1 मार्च 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नाटकों की रिहर्सल ही नहीं, रियाज भी जरूरी

छोटे शहरों के शौकिया व नियमित रंगकर्मियों को नाटकों के रिहर्सल इतर नियमित अभ्यास करना उनके आगे बढऩे तथा बेहतर अवसर के लिए तैयारी की भूमिका बनाता है। रंगमंच चूंकि सामूहिक सृजनकार्य है और अभ्यास व्यक्तिगत उपक्रम इसलिए अभ्यास का मॉड्यूल और वातावरण बनाया जाना उपयोगी होगा।

2 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

Mar 01, 2026

गिरिजाशंकर, वरिष्ठ कला समीक्षक

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश का मौका हो या किसी अन्य नाट्य विद्यालय में, किसी पेशेवर नाटक के लिए ऑडिशन हो या फिल्म या टीवी सीरियल में अभिनय के लिए ऑडिशन, अधिकांश रंगकर्मियों को यही उत्तर मिलता है कि अभी तैयारी पूरी नहीं है और तैयारी करो। फिर चाहे आप प्रवेश या ऑडिशन के लिए पात्रता रखते हो यानी दस से अधिक नाटकों में काम करने का अनुभव हो फिर भी तैयारी आड़े आ ही जाती है। आखिर यह तैयारी क्या है। यह है नाट्य अभ्यास जिसकी व्यवस्थित परंपरा हिंदी रंगमंच में देखने को प्राय: नहीं मिलती है।


हिंदी रंगमंच में आमतौर पर नाटकों के रिहर्सल को ही रियाज मान लिया जाता है। यह रिहर्सल नाटकों के मंचन के लिए किया जाता है और नाटक के मंचन के बाद रिहर्सल बंद हो जाती है। नाट्य अभ्यास निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। छोटे बड़े शहरों में निरंतर रंगमंच कार्यशालाएं आयोजित होते रहे हैं और उसमें अधिकांश नाट्य परक कार्यशालाएं होती हैं जिनमें प्रस्तुति योग्य नाटक तैयार किए जाते हैं। यानी यहां भी नाटकों का रिहर्सल ही होता है और कार्यशाला समाप्त होते ही रिहर्सल का सिलसिला थम जाता है। प्रदर्शनकारी कलाओं में रियाज यानी अभ्यास का बड़ा महत्व होता है। रंगमंच में भी इसका वही महत्व है। रिहर्सल यानी पूर्वाभ्यास तो किसी एक नाटक की प्रस्तुति तक सीमित होता है लेकिन अभ्यास समूचे अभिनय पक्ष को परिपक्व और निपुण बनाता है। अब तो गायन और नृत्य भी अभिनय में शामिल है। ऐसे में रंग अभ्यास की जरूरत एवं महत्व और भी बढ़ जाता है। नृत्य, गायन संगीत जैसे शास्त्रीय प्रदर्शनकारी कलाओं में नियमित व निरंतर अभ्यास की परंपरा रही है लेकिन हिन्दी रंगमंच में ऐसी परंपरा नहीं है। हालांकि मैंने कई पेशेवर रंगकर्मियों को व्यक्तिगत स्तर पर स्वर और आवाज का अभ्यास करते हुए देखा है।


दरअसल रंगमंच में रंग अभ्यास का मॉड्यूल तैयार नहीं किया गया है। अभ्यास न नाट्य शिक्षण संस्थाओं के सिलेबस का हिस्सा है और न रंग संस्थाओं क रंग शिविरों में इसका प्रशिक्षण मिलता है। अभ्यास की सुव्यवथित परंपरा नहीं होने के कारण यह अभिनेता का व्यक्तिगत उपक्रम मान लिया गया है कि वह किस तरह का निरंतर अभ्यास कर अपने अभिनय को निखारे उसे संवेदनशील और संप्रेषणनीय बनाए और उसमें परिपक्वता लाए। इसके लिए सुनियोजित मॉडयूल तैयार कर व्यक्तिगत रंग अभ्यास की परंपरा विकसित करना आवश्यक है। छोटे शहरों के शौकिया व नियमित रंगकर्मियों को नाटकों के रिहर्सल इतर नियमित अभ्यास करना उनके आगे बढऩे तथा बेहतर अवसर के लिए तैयारी की भूमिका बनाता है। रंगमंच चूंकि सामूहिक सृजनकार्य है और अभ्यास व्यक्तिगत उपक्रम इसलिए अभ्यास का मॉड्यूल और वातावरण बनाया जाना उपयोगी होगा।