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संपादकीय: डिजिटल सुरक्षा के साथ वैचारिक कट्टरता पर प्रहार

'प्रहार' नीति हाई-टेक खतरों के खिलाफ भारतीय सुरक्षा बलों को और अधिक सक्षम बनाने पर जोर देती है। इस नीति की खूबी धार्मिक कट्टरता के महिमामंडन को रोकने की प्रतिबद्धता भी है।
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जयपुर

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Mahendra Pratap Singh

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Updated: 25 Feb 2026, 1:24 PM IST

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में केंद्र व राज्यों की सभी एजेंसियों के बेहतर तालमेल के साथ काम करने और आतंक से जुड़ी नई-नई चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए भारत की ओर से पहली आतंकरोधी नीति 'प्रहार' जारी कर दी गई है। यह उम्मीद बंधी है कि इस नीति से न केवल आतंकियों की करतूतों पर निगरानी रखी जाएगी, बल्कि इंटरनेट के जरिये फैलाए जा रहे 'अदृश्य युद्ध' का भी मुकाबला बेहतर तरीके से किया जा सकेगा। इस नीति की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी क्योंकि आज का आतंकवाद केवल सीमाओं पर होने वाली घुसपैठ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे युवाओं के स्मार्टफोन और मस्तिष्क में भी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है।

सभी जानते हैं कि आज सोशल मीडिया और इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म आतंकी गतिविधियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन गए हैं। आतंकी संगठन एन्क्रिप्शन, डार्क वेब और क्रिप्टोकरेंसी करेंसी का उपयोग कर अपनी पहचान छिपा रहे हैं। एक तरह से साइबर आतंकवाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। हमारे दुश्मन पंजाब और जम्मू-कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए ड्रोन जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। 'प्रहार' नीति इन हाई-टेक खतरों के खिलाफ भारतीय सुरक्षा बलों को और अधिक सक्षम बनाने पर जोर देती है। इस नीति की खूबी धार्मिक कट्टरता के महिमामंडन को रोकने की प्रतिबद्धता भी है। पॉलिसी में ग्रेडेड पुलिस रिस्पॉन्स की व्यवस्था की गई है, जिससे कानूनी कार्रवाई कट्टरपंथ की गंभीरता के स्तर पर आधारित होगी।

नीति स्पष्ट करती है कि वह आतंकवाद को किसी विशेष धर्म या जाति से नहीं जोड़ेगी और जीरो टॉलरेंस की नीति पर अडिग रहेगी। नीति की एक खूबी होल ऑफ गवर्नमेंट और होल ऑफ सोसायटी है। यह दृष्टिकोण केवल बल प्रयोग की बात नहीं करता, कट्टरपंथ को कम करने के लिए शैक्षिक और सामाजिक सुधारों पर भी जोर देता है। हालांकि, दंडात्मक नीति में कानून के दुरुपयोग की संभावनाएं बनी रहती हैं। अतीत में ऐसा टाडा और पोटा जैसे कानूनों के संदर्भ में देखा गया है। डिजिटल निगरानी और एन्क्रिप्शन को ट्रैक करने की कोशिशें अक्सर निजता के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से टकराती हैं। ऐसे में सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच एक बारीक रेखा खींचना चुनौतीपूर्ण रहा है।

भारत जैसे बहुविविध देश में इस नीति को राज्यों के साथ प्रभावी ढंग से लागू करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी। बावजूद इसके कि प्रहार नीति एक साहसिक और दूरदर्शी कदम है, इसकी सफलता केवल सख्त निगरानी में नहीं, बल्कि इसके निष्पक्ष कार्यान्वयन में निहित है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा के नाम पर मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन न हो।