11 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

शरीर ही ब्रह्माण्ड – स्त्री : माया का मातृत्व भाव

सारा प्रपंच अविद्या का रहता है- सृष्टिसाक्षी मन का। अविद्या ही आगे से आगे मन को चंचल बनाए रखती है। विशेषकर उन लोगों का, जिनका मन कमजोर है, सोम का भाग गौण है।

4 min read
Google source verification
Article-Sharir-Hi-Brahmand

फोटो: पत्रिका

प्रकृति में अव्यय पुरुष ही माया का शक्तिमान है। माया चूंकि शक्तिरूपा है, अत: स्वतंत्र कार्य नहीं करती है। प्रत्येक कार्य में ब्रह्म की स्वीकृति अनिवार्य है। माया का वैसे भी ब्रह्म के अतिरिक्त किसी से सरोकार नहीं है। माया के कार्य भी यही हैं—उसका विवर्त बनाना, जिसके लिए ब्रह्म ने उसको पैदा किया। इस विवर्त को बनाए रखना। इसके लिए जीवात्मा को अविद्या के पाश में बांधकर रखना, ताकि वह मोक्ष पाने की चिन्ता ही न करे। साथ ही मुमुक्षु को मोक्ष प्राप्ति में सहायता भी करे।


अव्यय की दो दिशाएं हैं- सृष्टिसाक्षी और मुक्तिसाक्षी। सृष्टिसाक्षी के लिए जीवात्मा को प्रकृति के हवाले कर देता है। नानाभाव में विश्व आकार लेता जाता है। मृत्युलोक का निर्माण होता है। मृत्युलोक में सूर्य ही विश्व का आत्मा बनता है। सृष्टि अविद्या से ही होती है। जीव की पहुंच देवराज इन्द्र से आगे नहीं होती। मन की (त्रिगुणी) कामना से गुणमयी सृष्टि होती है। गुणों के अनुरूप प्रकृति और आकृति का निर्माण होता है। वैसा ही जीवात्मा अन्न ग्रहण करता है, वैसी ही कामना मन में उठती है। परा और अपरा प्रकृति के माध्यम से पुनर्जन्म और कर्मफल का चक्र बना ही रहता है।


सारा प्रपंच अविद्या का रहता है- सृष्टिसाक्षी मन का। अविद्या ही आगे से आगे मन को चंचल बनाए रखती है। विशेषकर उन लोगों का, जिनका मन कमजोर है, सोम का भाग गौण है। स्त्रियों में पुरुषाग्नि की प्रबलता से अविद्या भाग प्रधान होता जाता है। अद्र्धनारीश्वर का संतुलन ही इसका समाधान है।


मृत्यु से अमृत लोक की ओर जीवन के प्रवाह को मोडऩे के लिए विद्या भाव का सहारा चाहिए। इसके लिए मन की कामना का स्वरूप बदलना आवश्यक है। इसके लिए मन को दृढ़ संकल्पवान बनाना अनिवार्य है। पुन: नित्य भाव भावित करना कि मुझे विद्यामार्ग का पथिक बनना है। अन्न से राजसी-तामसी अंश को अल्पतम करके सात्विक अन्न ग्रहण करने का अभ्यास भी जरूरी है। साथ ही किसी सात्विक पुरुष की संगत रहनी चाहिए। जहां विचारों में सकारात्मकता बढ़े, ऊर्जा बढ़े और निरन्तर आगे बढ़ते रहने की चर्चा बनी रहे।


अव्यय पुरुष की दो प्रकार की प्रकृतियां हैं—परा, अपरा। इनको ही अक्षर और क्षर पुरुष कहते हैं—
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।। (गीता 15.16)
अध्यात्म में अव्यय कारण शरीर है, ईश्वर का प्रतिनिधि है। उसका केन्द्र ही अक्षर रूप हृदय है। दोनों संस्थाएं साथ रहती हैं। दोनों ही मिलकर सूक्ष्म शरीर कहलाते हैं। अव्यय या कारण शरीर में व्यक्ति का मूल मन रहता है। संचित और प्रारब्ध कर्म रहते हैं। रसबल रूप में ब्रह्म और माया द्रष्टा रूप रहते हैं। इसी माया के कामना रूप से प्रारब्ध कार्य करता है। यही महामाया रूप में अक्षर शरीर के द्वारा क्षर का संचालन करती है। क्षर प्रकृति का कार्यक्षेत्र है। शरीर है।


स्थूल शरीर मां है। मां की देह से ही इसका निर्माण होता है। जो अन्न मां ग्रहण करती है, वही अन्न गर्भ में सन्तान के शरीर का निर्माण करता है। मन का निर्माण करता है। जो रक्त और उसके साथ अत्रिप्राण ऋतुकाल में स्त्री शरीर से निकलते हैं, वे ही गर्भ में शरीर निर्माण में काम आते हैं। शरीर की पारदर्शिता को रोकते हैं। स्त्री- मन के भाव ही सन्तान के मन का पोषण करते हैं। शरीर जड़ है। व्यक्ति के कर्मों से ही 84 लाख योनियों की यात्रा का टिकिट मिलता है।


मां के कार्य के दो क्षेत्र होते हैं- एक स्थूल शरीर के निर्माण और पोषण का। इसमें पिता की भूमिका भी नहीं होती। यहां स्त्री-पुरुष दो भिन्न संस्थाओं के रूप में दिखाई देते हैं। मां ही ब्रह्म को पुरुष शरीर से लेकर आती है- माया बनकर। ब्रह्म सदा माया के ही आवरण में रहता है। स्त्री में भी माया का अंश रहता है। वह ही पुरुष देह में माया से सम्पर्क करती है। पुरुष की चेतना वहां कार्य नहीं करती। उसको अपने ब्रह्मांश के च्युत होने का भान तक नहीं होता।


माया इसी मातृत्व भाव के लिए स्त्री रूप में (मादा प्राणी शरीर) जन्म लेती है। यह चेतना जन्म से ही उसके मन में बनी रहती है। इसी दिव्यता के लिए कन्या पूजन का विधान है। इसी के लिए वह सदा पूजा व्रत करती है- अच्छा घर मिले, अच्छा वर मिले। अच्छी सन्तान के लिए प्रार्थना करती रहती है। इसी के लिए पति के घर जाकर रहती है। उसे अपनी भूमिका याद रहती है। यह उसके सूक्ष्म शरीर में स्पन्दन रूप कर्म है।

विवाह के बाद वह भी पुरुष हृदय में प्रतिष्ठित हो जाती है। दोनों संयुक्त कर्म करते हैं। यहीं से स्त्री पुरुष के जीवात्मा का अंश- उसके सम्पूर्ण शरीर से- एकत्र करके ले जाती है और स्वयं में आहुत कर लेती है। सारा कर्म स्थूल में द्विपक्षीय होते हुए भी सूक्ष्म में एक पक्षीय ही रहता है। हां, यदि पुरुष भी ईश्वर से जुड़कर कर्म में युक्त होता है, तब द्विपक्षीय हो जाएगा। इस कर्म की भूमि सूक्ष्म देह या अक्षर पुरुष होती है। यहीं से स्थूल में स्थानान्तरण होकर देह का निर्माण होता है।


अव्यय पुरुष स्त्री-पुरुष में समान होता है। ब्रह्म और माया यहीं से सूक्ष्म शरीर में प्रतिष्ठित रहते हैं। अव्यय कृष्ण का भी यही कहना है-ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति - (गीता 18.61)

नव निर्माण में बीज वपन के बाद पुरुष की भूमिका गौण हो जाती है। पुरुष उपलब्ध न भी हो तो प्रकृति संभाल लेती है। जैसे पृथ्वी बीज को संभालती है। आगे परा प्रकृति भाग्य का निर्धारण करती है। जीव को नव देह में प्रतिष्ठित करती है। अक्षर देह ही अव्यय और क्षर के मध्य का सेतु है। अक्षर ही ध्वनि स्पन्दनों के रूप में नाद ब्रह्म और अर्थ ब्रह्म का उपादान बनता है। हमारे सारे संस्कारों के निर्माण का क्षेत्र भी यही है।


अक्षर पुरुष हृदय रूप में प्रमुख कार्य करता है। ईश्वर का कर्म क्षेत्र है। स्त्री ही माया से महामाया रूप में देव प्राणों के साथ निर्माण कर्म करती है। स्त्री-पुरुष के मूल भाव- वपन काल के- तथा माता के भाव, गर्भकाल के ही संस्कारों का निर्माण करते हैं। शब्द (सरस्वती) और अर्थ (लक्ष्मी) यूं तो दोनों ही साथ रहते हैं, किन्तु सूक्ष्म देह में सरस्वती की तथा स्थूल देह में लक्ष्मी की प्रधानता रहती है। लक्ष्मी चिति रूप में देह का निर्माण करती है, सरस्वती चितेनिधेय रूप में शरीर की महिमा बनती है। इसके निर्माण का हेतु मां का भावनात्मक संवाद है। इसी से देव-असुर रूप मन का निर्माण होता है। जीवन में व्यक्ति वैसे ही कर्म किया करता है। माया अगली योनि की योजना बनाती जाती है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com