
कर्पूरचंद्र कुलिश जी जन्म शताब्दी और शिक्षा व्यवस्था। (फोटो: पत्रिका)
Karpoor Chandra Kulish birth centenary: भारतीय पत्रकारिता के पुरोधा और प्रखर चिंतक श्रद्धेय कर्पूरचंद्र कुलिश जी (Karpoor Chandra Kulish) ने अपने जीवनकाल में केवल समाज और संस्कृति पर ही नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी बहुत गहरा और सारगर्भित विमर्श प्रस्तुत किया। उनके जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर उनके रचना संसार से जुड़ी कड़ियों में उनके विचारों को फिर से टटोलने का मौक़ा मिला है। उनकी लेखनी का एक प्रेरक व शाहकार आलेख याद आता है: 3 मई 1995 को लिखे उनके प्रखर अग्रलेख, "शिक्षा को रोजगार से हरगिज़ न जोड़ें" का ज़मीनी यथार्थ और आत्मकथ्य 'धाराप्रवाह' पुस्तक आज भी इस बात के गवाह हैं कि कुलिश जी शिक्षा को केवल साक्षरता या रोज़गार का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य के सर्वांगीण विकास और चेतना का मूल और जागृति का निमित्त मानते थे। यानि उनकी नज़र में शिक्षा मनुष्य में मनुष्यता का शऊर पैदा करती है।
राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक (Patrika Founder) कुलिश जी ने अपने इस लेख में साफ तौर पर बताया है कि शिक्षा को लेकर स्वाधीनता के साथ ही हमारे देश के नेता अपनी चिंता प्रकट करने लगे थे, परंतु वे कोई सुनिर्दिष्ट नीति नहीं बना पाए। वे याद दिलाते हैं कि आज से 150 वर्ष पूर्व मद्रास प्रेसीडेंसी के एक कमीशन के अनुसार, भारत में पढ़े-लिखे लोगों की तादाद लगभग 35 प्रतिशत थी, जो उस समय इंग्लैंड के लगभग बराबर थी। लेकिन शिक्षा पद्धति में जब मैकाले का प्रवेश हुआ, तो सब कुछ नये सिरे से पढ़ना-पढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ। उनका का दृढ़ विश्वास था कि अगर हमारी मूल शिक्षा पद्धति चालू रहती, तो आज देश शत-प्रतिशत साक्षर होता।
कुलिश जी किताबी ज्ञान से अधिक व्यावहारिक और ज़मीनी ज्ञान के पक्षधर थे। वे पुरानी शिक्षा पद्धति के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि पहले शिक्षक अपने ही घर पर 'चटशाला' चलाता था और विद्यार्थी वहीं पढ़ने जाते थे। शिक्षक के योगक्षेम की व्यवस्था बच्चों के माँ-बाप करते थे, जिसे 'सीधा-पेटा' (भोजन-सामग्री) कहा जाता था। इन घरेलू चटशालाओं में बच्चों को गणित और वर्णमाला के साथ-साथ रामायण, महाभारत और गीता जैसे नीति, धर्म व काव्य-शास्त्र पढ़ाए जाते थे। जब से मैकाले छाप शिक्षा प्रणाली चालू हुई और शिक्षा भवनों पर आश्रित हो गई, तब से सरकारीकरण के कारण शिक्षक भी राज्याश्रित वर्ग या वेतनभोगी बन कर रह गए। शिक्षक ने तो समर्पण भाव से वही किया, जो नीति निर्धारकों ने बताया।
कहते हैं कि मां बच्चे की पहली शिक्षक होती है। कुलिश जी का मानना था कि प्राथमिक शिक्षा को राज्य के भार से मुक्त कर देना चाहिए, ताकि समाज स्वयं इसे संचालित कर सके।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर कुलिश जी की पैनी नज़र बहुत स्पष्ट और आलोचनात्मक थी। आज की शिक्षा व्यवस्था जिस तरह से केवल 'पैकेज' और 'प्लेसमेंट' तक सिमट गई है, कुलिश जी ने दशकों पहले इसके ख़तरों को भांप लिया था। उनका स्पष्ट मत था कि शिक्षा को रोजगार के भार से मुक्त कर दिया जाए। यानि शिक्षा में नैतिकता और मानवता के साथ जीवन मूल्य अवश्य हों।
वे लिखते हैं कि रोजगारमूलक शिक्षा के नाम पर आज एक ऐसा "सफेदपोश वर्ग" पनपाया जा रहा है, जो गांव-गांव में प्रचलित शिल्प के साथ जुड़ने की कोई कोशिश नहीं करता। यह शिक्षा मनुष्य को स्वावलंबन की दिशा देने के बजाय सिर्फ 'नौकरी पाने वाला' बना रही है। वे आश्चर्य करते थे कि आज की शिक्षा हमें केवल यह सिखाती है कि हम कमाएं और अपने तक सीमित रहें।
कुलिश जी के अनुसार, प्रकृति ने मनुष्य की रचना को तीन भागों में संयुक्त किया है: शरीर, मन और बुद्धि, और इन तीनों के मूल में पुष्ट अर्थात आत्मा है। शिक्षा की सार्थकता तभी है जब वह इन तीनों को पुष्ट करे। उनका मानना था कि शिक्षा केवल किताबी नहींख् बल्कि स्वावलंबनपरक होनी चाहिए। कुलिश जी ने 1995 के अपने लेख में ज़ोर दिया कि खर्चीले उपकरणों वाले खेलों के बजाय कुश्ती, कबड्डी व खो-खो जैसे पारंपरिक खेलों पर ज़ोर दिया जाए। शरीर स्वस्थ रहे, इसके लिए आहार-विहार के नियमों का ज्ञान शिक्षा का अभिन्न अंग होना चाहिए।
मन में इच्छाएं होती हैं। शास्त्रों में इन्हें तीन श्रेणियों में बांटा गया है: [1] वित्तेषणा (धन), [2] पुत्रेषणा (संतान), और [3] लोकेषणा (प्रतिष्ठा)। कुलिश जी मानते थे कि शिक्षा में इन एषणाओं के शमन या प्रकृति-विरुद्ध दमन की नहीं, बल्कि उनके उचित प्रबंधन की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि विद्यार्थी 'लिप्सा' का शिकार न बने। वह सदमार्ग पर चलना सीखे और मनुष्यता और मानवीय मूल्यों को पहचाने।
मनुष्य में सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व बुद्धि है। बुद्धि के कारण ही वह उचित-अनुचित और हित-अहित का भेद कर पाता है। जो तन और मन पर अंकुश रख सके और समाज जीवन की दिशा तय कर सके, वही सच्ची शिक्षा है।
कुलिश जी के शिक्षा दर्शन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण, मौलिक और संवेदनशील पहलू 'स्त्री शिक्षा' से जुड़ा है। वे मानते थे कि भारतीय संस्कृति में स्त्री का जो देवत्व, शक्ति और मातृत्व का स्वरूप है, उसे आधुनिक पश्चिमी शिक्षा ने गहरी चोट पहुंचाई है। उनका साफ़ तौर पर मानना था कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से "लड़कों के लिए" या "पुरुषवादी मानसिकता" से तैयार की गई है।
कुलिश जी केवल कमियों की ओर इशारा नहीं करते थे, बल्कि उन्होंने इसका समाधान भी बताते थे। वे मानते थे कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में आधुनिक विज्ञान के साथ-साथ हमारी प्राचीन वैदिक संपदा का अनिवार्य रूप से समावेश होना चाहिए। उनका ऐतिहासिक ग्रंथ 'शब्द वेद:' उनके इसी भगीरथ प्रयास का परिणाम है। आज उन्हीं के इसी विज़न को साकार करने के लिए 'द कुलिश स्कूल' जैसी संस्थाएं स्थापित की गई हैं, जो आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ वैदिक मूल्यों और अनुभवात्मक ज्ञान को बढ़ावा दे रही हैं।
आज जब हम युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी, अवसाद और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहरे अलगाव को देखते हैं, तो कर्पूरचंद्र कुलिश जी के विचार एक मार्गदर्शक की तरह प्रतीत होते हैं। आज की डिग्रियां युवाओं को कमाने वाली मशीन तो बना रही हैं, लेकिन उनके भीतर के 'मनुष्य' को नहीं जगा पा रही हैं। उन्होंने आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के एकांगीपन और स्वार्थ केंद्रित रवैये पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए जो कहा था, वह आज भी हमारी शिक्षा प्रणाली पर एक गहरा सवाल छोड़ जाता है:
"शिक्षा सिखाती है हम कमाएं और हम ही खा जाएं… तब कैसे कोई पेड़ बनेगा ये बताओ? शिक्षित आत्मा… इन चीज़ों को हमें अलग दृष्टि से देखना होगा।"
बहरहाल, कुलिश जी का संपूर्ण वाङ्मय हमें यही सिखाता है कि शिक्षा वह नहीं, जो आपको सिर्फ़ आजीविका या नौकरी दे, बल्कि शिक्षा वह है, जो आपको एक स्वावलंबी, संवेदनशील, और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इंसान बनाए। 'द कुलिश स्कूल' (The Kulish School) की अवधारणा उसी की एक जीती जागती मिसाल है।
Published on:
26 Feb 2026 06:00 am
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