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Loneliness of Elderly: बुजुर्गों का बार-बार पूछना आपकी परवाह का संकेत है

स्टडीज दिखाती हैं कि भारत में 50 प्रतिशत से ज्यादा बुजुर्ग अकेलेपन से ग्रस्त हैं। बार-बार पूछना उनका तरीका है ध्यान खींचने का। परिवार में संवाद की कमी आज की बड़ी समस्या है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Feb 25, 2026

अविनाश जोशी - स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार,

बुजुर्गों की दुनिया हमारी तरह तेज नहीं चलती। युवावस्था में हमारा दिमाग तेजी से काम करता है, यादें ताजा रहती हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ स्मृति कमजोर पड़ने लगती है। वैज्ञानिक रूप से कहें तो, मस्तिष्क का हिप्पोकैंपस हिस्सा, जो नई यादें बनाता है, उम्र के साथ सिकुड़ने लगता है। अध्ययनों से पता चलता है कि 60 वर्ष से ऊपर के लोगों में शॉर्ट-टर्म मेमोरी 20-30 प्रतिशत कम हो जाती है। इसलिए वे बार-बार पूछते हैं। यह भूलना नहीं, बल्कि उनकी चिंता का रूप है।

वे हमें खोना नहीं चाहते। उनकी जिंदगी की लय धीमी हो चुकी है। वे समय को हमारी तरह नहीं नापते। मनोविज्ञान कहता है कि बुजुर्गों में 'एनक्लॉस्ट्रोफोबिया ऑफ टाइम' होता है, समय का भय। वे जानना चाहते हैं कि दिन कब खत्म होगा, कब अपनों की वापसी होगी। टोकने से वे और असुरक्षित महसूस करते हैं। धैर्य रखें, दो-चार बार दोहराएं। कुछ दिनों बाद वे थक जाते हैं या आदत डाल लेते हैं। खामोशी आ जाती है, बिना किसी डांट के।

एक सर्वे के अनुसार, भारत में 70 प्रतिशत युवा बुजुर्गों के साथ रहते हुए भी उन्हें 'बोझ' मानने लगे हैं। बार-बार पूछना उनकी एकमात्र जुड़ाव की कड़ी है। अगर हम टोकें तो वे अंदर ही सिमट जाते हैं। बुजुर्ग अकेलापन महसूस करते हैं। स्टडीज दिखाती हैं कि भारत में 50 प्रतिशत से ज्यादा बुजुर्ग अकेलेपन से ग्रस्त हैं। बार-बार पूछना उनका तरीका है ध्यान खींचने का। परिवार में संवाद की कमी आज की बड़ी समस्या है।

हम वाट्सऐप पर बातें करते हैं, लेकिन आमने-सामने कम। बुजुर्गों को डिजिटल दुनिया समझ नहीं आती। वे पुराने तरीके से जुड़ते हैं सवालों से। आज की पीढ़ी व्यस्त है। जॉब, ट्रैफिक, मीटिंग्स सब दौड़ है। लेकिन बुजुर्गों के लिए समय रुक-सा गया है। वे बचपन की यादें जीते हैं। बार-बार पूछना उनकी याद ताजा करने का माध्यम है।

मनोचिकित्सक कहते हैं कि यह 'रूमिनेशन' है- विचारों का चक्र। टोकने से चक्र टूटता नहीं, बल्कि गहरा हो जाता है। बेहतर है अनदेखा करें या हंसकर टाल दें। सामाजिक बदलाव भी जिम्मेदार है। पहले संयुक्त परिवार में भाई-बहन, भतीजे सब थे। बुजुर्गों का ध्यान बंटा रहता था। महानगरों में फ्लैट कल्चर ने उन्हें कैद कर दिया। बार-बार पूछना उनकी बेचैनी का इजहार है। एक रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में बुजुर्गों की आत्महत्या दर 40 प्रतिशत बढ़ी है।

इसका कारण है अकेलापन। जब बच्चा देखेगा कि दादी बार-बार पूछ रही हैं और आप मुस्कुरा रहे हैं, तो वह भी सीखेगा। आने वाली पीढ़ी में सम्मान की संस्कृति बनेगी। सरकारें ओल्ड एज होम बना रही हैं, लेकिन घर का महत्व कम नहीं। संयुक्त परिवार लौटें, तो ये सवाल खुद कम हो जाएंगे, लेकिन तब तक धैर्य रखें। बुजुर्गों को टोकना मतलब खुद को टोकना है। बार-बार पूछने पर बुजुर्गों को मत टोकिए। उन्हें सुनें और प्यार दें।