दादी मां हमें बचपन में कहा करती थीं कि आने वाले समय में मनुष्य का सिर बहुत बड़ा हो जाएगा और कम काम करने की आदत व आलस्य के कारण उसके शरीर का शेष भाग पतला और कमजोर हो जाएगा। तुम लोग देखोगे कि इंसान बिस्तर पर लेटे-लेटे ही खटके (बटन) दबाएगा और मशीनें काम कर देंगी। सत्तर बरस पूर्व दादी मां से सुनी हुई ये बातें आज सच होती दिखाई दे रही हैं।
एआइ के इस शोर के कारण अपने उद्वेलित मन को थामे मैं अपने प्रोफेसर मित्रों से मिलने नई दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिक संस्थान चला गया। वहां के प्रोफेसर बंधुओं ने समझाया कि एआइ कोई नया आविष्कार नहीं है। जिस प्रकार पहले डेटा संख्याओं में प्रदर्शित होते थे और उससे सहसंबंध और रिग्रेशन आदि सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता था।
ठीक उसी प्रकार से जो वर्णित प्रकरण पब्लिक डोमेन में हैं और जो डेटा सेंटर्स में संकलित हैं, उनका उपयोग कर आपकी मांग के अनुसार विश्लेषण कर अनेक विकल्पों में आपके सामने प्रस्तुत किया जाता है। आप उन विकल्पों में से चुनाव कर अपना कार्य कर सकते हैं। आपको कोई अनुबंध बनाना है या कोई लेख लिखना है तो आप एआइ की सहायता से घंटों का यह कार्य कुछ ही मिनटों में सम्पन्न कर सकते हैं क्योंकि डेटा सेंटर में उपलब्ध सभी अनुबंध या लेखों की जानकारी से आपकी आवश्यकता के अनुसार सामग्री उपलब्ध हो जाती है।
जो यह सुविधा देने वाली कंपनियां हैं, उनके प्रोसेसर तीव्र गति से काम करने वाले होते हैं। उनकी चिप भी अलग होती है। यह तो हुई लेख लिखे जाने की बात। इसी तरह से मशीनों की डिजाइन बनानी हो या रोबोट की डिजाइन, सब कार्य एआइ से सम्पन्न हो जाएगा। इससे वाइट कॉलर जॉब्स पर ही खतरा है। शेष कार्य तो वैसे ही सम्पन्न होंगे। पर्सनल कम्प्यूटर या मोबाइल फोन में कोई परिवर्तन नहीं होगा। जब मूलभूत परिवर्तन नहीं हो रहा तब वाइट कॉलर जॉब्स वालों के साथ दुनिया को सिर्फ मार्केटिंग के लिए क्यों डराया जा रहा है?
पिछले दिनों ग्रोक ने जो उथल-पुथल या तहलका मचाया, उससे ज्ञान लेकर समाज को स्वीकार्य सुरक्षा के लिए नए कानून व नियम सरकार को तुरंत बनाकर लागू करने चाहिए। एआइ के बाद भी जो क्रिएटिव काम करते हैं या रिसर्च या नवाचारों या खेलकूद से जुड़े हुए हैं या जो व्यक्तिगत विशिष्टता के कार्य हैं, उन पर एआइ का प्रभाव नहीं के बराबर होगा। निर्माण कार्य से लेकर कम्प्यूटर बनाने वाली कंपनियों पर इसका प्रभाव कम होगा। अभी सबको जिस तरह एआइ से डराया जा रहा है, आने वाले समय में 'क्वांटम' से डराया जाएगा।
यह नया आविष्कार है, जिस पर कार्य चल रहा है। डेटा सेंटर्स बनाने में सक्षम: हमें 2047 तक भारत को विकसित देशों की श्रेणी के प्रथम पायदान पर खड़ा करना है, तो शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा। हम किसी और देश या समाज के डेटा को बिना छुए भी अपने बलबूते पर डेटा सेंटर्स बनाने में सक्षम हैं। जितनी भाषाएं या संस्कृति यूरोप में हैं, उससे अधिक हमारे देश में उपलब्ध हैं। सारे डेटा को संकलित कर सुव्यवस्थित संपादन की जरूरत है।
हमारे यहां काम करने वालों की भी कमी नहीं है। कमी है तो सिर्फ कार्य करने वालों में जोश भरने की। हम श्वेत व हरित क्रांति जैसे कठिन कार्य सम्पन्न कर चुके हैं, तो हम एआइ को भी क्रांति मानकर सफल अवश्य होंगे। हमें डर केवल एक ही बात का है कि कहीं हम एआइ का उपभोक्ता बनकर नहीं रह जाएं। हमें 'क्रिएटर' बनना है, केवल 'यूजर' नहीं। जीवन में परिवर्तन को स्वीकार करने वाले को कोई कष्ट नहीं होता।
परिवर्तन स्वीकारते हुए स्कूल से लेकर विवि में जल्द नए कोर्स और उन्हें पढ़ाने के लिए शिक्षकों को तैयार करने की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि यह कार्य शीघ्र सम्पन्न नहीं किया तो अगले वर्ष से ही कक्षाओं में क्या किया जाएगा? इस सोचनीय स्थिति से बचने के लिए पाठ्यक्रम समितियों और शिक्षकों के प्रशिक्षण केंद्रों को त्वरित प्रभाव से कार्य प्रारंभ करना चाहिए।
कोर्स में परिवर्तन ऐसा हो कि उच्च शिक्षण संस्थाओं की लैब नए उद्यम के 'स्टार्टअपÓ बन जाएं। हर प्रोफेसर की लैब से निकलने वाला पीएचडी धारक एक स्टार्टअप लेकर निकले। यथार्थ में धरातल पर सरल व्यवहार से कार्य करने से ही एआइ क्रांति में सफलता हासिल हो सकती है।
Published on:
25 Feb 2026 02:52 pm
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