य खतरों के कारण उन्हें खतरा है। यह डेटा भविष्य में कछुओं को नए क्षेत्रों में छोड़ने, उनके प्रजनन कार्यक्रम चलाने और नदी के विभिन्न हिस्सों को प्राथमिकता देने की रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।
पहले संरक्षण प्रयास मुख्य रूप से भावनात्मक और पारंपरिक तरीके से चलाए जाते थे, लेकिन अब नमामि गंगे ने इसे विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सैटेलाइट टेक्नोलॉजी और बिग डेटा के संगम से जोड़ दिया है। यह 21वीं सदी का आधुनिक संरक्षण मॉडल है, जिसमें हर जीव की गतिविधि को डेटा के रूप में कैद करके उसके अस्तित्व को वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षित किया जा रहा है।
Batagur kachuga गंगा नदी तंत्र की अत्यंत दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजाति है। इसकी संख्या तेजी से घट रही थी। नमामि गंगे मिशन ने गंगा को साफ करने के साथ-साथ इसकी मूल जैविक विविधता को वापस लाने के लिए यह तकनीकी कदम उठाया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह AI-संचालित मॉडल सफल रहा तो भविष्य में गंगा बेसिन में गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल, विभिन्न मछलियों और अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण में भी इसी तरह की उन्नत टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाएगा। नमामि गंगे का यह प्रयास साबित कर रहा है कि नया भारत नदियों को सिर्फ साफ नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी की मदद से उनके प्राकृतिक और जैविक स्वरूप के साथ पुनर्जीवित कर रहा है।
Updated on:
30 Apr 2026 02:36 pm
Published on:
30 Apr 2026 02:35 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
