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यदि विपक्ष का सम्मान नहीं होगा तो लोकतंत्र का आधार ही ढह जाएगा

Karpoorchandra kulish birth centenary:कर्पूरचंद्र कुलिश जी का मानना था कि लोकतंत्र की मजबूती 'सहमति' में नहीं, बल्कि 'असहमति के सम्मान' में है; यदि सत्ता विपक्ष और आलोचना का गला घोंटेगी, तो वह लोकतंत्र नहीं, तानाशाही होगी।

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भारत

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MI Zahir

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एम आई ज़ाहिर

Mar 02, 2026

Birth centenary of Karpurchandra Kulish (1)

पत्रकारिता के शलाका पुरुष कर्पूरचन्द्र कुलिश जी की जन्मशती। ( फोटो: पत्रिका)

Karpoor Chandra Kulish 100th Birth Year: भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ अध्याय ऐसे हैं जो स्याही से नहीं, बल्कि एक संपादक के नैतिक साहस और उसकी आत्मा के ताप से लिखे गए हैं। पत्रकारिता के शलाका पुरुष, राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूरचंद्र कुलिश जी (Karpoor Chandra Kulish) ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे, वे केवल एक पत्रकार या संपादक नहीं थे, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और भारतीय मूल्यों के सजग प्रहरी थे। उन्होंने शब्द और समाचार साधना का इतिहास रचा और राजस्थान पत्रिका (Rajasthan Patrika)के माध्यम से पत्रकारिता(Hindi Journalism) के विशिष्ट व उल्लेखनीय ​कीर्तिमान क़ायम किए। उनके दस्तावेज़ी का संकलन 'हस्ताक्षर' हमें उस दौर में ले जाता है जब एक संपादक ने अपनी लेखनी को सत्ता की 'चरण वंदना' का साधन बनाने के बजाय, लोकतंत्र की रक्षा के लिए 'वज्र' बना लिया था। आज जब हम आज़ादी के अमृतकाल में हैं, कुलिश जी के वे विचार' यदि विपक्ष का सम्मान नहीं होगा तो लोकतंत्र का आधार ही ढह जाएगा' पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और चेतावनीपूर्ण प्रतीत होते हैं।

'दस्तख़ती अग्रलेख': मौन के दौर में शब्द का साहस

पत्रकारिता का सामान्य सिद्धांत यह है कि 'संपादकीय' (Editorial) किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि संस्था का मत होता है। इसीलिए वह अनाम होता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब देश पर संकट के बादल मंडराए, कुलिश जी ने इस परंपरा को तोड़ा। उन्होंने संस्था की आड़ लेने के बजाय, सीना तान कर अपने 'हस्ताक्षर' के साथ अग्रलेख लिखे।

आख़िर ऐसा लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी ? (Emergency 1975)

यह सवाल आज की पत्रकारिता के लिए एक सबक़ है। सन 1975 के जून महीने में, जब देश में आपातकाल (Emergency) की भूमिका तैयार हो रही थी और सत्ता का चरित्र निरंकुश हो रहा था, तब मौन रहना सबसे सुरक्षित विकल्प था। लेकिन कुलिश जी ने उस 'नाज़ुक दौर' को भांप लिया था। उन्होंने 12 जून से 25 जून 1975 के बीच जो लिखा, वह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि तानाशाही के ख़िलाफ़ लोकतंत्र की हुंकार थी। उन्होंने अपने नाम के साथ लिख कर यह संदेश दिया कि एक सच्चा संपादक अपने विचारों के लिए स्वयं जवाबदेह होता है और वह सत्य कहने के परिणामों से डरता नहीं है। यह 'हस्ताक्षर' करना, दरअसल सत्ता की आंखों में आंखें डाल कर यह कहना था कि "मैं देख रहा हूं और मैं बोलूंगा।"

लोकतंत्र और विपक्ष: संतुलन का सिद्धांत

कुलिश जी के चिंतन का सबसे सशक्त पक्ष उनकी लोकतांत्रिक दृष्टि थी। उनके लेखन में यह चेतावनी बार-बार उभरती है कि लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है, बल्कि यह अल्पमत और असहमति के सम्मान का नाम है। उन्होंने लिखा कि सत्ता का स्वभाव ही केंद्रीयकरण की ओर झुकना होता है। यदि इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने वाला विपक्ष मौजूद नहीं होगा, या यदि विपक्ष को सुनियोजित तरीके से कुचला जाएगा, तो शासन व्यवस्था निरंकुश तंत्र में बदल जाएगी। उनका कहना था "सत्ताएं आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश और उसके लोकतांत्रिक मूल्य शाश्वत रहने चाहिए।"

कुलिश जी के विचार पत्रकारिता के मार्गदर्शक सूत्र

आज के राजनीतिक परिदृश्य में, जहां विपक्ष को अक्सर 'राष्ट्र-निर्माण में बाधा' के रूप में चित्रित करने की कोशिश की जाती है, कुलिश जी का यह विचार एक मार्गदर्शक सूत्र है। वे मानते थे कि एक मजबूत और सम्मानित विपक्ष ही सरकार को निरंकुश होने से रोकता है। विपक्ष का अपमान, वस्तुतः जनादेश के एक हिस्से का अपमान है।

सत्ता के गलियारों से दूर: गांव और ग़रीब की पीड़ा (Indian Journalism History)

कुलिश जी का वैचारिक धरातल लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में नहीं, बल्कि राजस्थान के तपते रेगिस्तान और गांवों की धूल में था। उनकी प्रसिद्ध यात्रा श्रृंखला 'मैं देखता चला गया' इस बात का प्रमाण है कि उनकी पत्रकारिता की जड़ें ज़मीन में थीं। उनके अग्रलेखों में हम पाते हैं कि वे केवल राजनीतिक जोड़-तोड़ पर नहीं लिखते थे। जब वे अकाल, सूखे और भुखमरी पर क़लम चलाते थे, तो उसमें एक मानवीय संवेदना होती थी। उन्होंने स्थापित किया कि पत्रकारिता का धर्म केवल ख़बर देना नहीं, बल्कि 'लोक शिक्षण' है। उन्होंने सत्ताधीशों को यह एहसास कराया कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, और यदि गांव रो रहा है, तो संसद के मुस्कुराने का कोई अर्थ नहीं है। उनका यह ग्रामीण चिंतन आज की 'कॉरपोरेट मीडिया' के लिए एक आईना है, जो टीआरपी की दौड़ में गांव की पगडंडियों को भूल चुका है।

'संवाद' और 'शास्त्रार्थ' को महत्व दिया

उनके लेखों में यह विचार नजर आता है कि भारतीय संस्कृति में 'संवाद' और 'शास्त्रार्थ' की परंपरा रही है, 'विवाद' और 'विध्वंस' की नहीं। उन्होंने वेदों के माध्यम से समाज को यह संदेश देने की कोशिश की कि एक पत्रकार को ऋषि-तुल्य होना चाहिए, जो सत्य का अन्वेषण करे और समाज को सही दिशा दिखाए। उनकी पत्रकारिता 'संस्कृतिनिष्ठ' थी, जो आधुनिकता का विरोध तो नहीं करती थी, लेकिन अपनी जड़ों को काटने की इजाजत भी नहीं देती थी।

आज की प्रासंगिकता: एक 'कुलिश' की ज़रूरत

आज 'फ़ेक न्यूज़', 'पेड न्यूज़' और 'एजेंडा पत्रकारिता' का समय है। मीडिया घरानों पर यह आरोप आम है कि वे या तो सरकार के 'भोंपू' बन गए हैं या फिर किसी विशेष विचारधारा के ग़ुलाम हैं। ऐसे समय में, कर्पूरचंद्र कुलिश जी के 'हस्ताक्षर' अग्रलेख हमें एक नई रोशनी दिखाते हैं। आज जब पत्रकार सवाल पूछने से डरते हैं, कुलिश जी की क़लम और उनके अग्रलेख याद दिलाते हैं कि पत्रकार का काम सत्ता के साथ 'सेल्फी' लेना नहीं, बल्कि सत्ता से 'सवाल' करना है। कुलिश जी ने सिखाया कि अख़बार का असली मालिक उसका 'पाठक' होता है, विज्ञापनदाता या सरकार नहीं। आज मीडिया को अपनी खोई हुई साख पाने के लिए उसी नैतिक बल की आवश्यकता है। सोशल मीडिया के दौर में, जहां असहमति जताने पर 'ट्रोलिंग' और 'चरित्र हनन' आम बात हो गई है, कुलिश जी का यह विचार कि "विपक्ष का सम्मान लोकतंत्र की आधारशिला है", हमें उदारता और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाता है।

क़लम से क्रांति और जन-वंदना का संकल्प

कर्पूरचंद्र कुलिश जी ने अपने जीवन और लेखन से यह सिद्ध किया कि पत्रकारिता कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि एक पवित्र मिशन है। उनके दस्तख़ती अग्रलेख उन परिस्थितियों के साक्षी हैं, जब देश की लोकतांत्रिक सांसें फूल रही थीं। उन्होंने तब बेबाकी से लिखा, जबकि ऐसा लिखना बहुत जोखिम भरा था। आज, जब हम उन दस्तावेज़ को पलटते हैं, तो हमें महसूस होता है कि वे शब्द पुराने नहीं हुए हैं। वे आज भी हमारे सामने खड़े होकर पूछ रहे हैं—क्या हम अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं? क्या हम विपक्ष और असहमति का सम्मान कर रहे हैं? क्या हम गांव के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ बन पा रहे हैं?

क़लम की ताक़त तलवार से अधिक

बहरहाल, कुलिश जी का जीवन संदेश देता है कि क़लम की ताक़त तलवार से अधिक होती है, बशर्ते उसे थामने वाले हाथ में कंपन न हो और उसके पीछे एक सच्चा चरित्र खड़ा हो। उनकी नैतिक और वैचारिक विरासत हमें याद दिलाती है कि पत्रकारिता का अंतिम उद्देश्य सत्ता की 'चरणवंदना' नहीं, बल्कि 'जन-वंदना' है। उनका मानना था कि यही वह पाथेय है, जो लोकतंत्र को जीवित रखेगा।

(यह आलेख श्री कर्पूरचंद्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)