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शरीर ही ब्रह्माण्ड : एक ही माता-एक ही पिता

एकोऽहं बहुस्याम् रूप ब्रह्म की कामना ही सृष्टि निर्माण का प्रथम हेतु है। माया से घिरकर ब्रह्म भी सृष्टिकाल में मृत्युभाव से युक्त हो जाता है।

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फोटो: पत्रिका

एकोऽहं बहुस्याम् रूप ब्रह्म की कामना ही सृष्टि निर्माण का प्रथम हेतु है। माया से घिरकर ब्रह्म भी सृष्टिकाल में मृत्युभाव से युक्त हो जाता है। प्रश्नोपनिषद् में ब्रह्म के तीनों रूप अव्यय, अक्षर और क्षर मत्र्यभाव से युक्त कहे गए हैं। तिस्रो मात्रा मृत्युमत्य: प्रयुक्ता अन्योण्यसक्ता अनविप्रयुक्ता:। (प्रश्नोपनिषद् 5/6)


ब्रह्म का यह त्रिविध रूप ही पूरी सृष्टि में विद्यमान रहता है। अमृत लोक से आकर ब्रह्म मत्र्य विश्व में प्रविष्ट हो जाता है। जीव रूप को प्राप्त होने वाला यह 'गॉड पार्टिकल’ वस्तुत: पंचाग्नियों के माध्यम से पंचभूतात्मक (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश से बना) देह को धारण करता है। जीव पंचाग्नियों से गुजरता हुआ स्थूल देह में प्रवेश करता है। इसी बीच प्रत्येक लोक में जीव के साथ कुछ न कुछ जुड़ता जाता है, जो जीव की प्रतिसंचर (वापसी) यात्रा में उसी लोक में छूटता जाएगा। कहीं पितरों के अंश, कहीं प्रकृति के त्रिगुण (सत-रज-तम) तो कही कर्म-वीर्य (वर्ण)।


हम किसी भी प्रकार के बीज की यात्रा का अध्ययन कर लें, निष्कर्ष एक ही है। उसकी उत्पत्ति अपने पिता से ही होती है। हर बीज के पिता के पीछे भी उसका पिता ही मिलेगा। अन्तिम पिता सूर्य पर प्रतिष्ठित नजर आएगा। सूर्य ही जगत् का पिता है। वही सबका आत्मा बनकर बैठा है। वही सृष्टि का प्रथम षोडशी पुरुष है। सूर्य आत्मा जगतस्थुषश्च।


इसका एक अन्य अर्थ यह भी निकलता है कि पिता वै जायते पुत्रो। पिता ही माता के गर्भ से पुत्र बनकर पैदा होता है। पुत्र तत्त्व रूप में पिता ही है। सात पीढ़ी के 28 सह पिण्डों में सर्वाधिक पन्द्रह सह पिण्ड पिता के होते हैं। समझ में ये आ जाना चाहिए कि न कोई पिता है, न कोई पुत्र है। एक ही आत्मा भिन्न-भिन्न शरीरों से गुजरता हुआ सृष्टि क्रम में आगे बढ़ता जाता है। माता-पिता मार्ग उपलब्ध कराते हैं। पैदा नहीं करते। ब्रह्म अपनी माया शक्ति के योग से सर्वत्र व्याप्त है। एक ही आत्मा जड़-चेतन सभी में है। भीतर सब एक ही के अंश हैं। यही वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा है।


यानी समस्त सृष्टि में एक ही पिता, एक ही माता और संचालक रूप ईश्वर है। बाकी सब मिट्टी के खिलौने हैं! कोई न छोटा, न ही बड़ा; न अच्छा, न ही बुरा। सब अपने-अपने कर्मों के अनुसार जन्म लेते हैं, भोगते हैं, और चोला बदलते जाते हैं। पुराना चोला पुन: मिट्टी में समा जाता है। हम ही सतयुग से चले, चोले बदलते-बदलते यहां तक आ गए। हम ही सुर थे, असुर थे। पुन: प्रलय काल में केवल असुर रूप रह जाएंगे। देव तो सूर्य के साथ विदा हो जाएंगे।


हम शरीर नहीं हैं। उसके आगे न स्वयं को ही जान पाते हैं, न ही अन्य जीवों को। सभी प्राणी कृष्ण या ईश्वर के अंश हैं, तब कौन बड़ा-कौन छोटा? एक ही कारखाने से- एक ही मिट्टी से सारे खिलौने बनते हैं। बनाने वाली माया भी एक ही है। गीता में कृष्ण कह रहे हैं जितनी भी योनियां हैं, उनकी माता तो प्रकृति है और मैं बीज वपन करने वाला पिता हूं—
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता।। (गीता 14.4)

विश्वास नहीं होता- चौरासी लाख योनियों का एक ही पिता और एक ही माता! सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही दम्पती का परिवार? सभी प्राणी आपस में भाई-बहिन? क्या इसी को वसुधैव कुटुम्बकम् कहा गया है? सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्म भी अकेला ही था। दम्पती भाव कहां था? स्वयं ब्रह्म की भी कोई आकृति नहीं थी- निराकार था। प्राणरूप था। निरन्तर फैलने वाले स्वभाव का था- बस। किंतु स्वरूप नहीं था उसका। सोम था- अंधकार की भांति काला था। विष्णु प्राण उसका अधिष्ठाता था। आग्नेय था। भीतर सौम्य बीज रूप था। सृष्टि में बीज सौम्य ही होता है। अग्नि में आहुत होता है, किन्तु सृष्टि आग्नेय होती है। पंच महाभूता पृथ्वी रूप होती है। जल से ही पृथ्वी (आकृति) निर्मित होती है। जल की ही तीन अवस्था हेाती है- आप:, वायु, सोम। सोम शुद्ध बीज अवस्था है।


पृथ्वी में बीज बोया जाता है। पृथ्वी अग्निरूपा है। बीज भी जल से ही प्रस्फुटित होता है। प्रत्येक प्राणी का बीज भी सौम्य होता है- मादा योनि आग्नेय होती है। सृष्टि जल से ही होती है। बीज पेड़ बनने लगता है। उसका अस्तित्व तो समाप्त हो चुका होता है। वह पेड़ के रूप में बढ़ता जाता है। पृथ्वी के पोषण से पेड़ का निर्माण होता है। मां के गर्भ मे भी सन्तान के शरीर का निर्माण, ठीक वैसे ही, मां के पोषण से होता जाता है। पृथ्वी अन्न उत्पन्न करती है। अन्न से प्राणियों का शरीर बनता है। देह को भी पृथ्वी—पंचमहाभूता कहते हैं। मिट्टी कहा जाता है। पृथ्वी ही लक्ष्मी है, अर्थ सृष्टि की अधिष्ठात्री है। शरीर लक्ष्मी है- नर का भी, नारी का भी। दोनों एक ही मिट्टी से- माता के शरीर से उत्पन्न होते हैं।

गर्भ में शिशु के शरीर का निर्माण माता (अपरा प्रकृति) के शरीर-मन-बुद्धि-अहंकार (अष्टधा) से होता है। अत: शिशु शरीर भी माता ही है। यानी कि प्रत्येक प्राणी की देह ही उसकी माता है। पेड़ का शरीर पृथ्वी हैं। पृथ्वी के घटक (लवण-धातु-मिनरल आदि) ही शरीर के भी घटक बन जाते हैं। ये ही घटक वहां के अन्न में भी रहते हैं। अर्थात् हमारा शरीर भूगोल आधारित होता है। यही स्थानीय अन्न का महत्त्व है।


पृथ्वी में आम की गुठली बोई। वैसा ही आम होगा यह तो तय है। किस जमीन पर बोया, उसका प्रभाव भी आम के स्वाद पर पड़ेगा। गुजरात और बनारस का आम-लंगड़ा-एक सा स्वाद नहीं देगा। पृथ्वी के तत्त्व ही सम्पूर्ण पेड़-पत्ते-मंजरी-आम में प्रवाहित रहते हैं। इन्हीं के साथ-साथ गुठली का स्वरूप-आकृति, प्रकृति-अहंकृति भी प्रवाहित रहते हैं, जो कि बीज का ही अभिन्न अंग होते हैं।


एक ओर मां के शरीर को समझें, जिससे सन्तान का शरीर बनता है। कन्या सन्तान का शरीर ही अगली पीढ़ी की कन्या सन्तान का शरीर होगा। मां का शरीर जैसे मां के शरीर से बना, उनका शरीर नानी के शरीर से बना। आप मां के शरीर को पीछे-पीछे देखते जाएं- कहां पहुंचेंगे अन्त में? सृष्टि के प्रथम माया शरीर तक। प्रत्येक प्राणी की माता के शरीर का वही उद्गम है।


शरीर का आधार अन्न है और मन का आधार भी अन्न है। मां ही मन का भी आधार है। विचारों का संस्कार मां ही है। प्रकृति ही स्वभाव कहलाती है। जैसा मन, वैसी ही मन में उठने वाली इच्छा। यही जीवेच्छा कहलाती है। इसी के कर्मों के नए फल पैदा होते हैं। एक मन होता है ईश्वर का- श्वोवसीयस मन। इस मन को हृदय भी कहा जाता है- ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति (गीता)


यह मन भी प्रत्येक प्राणी का एक ही होता है। ईश्वर जब एक है तो उसके मन दो कैसे हो सकते हैं। इसी मन पर कर्मों के फल रूप आवरण होने से प्रत्येक प्राणी को यह अपना निज मन लगता है। वास्तव में न तो ईश्वर के दो रूप हैं, न ही इस मन के। जीवात्मा का मन इन्द्रिय मन रूप होता है।


आम जब पक जाता है तो उसमें रस पैदा होता है। उसमें नया बीज पैदा होता है। रस ही ब्रह्म है- रसो वै स:। बीज पुराने बीज की ही सन्तान है, पुत्र है। मां की तरह पिता को भी हम देखें तो वह भी पितामह ही होगा। इस प्रकार पिता का पिता ही बीज बनता हुआ दिखाई पड़ेगा। सबसे अन्त में ब्रह्म ही हमारा पिता नजर आएगा। इसीलिए कृष्ण ने कहा था- ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:- कहने का अर्थ है कि सम्पूर्ण सृष्टि का पिता एक है, माता भी एक है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com

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