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बीमारी दुर्लभ है, क्या उम्मीद भी दुर्लभ होनी चाहिए?

अंतरराष्ट्रीय दुर्लभ बीमारी डेटाबेस ऑर्फानेट के अनुसार, दुर्लभ बीमारियां दुनिया की कुल आबादी के लगभग 3.5 से 5.9 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित करती हैं यानी 'दुर्लभ' कहे जाने वाले ये रोग मिलकर अब किसी छोटे समूह की समस्या नहीं रह जाते, बल्कि एक बड़ा, अक्सर अनदेखा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रश्न बन जाते हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 01, 2026

Woman Dies of Rabies After Dog Bite in Ajmer

डॉ. अश्वनी पाराशर, बाल रोग विशेषज्ञ (पीजीआइ चंडीगढ़)

दुर्लभ रोगों से जूझते करोड़ों मरीजों के लिए असली चुनौती बीमारी नहीं, बल्कि उसकी पहचान, इलाज तक पहुंच और व्यवस्था की तैयारी है- मोर दैन यू कैन इमेजिन। कभी-कभी बीमारी का मतलब बुखार, खांसी या कुछ दिनों का इलाज भर नहीं होता। कभी बीमारी का मतलब होता है अस्पताल के बाहर बैठा एक परिवार, हाथ में फाइलों का ढेर और आंखों में एक ही सवाल- अब आगे क्या। 'रेयर डिजीज डे' हमें इसी सवाल से रूबरू कराता है। हम अक्सर 'दुर्लभ' शब्द पर अटक जाते हैं। असली सवाल यह है कि दुर्लभ बीमारी होने पर क्या मरीज भी हमारी व्यवस्था में दुर्लभ हो जाते हैं। बीमारी दुर्लभ होती है, मरीज नहीं। भारत में दुर्लभ बीमारी अक्सर बीमारी से ज्यादा एक लंबी 'डायग्नोस्टिक यात्रा' होती है, जहां परिवार डॉक्टरों, शहरों और रिपोर्टों के बीच भटकता रहता है, सिर्फ एक नाम की तलाश में। बीमारी का नाम मिल गया, लेकिन दवा अत्यंत महंगी थी और इलाज परिवार की आर्थिक पहुंच से बाहर। कई परिवारों के अनुभव बताते हैं कि जैसे ही सहायता की सीमा समाप्त होती है, इलाज रुक जाता है और बीमारी फिर से बढऩे लगती है, जिससे पहले मिली चिकित्सा प्रगति भी व्यर्थ हो जाती है।


आंकड़ों पर जाएं तो तस्वीर और बड़ी दिखती है। अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार दुर्लभ बीमारियां दुनियाभर में लगभग 40 करोड़ लोगों को प्रभावित करती हैं। अंतरराष्ट्रीय दुर्लभ बीमारी डेटाबेस ऑर्फानेट के अनुसार, दुर्लभ बीमारियां दुनिया की कुल आबादी के लगभग 3.5 से 5.9 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित करती हैं यानी 'दुर्लभ' कहे जाने वाले ये रोग मिलकर अब किसी छोटे समूह की समस्या नहीं रह जाते, बल्कि एक बड़ा, अक्सर अनदेखा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रश्न बन जाते हैं। भारत में 450 से अधिक दुर्लभ बीमारियां पहचानी गई हैं, लेकिन आधे से भी कम के लिए ही कोई मानक इलाज उपलब्ध है और जिनके लिए थेरेपी है भी, वे लागत और पहुंच दोनों कारणों से अधिकांश मरीजों तक नहीं पहुंच पातीं। 2021 में लागू नेशनल पॉलिसी फॉर रेयर डिजीजेज ने पहली बार यह स्वीकार किया कि कुछ बीमारियां सिर्फ बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकतीं। इस नीति के तहत 63 दुर्लभ बीमारियों को चिह्नित कर प्रति मरीज 50 लाख रुपए तक सहायता का प्रावधान किया गया। व्यवहार में यह सहायता कई बीमारियों के लिए अपर्याप्त साबित होती है, क्योंकि कुछ उपचारों की लागत सालाना करोड़ों तक पहुंच जाती है। हाल के वर्षों में दिल्ली उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा,जहां यह सवाल उठा कि क्या इलाज की निरंतरता किसी वित्तीय सीमा पर रुकनी चाहिए। इस आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की है और मामला अभी अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा में है।


स्पष्ट है कि दुर्लभ बीमारियों के लिए अस्थायी राहत नहीं, बल्कि स्थायी राष्ट्रीय निधि, बीमा एकीकरण और समयबद्ध फंडिंग व्यवस्था की आवश्यकता है। शायद अब यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या दुर्लभ बीमारियों का भरोसा हमेशा आयातित और मंहगी दवाओं पर ही छोड़ा जा सकता है, या फिर देश के भीतर शोध और उपचार विकसित करने की दिशा में भी गंभीर सोच की जरूरत है। अंतत: दुर्लभ बीमारियों की बहस दया की नहीं, समान स्वास्थ्य अधिकार की बहस है। जब बीमारी दुर्लभ हो सकती है, तो उम्मीद दुर्लभ क्यों होनी चाहिए।